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तुमसे न हो पाएगा! टेलीप्रॉम्प्टर और गोदी मीडिया का शेर, सच्चे सवालों के सामने हो जाएगा ढेर?

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 25 अगस्त 2026

सोचिए, देश का “राजा” एक दिन ऐसी खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस में बैठ जाए, जहां पत्रकारों को पहले से सवाल न दिए गए हों, सवालों की कोई सूची न हो, असहज सवाल पूछने पर माइक बंद न हो और हर पत्रकार को जवाब के बाद दूसरा सवाल पूछने की पूरी आजादी हो। तब असली परीक्षा भाषणों की नहीं, जवाबदेही की होगी। तब सवाल फूलों की माला जैसे नहीं होंगे, बल्कि वे सवाल होंगे जिनसे सत्ता अक्सर असहज होती है। पत्रकार पूछेगा—2014 में किए गए बड़े-बड़े वादों का क्या हुआ? काला धन कहां है? नोटबंदी से आखिर देश ने क्या हासिल किया? जिन 15 लाख रुपये को लेकर राजनीतिक बहस हुई, उसका सच क्या था? GST को “गुड एंड सिंपल टैक्स” कहा गया था तो उसकी दरों और नियमों में बार-बार बदलाव क्यों करना पड़ा? जनता से मांगे गए भरोसे और आज की जमीन के बीच कितना फासला है? और अगर हर सवाल का जवाब तैयार है, तो फिर सवाल पूछने से इतनी घबराहट क्यों?

फिर सवाल रोजगार का आएगा। देश का युवा भाषण नहीं, नौकरी चाहता है। वह “विश्वगुरु”, “विकसित भारत” और “युवा शक्ति” जैसे नारे सुनकर खुश जरूर हो सकता है, लेकिन अपना घर नौकरी के बिना नहीं चला सकता। पत्रकार पूछेगा—कितने स्थायी रोजगार पैदा हुए? कितने सरकारी पद खाली हैं? कितनी भर्तियां समय पर पूरी हुईं? कितने युवाओं को नौकरी मिली और कितने आज भी परीक्षा, आवेदन, फीस, कोचिंग और इंतजार के चक्र में फंसे हुए हैं? करोड़ों युवा डिग्री लेकर निकलते हैं, लेकिन रोजगार का बाजार उनकी उम्मीदों के मुताबिक क्यों नहीं बढ़ रहा? अगर दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी में से एक देश अपने युवाओं को पर्याप्त अवसर नहीं दे पा रहा, तो “युवा शक्ति” आखिर किस काम की?

और यहीं से पेपर लीक का सवाल सामने आएगा। NEET, UGC-NET और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े पेपर लीक और परीक्षा अनियमितताओं ने लाखों छात्रों के भविष्य पर सवाल खड़े किए हैं। एक छात्र वर्षों तक पढ़ता है, परिवार अपनी बचत लगाता है, मां-बाप कर्ज लेकर कोचिंग की फीस भरते हैं और फिर परीक्षा व्यवस्था की गड़बड़ी सामने आ जाती है। परीक्षा रद्द होती है, तारीख बदलती है, जांच शुरू होती है और छात्र फिर उसी लाइन में खड़ा हो जाता है। पत्रकार पूछेगा—जिस छात्र के जीवन के दो-दो, तीन-तीन साल चले गए, उसका हिसाब कौन देगा? पेपर लीक करने वाले गिरोहों पर कार्रवाई जरूरी है, लेकिन व्यवस्था की जिम्मेदारी कौन लेगा? और जब यही छात्र न्याय मांगने सड़क पर उतरता है तो उसके हाथ में किताब और संविधान होने के बावजूद पुलिस की लाठी क्यों दिखाई देती है?

फिर महंगाई का सवाल होगा। पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस, खाद्य पदार्थ, दूध, सब्जियां, दवाइयां, स्कूल की फीस, किराया—आम परिवार का बजट लगातार दबाव में है। सरकार महंगाई को प्रतिशत और सूचकांकों में समझा सकती है, लेकिन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार महंगाई को महीने की आखिरी तारीख में खाली होती जेब से समझता है। पत्रकार पूछेगा—वास्तविक आय कितनी बढ़ी? आम आदमी की क्रय शक्ति कितनी बढ़ी? रोजमर्रा की जरूरतों पर परिवार कितना ज्यादा खर्च कर रहा है? विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच वह परिवार कहां खड़ा है जो महीने की 25 तारीख आते-आते सोचने लगता है कि बाकी पांच दिन कैसे निकालने हैं? गरीबी घटने के दावों के साथ यह भी बताना होगा कि सम्मानजनक जीवन जीने की क्षमता कितनी बढ़ी है।

फिर देश के बढ़ते कर्ज का सवाल उठेगा। कर्ज लेकर विकास करना अपने आप में गलत नहीं है, अगर उस कर्ज से ऐसी संपत्ति, उद्योग, रोजगार और आर्थिक क्षमता पैदा हो जो भविष्य में देश को मजबूत बनाए। लेकिन सवाल यह है कि केंद्र और राज्यों पर कुल कर्ज कितना है, ब्याज चुकाने में कितना पैसा जा रहा है, सरकार कितनी तेजी से उधार ले रही है और आने वाली पीढ़ियों पर इसका कितना बोझ पड़ेगा? जनता को सिर्फ यह नहीं बताया जाना चाहिए कि देश की अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी हो गई; यह भी बताया जाना चाहिए कि उस विकास के पीछे कर्ज का कितना पहाड़ खड़ा हुआ है।

सरकारी स्कूलों का सवाल भी आएगा। “एक लाख सरकारी स्कूल बंद हुए” जैसे दावों की पत्रकार आंकड़ों से जांच करेगा—कितने स्कूल वास्तव में बंद हुए, कितने दूसरे स्कूलों में विलय किए गए और कितने रिकॉर्ड में किसी दूसरी श्रेणी में चले गए। लेकिन आंकड़ों की बहस से बड़ा सवाल है—गरीब और मध्यमवर्गीय बच्चे अच्छी सरकारी शिक्षा कहां से पाएंगे? कितने स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक हैं? कितने स्कूलों में प्रयोगशाला, पुस्तकालय, शौचालय और दूसरी बुनियादी सुविधाएं हैं? अगर सरकारी स्कूल कमजोर होते जाएंगे और निजी शिक्षा लगातार महंगी होती जाएगी तो क्या शिक्षा धीरे-धीरे अधिकार के बजाय आर्थिक हैसियत का विषय नहीं बन जाएगी?

स्वास्थ्य व्यवस्था भी सवालों से बच नहीं पाएगी। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर और नर्सों की कमी कितनी है? गरीब परिवार के इलाज का वास्तविक खर्च कितना बढ़ा? दवाइयां और जांच कितनी आसानी से उपलब्ध हैं? क्योंकि विकास केवल एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, मेट्रो और ऊंची इमारतों का नाम नहीं है। विकास उस सरकारी अस्पताल का भी नाम है जहां गरीब बिना जमीन बेचे इलाज करा सके और उस सरकारी स्कूल का भी नाम है जहां उसका बच्चा बिना भारी फीस के गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पा सके।

फिर सरकारी संपत्तियों और निजीकरण का सवाल आएगा। रेलवे, एयरपोर्ट, बंदरगाह, सड़क, बिजली, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां और दूसरी सरकारी परिसंपत्तियां—इनमें निजी भागीदारी बढ़ाने की नीति पर सरकार से सवाल पूछना कोई अपराध नहीं है। निजी क्षेत्र को काम देना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन जनता पूछ सकती है कि किस संपत्ति का इस्तेमाल किस मॉडल पर हुआ, किसे अवसर मिला, कितने वर्षों के लिए मिला, सरकार को कितना राजस्व मिला और जनता को क्या लाभ मिला? बड़े कॉरपोरेट समूहों को लगातार बड़े प्रोजेक्ट मिलने पर चयन प्रक्रिया कितनी पारदर्शी थी? प्रतिस्पर्धा कितनी थी? सार्वजनिक हित कितना सुरक्षित रहा?

व्यंग्य में इसे ऐसे भी कहा जा सकता है—नारा है, “एक पेड़ मां के नाम”, लेकिन सवाल यह है कि कहीं विकास की दौड़ में पूरा जंगल किसी एक बड़े कारोबारी के नाम तो नहीं लिखा जा रहा? यह व्यंग्य है, लेकिन इसके पीछे असली सवाल पारदर्शिता का है। किसी कंपनी को कारोबार करना है तो करे, खूब करे, देश की अर्थव्यवस्था मजबूत करे; लेकिन सरकार का काम किसी एक कारोबारी का विस्तार करना नहीं, बल्कि समान अवसर और सार्वजनिक हित सुनिश्चित करना है।

पेट्रोल में इथेनॉल का सवाल भी आएगा। सरकार इसे किसानों की आय, ऊर्जा सुरक्षा और तेल आयात कम करने की नीति बताती है। ठीक है, तो पत्रकार पूछेगा—उपभोक्ता को इसका कितना फायदा मिला? वाहन के माइलेज पर क्या असर पड़ा? तेल आयात में कितनी बचत हुई? किसानों को कितना अतिरिक्त लाभ मिला? खाद्य सुरक्षा और ईंधन नीति के बीच संतुलन कैसे बनाया जा रहा है? करोड़ों वाहन मालिक अगर अधिक ईंधन खर्च कर रहे हैं तो उसका आर्थिक हिसाब क्या है? नीति का उद्देश्य अच्छा होना पर्याप्त नहीं है; यह भी देखना जरूरी है कि उसका अंतिम लाभ किसान और उपभोक्ता दोनों तक पहुंच रहा है।

सड़कें भी अपनी कहानी खुद सुनाती हैं। उद्घाटन के समय बड़े-बड़े मंच, रिबन, कैमरे और भाषण; लेकिन कुछ समय बाद सड़क में गड्ढे। तब सवाल उठता है—ठेका किसे मिला? लागत कितनी थी? गुणवत्ता की जांच किसने की? भुगतान किस आधार पर हुआ? सड़क समय से पहले खराब हुई तो ठेकेदार और जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई हुई? तकनीक और “स्पेस टेक्नोलॉजी” के बड़े दावे अपनी जगह, लेकिन जनता का सीधा सवाल है—सड़क 20 दिन भी नहीं टिकती तो आखिर किस तकनीक का कमाल है?

अब आएगा विदेश नीति का सवाल—और यह सवाल शायद सबसे ज्यादा असहज करने वाला होगा। मंचों पर दुनिया में भारत की बढ़ती ताकत, विश्वगुरु और वैश्विक नेतृत्व की बातें खूब होती हैं। लेकिन पत्रकार पूछेगा—अगर भारत इतना ही निर्णायक वैश्विक खिलाड़ी बन चुका है तो फिर अमेरिकी टैरिफ दबाव, रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव, चीन की चुनौती और पश्चिमी देशों के साथ व्यापारिक तनाव के बीच हमारी रणनीतिक स्वतंत्रता कितनी वास्तविक है? 2026 में भारत को अमेरिकी दबाव और रूस के साथ संबंधों के बीच लगातार संतुलन साधना पड़ा है; विशेषज्ञ विश्लेषण भी इसे रणनीतिक “hedging” और बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच सीमित विकल्पों की राजनीति के रूप में देखते हैं।

और फिर आएगा ट्रंप के आगे नतमस्तक होने का व्यंग्य। अगर विदेश नीति इतनी मजबूत है तो फिर हर बार यह दिखाने की जरूरत क्यों पड़ती है कि अमेरिका के साथ व्यक्तिगत समीकरण ही भारत की कूटनीतिक सफलता का प्रमाण हैं? दोस्ती अच्छी चीज है, लेकिन विदेश नीति दोस्ती से नहीं, राष्ट्रीय हित से चलती है। किसी अमेरिकी राष्ट्रपति से अच्छे संबंध होना भारत के हित में है, लेकिन अगर संबंधों की तस्वीर ऐसी बने कि भारत हर असुविधाजनक सवाल पर पीछे हटता दिखाई दे, तो पत्रकार पूछेगा—यह रणनीतिक साझेदारी है या शक्तिशाली दोस्त के सामने कूटनीतिक झुकाव?

और अब तो सवाल और भी तीखा है। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने कहा कि जून में फ्रांस के एवियां में राजा और ट्रंप की बैठक से पहले भारतीय पक्ष की इच्छा थी कि मीडिया मौजूद रहे, लेकिन सवाल-जवाब न हों। गोर के अनुसार ट्रंप ने बाद में पत्रकारों को खुद सवाल पूछने का मौका दे दिया और बातचीत करीब 45 मिनट चली। भारत सरकार ने इसे VVIP कार्यक्रमों की “standard practice” बताया है, जबकि अन्य रिपोर्टों में सरकारी सूत्रों के हवाले से ट्रंप के “unpredictable behaviour” को लेकर सावधानी की बात भी सामने आई है।

तो व्यंग्य यह है—जिस ट्रंप के सामने विदेश नीति में दोस्ती का इतना ढोल पीटा जाता है, उसी ट्रंप से पत्रकारों के सवालों का डर क्यों? अगर राजा के पास हर सवाल का जवाब है तो ट्रंप को बस एक बात कहनी चाहिए थी—“पूछने दीजिए।” और अगर सवालों से बचने की जरूरत महसूस हुई, तो फिर दुनिया को यह पूछने का अधिकार है कि आखिर डर किस बात का था—सवालों का या जवाबों का?

फिर लोकतंत्र का सबसे असहज सवाल आएगा—सांसदों और विधायकों की खरीद-फरोख्त। जनता वोट देकर सरकार चुनती है, लेकिन चुनाव के बाद अगर जनप्रतिनिधियों की राजनीतिक निष्ठा अचानक बदलने लगे तो सवाल उठेगा—जनादेश किसका था और सत्ता किसकी बनी? दल-बदल विरोधी कानून के बावजूद सरकारें बनाने और गिराने के लिए धनबल तथा राजनीतिक सौदेबाजी के आरोप बार-बार क्यों सामने आते हैं? क्या मतदाता का वोट केवल चुनाव वाले दिन तक महत्वपूर्ण है?

जांच एजेंसियों पर भी सवाल होगा। ED, CBI और आयकर विभाग जैसी संस्थाओं को भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए और किसी को भी कानून से ऊपर नहीं होना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि कार्रवाई की गति और प्राथमिकता में राजनीतिक पक्षपात की धारणा क्यों पैदा होती है? विपक्षी नेताओं पर कार्रवाई होती है तो क्या सत्ता पक्ष के नेताओं पर भी वही कठोरता दिखाई देती है? राजनीतिक समीकरण बदलने के बाद मामलों की दिशा को लेकर सवाल क्यों उठते हैं? जवाब भाषण से नहीं, आंकड़ों और केस रिकॉर्ड से देना होगा।

महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान का सवाल भी सामने होगा। बलात्कार, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, साइबर उत्पीड़न और महिलाओं के खिलाफ अपराधों के आंकड़े क्या कहते हैं? कितने मामलों में FIR हुई? कितने मामलों में चार्जशीट दाखिल हुई? कितने मामलों में सजा हुई? और सोशल मीडिया पर राजनीतिक ट्रोल्स द्वारा महिलाओं को गालियां देने और उनके चरित्र पर हमला करने की संस्कृति पर राजनीतिक दल कब गंभीर होंगे? बीजेपी या RSS से जुड़े होने का दावा करने वाला कोई ट्रोल ऐसा करे तो सवाल होना चाहिए; कांग्रेस या किसी अन्य दल से जुड़ा व्यक्ति ऐसा करे तो उस पर भी उतना ही सवाल होना चाहिए। महिला की गरिमा का कोई राजनीतिक दल नहीं होता।

और मीडिया पर सवाल तो सबसे पहले आएगा। पत्रकार का काम राजा के भाषण की तारीफ करना नहीं, राजा से सवाल पूछना है। सवाल पसंद आए तो भी पूछना है, नापसंद आए तो भी पूछना है। अगर प्रधानमंत्री के सामने केवल पसंदीदा पत्रकार बैठेंगे और कठिन सवाल बाहर रहेंगे, तो जनता को जवाबदेही का पूरा दृश्य कैसे मिलेगा? प्रेस कॉन्फ्रेंस सत्ता पर कोई एहसान नहीं है। यह जनता के प्रति जवाबदेही का मंच है।

तो सवालों की सूची लंबी है—नोटबंदी से क्या हासिल हुआ? काला धन कहां है? GST को बार-बार बदलने की जरूरत क्यों पड़ी? रोजगार कहां हैं? पेपर लीक क्यों नहीं रुकते? छात्रों को अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरना क्यों पड़ता है? महंगाई से आम परिवार को राहत कितनी मिली? गरीबी कितनी घटी? देश का कर्ज कितना बढ़ा? सरकारी संपत्तियों के निजीकरण का पूरा हिसाब क्या है? बड़े कारोबारी समूहों को मिले बड़े प्रोजेक्ट्स में पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित हुई? इथेनॉल नीति में उपभोक्ता का हित कितना सुरक्षित है? सड़कें इतनी जल्दी क्यों टूटती हैं? सांसदों और विधायकों की खरीद-फरोख्त पर लगाम कब लगेगी? जांच एजेंसियां सत्ता और विपक्ष के साथ समान व्यवहार क्यों नहीं करतीं? महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर सरकार की जवाबदेही क्या है? राजनीतिक ट्रोल्स द्वारा महिलाओं के अपमान पर दलों की जिम्मेदारी क्या है? और विदेश नीति के नाम पर विश्वगुरु का दावा करने वाला भारत आखिर बड़े देशों के दबाव में कितना स्वतंत्र है?

और सबसे बड़ा सवाल—ट्रंप के सामने अगर कूटनीतिक शेर की दहाड़ इतनी मजबूत है, तो अपने देश के स्वतंत्र पत्रकारों के सामने सवाल सुनते ही आवाज क्यों धीमी पड़ जाती है?

क्योंकि सरकार की आलोचना करना देश से नफरत करना नहीं है। प्रधानमंत्री से सवाल करना प्रधानमंत्री का अपमान नहीं है। विपक्ष का सवाल देशद्रोह नहीं है। छात्र का प्रदर्शन अपराध नहीं है। पत्रकार का कठिन सवाल लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं है। खतरा तो तब है जब सवाल पूछने वाला ही खतरा समझ लिया जाए।

अगर नोटबंदी सफल हुई तो आंकड़े रखिए। अगर GST ने व्यवस्था सुधारी तो उसका हिसाब रखिए। अगर रोजगार बढ़े तो रोजगार के आंकड़े सामने रखिए। अगर पेपर लीक रुके तो कार्रवाई का रिकॉर्ड दिखाइए। अगर स्कूल सुधरे तो स्कूलों का डेटा रखिए। अगर महंगाई नियंत्रण में है तो परिवार के खर्च का तुलनात्मक हिसाब दीजिए। अगर निजीकरण जनता के हित में है तो पूरा आर्थिक विवरण दीजिए। अगर विदेश नीति सचमुच दुनिया में भारत का दबदबा बढ़ा रही है तो हर बड़े अंतरराष्ट्रीय दबाव में भारत के फैसलों का हिसाब दीजिए। और अगर जांच एजेंसियां पूरी तरह निष्पक्ष हैं तो पार्टीवार कार्रवाई के आंकड़े सामने रखिए।

बस एक काम मत कीजिए—सवाल को दुश्मन मत बनाइए।

क्योंकि टेलीप्रॉम्प्टर के सामने शेर दिखना आसान है। पसंदीदा एंकर के सवाल पर दहाड़ना और भी आसान है। समर्थकों की भीड़ के बीच ताकत दिखाना आसान है। सोशल मीडिया पर ट्रेंड चलाना आसान है। ट्रंप के साथ तस्वीर खिंचवाना भी आसान है।

लेकिन असली परीक्षा तब होती है जब सामने कोई ऐसा पत्रकार बैठा हो जो मुस्कुराकर पूछे—

“राजा साहब, आपने यह वादा किया था… उसका क्या हुआ?”

फिर दूसरा सवाल आए—

“इसका आंकड़ा क्या है?”

और तीसरा सवाल—

“आपके जवाब से ये आंकड़े तो मेल नहीं खाते, अब इसका जवाब क्या है?” वहीं तय होगा कि सामने सचमुच शेर बैठा है या सिर्फ टेलीप्रॉम्प्टर पर शेर की कहानी चल रही है। देश फैसला भी वहीं सुना देगा; तुमसे न हो पाएगा!

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