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हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: हिजाब को इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं माना

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 अगस्त 2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हिजाब से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि मुस्लिम महिलाओं द्वारा सिर ढकने को इस्लाम की “अनिवार्य धार्मिक प्रथा” (Essential Religious Practice) के रूप में स्थापित नहीं किया गया है। अदालत ने यह टिप्पणी प्रयागराज के टैगोर पब्लिक स्कूल की कक्षा 11 की एक मुस्लिम छात्रा की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। छात्रा ने स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ सिर पर स्कार्फ पहनने की अनुमति मांगी थी, लेकिन अदालत ने उसकी याचिका खारिज कर दी।

स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की मांग

न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने 21 अगस्त 2026 के अपने आदेश में छात्रा की याचिका पर फैसला सुनाया। छात्रा की मांग थी कि उसे स्कूल की निर्धारित वर्दी के साथ सिर पर हेडस्कार्फ पहनने की अनुमति दी जाए। मामला धार्मिक स्वतंत्रता, स्कूल अनुशासन और यूनिफॉर्म के नियमों के बीच संतुलन से जुड़ा था।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता की ओर से ऐसा कोई पर्याप्त तथ्यात्मक आधार या सामग्री रिकॉर्ड पर नहीं रखी गई, जिससे यह साबित हो सके कि मुस्लिम महिला के लिए सिर ढकना इस्लाम का ऐसा अनिवार्य हिस्सा है, जिसके पालन के बिना वह अपने धर्म से बाहर हो जाएगी।

अदालत के सामने ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ का सवाल

इस मामले में मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या हिजाब पहनना संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित अनिवार्य धार्मिक प्रथा के रूप में माना जा सकता है। अदालत ने कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से ऐसा पर्याप्त आधार प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे हिजाब को इस श्रेणी में रखा जा सके।

अदालत की टिप्पणी का अर्थ यह नहीं है कि मुस्लिम महिला को हिजाब पहनने से सामान्य रूप से प्रतिबंधित किया गया है। फैसला विशेष रूप से उस परिस्थिति से जुड़ा है जहां छात्रा स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ हेडस्कार्फ पहनने की अनुमति मांग रही थी और इसे धार्मिक अधिकार के रूप में प्रस्तुत किया गया था।

धार्मिक स्वतंत्रता और संस्थागत नियमों के बीच संतुलन

भारतीय संविधान नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण और निरपेक्ष नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य तथा अन्य संवैधानिक प्रावधानों के अधीन धार्मिक स्वतंत्रता का प्रयोग किया जाता है। इसी संदर्भ में अदालतों के सामने अक्सर यह सवाल आता रहा है कि किसी धार्मिक प्रथा को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है या नहीं और किसी संस्था के निर्धारित नियमों के साथ उसका टकराव होने पर किस प्रकार संतुलन बनाया जाए।

स्कूलों में यूनिफॉर्म का उद्देश्य सभी छात्रों के लिए एक समान ड्रेस कोड बनाए रखना होता है। दूसरी ओर, धार्मिक आस्था से जुड़ी पोशाक को लेकर व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सवाल भी सामने आता है। यही कारण है कि हिजाब से जुड़े मामलों में अदालतों के सामने केवल ड्रेस कोड नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े व्यापक प्रश्न भी आते हैं।

फैसला इसी मामले की परिस्थितियों तक सीमित

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश एक विशेष छात्रा की याचिका और उसके सामने रखे गए तथ्यों पर आधारित है। अदालत ने यह पाया कि हिजाब को इस मामले में इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री प्रस्तुत नहीं की गई। इसलिए याचिका को राहत नहीं दी गई।

इस फैसले को पूरे देश में हिजाब को लेकर किसी सार्वभौमिक प्रतिबंध के रूप में देखना सही नहीं होगा। अलग-अलग राज्यों, संस्थानों और मामलों में लागू नियम तथा न्यायालयों के सामने मौजूद तथ्य अलग हो सकते हैं।

हिजाब विवाद फिर चर्चा में

हिजाब और स्कूल-कॉलेज ड्रेस कोड का मुद्दा पिछले कुछ वर्षों में देश में व्यापक बहस का विषय रहा है। इसके केंद्र में एक ओर धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत पहचान का सवाल है, तो दूसरी ओर शैक्षणिक संस्थानों के समान ड्रेस कोड और अनुशासन का मुद्दा है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद बहस एक बार फिर तेज होने की संभावना है कि किस धार्मिक प्रथा को ‘अनिवार्य’ माना जाए और किसी शैक्षणिक संस्था के ड्रेस कोड के सामने धार्मिक पहचान से जुड़े दावे की संवैधानिक सीमा क्या हो।

फिलहाल अदालत का संदेश स्पष्ट है—इस मामले में हिजाब को इस्लाम की ऐसी अनिवार्य धार्मिक प्रथा साबित करने के लिए पर्याप्त तथ्य और सामग्री रिकॉर्ड पर नहीं रखी गई, जिसके आधार पर छात्रा को निर्धारित स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हेडस्कार्फ पहनने का अधिकार दिया जा सके।

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