अंतरराष्ट्रीय/ नेपाल | ABC NATIONAL NEWS | इंटरनेशनल डेस्क | काठमांडू | 25 अगस्त 2026
नेपाल की प्रमुख राजनीतिक पार्टी नेपाली कांग्रेस के भीतर संगठनात्मक और कानूनी संकट गहराता दिखाई दे रहा है। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा तथा पूर्व कार्यवाहक अध्यक्ष पूर्ण बहादुर खड़का ने पार्टी के आगामी 15वें महाधिवेशन की पूरी प्रक्रिया पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। दोनों नेताओं ने अलग-अलग कानूनी याचिकाएं दाखिल की हैं। देउबा ने सीधे तौर पर महाधिवेशन की प्रक्रिया रोकने की मांग की है, जबकि खड़का ने पार्टी की वैधता से जुड़े पहले से चल रहे मामले के साथ अपनी अतिरिक्त याचिका पर विचार करने का आग्रह किया है।
विवाद आखिर है किस बात पर?
मामला नेपाली कांग्रेस के 15वें जनरल कन्वेंशन यानी महाधिवेशन से जुड़ा है। पार्टी की केंद्रीय समिति ने महाधिवेशन 2 से 5 अक्टूबर 2026 के बीच कराने का कार्यक्रम तय किया है। इसके साथ ही पार्टी की चुनाव समिति ने निचले स्तर के संगठनात्मक चुनावों और महाधिवेशन की तैयारी से जुड़ा कार्यक्रम भी जारी कर दिया है। लेकिन अब पार्टी के दो वरिष्ठ नेताओं ने अदालत में जाकर इसी पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इसका सीधा अर्थ है कि नेपाली कांग्रेस के भीतर केवल नेतृत्व को लेकर राजनीतिक मतभेद नहीं हैं, बल्कि पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और उसकी वैधता से जुड़े सवाल अब न्यायपालिका तक पहुंच चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट के अधिकारियों ने दोनों याचिकाएं प्राप्त होने की पुष्टि की है और बताया है कि फिलहाल अदालत इन पर विचार कर रही है। अभी अदालत ने महाधिवेशन रोकने का कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है।
देउबा की याचिका क्यों महत्वपूर्ण है?
शेर बहादुर देउबा नेपाली कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली और लंबे समय तक पार्टी का नेतृत्व करने वाले नेताओं में रहे हैं। इसलिए उनका सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंचना पार्टी के अंदर चल रहे विवाद की गंभीरता को दिखाता है। उन्होंने अपनी रिट याचिका में आगामी महाधिवेशन की प्रक्रिया को रोकने की मांग की है।
दूसरी ओर पूर्ण बहादुर खड़का ने एक अलग आवेदन दिया है। उनका मामला पार्टी की वैधता से जुड़े पहले से लंबित विवाद के साथ जोड़े जाने की मांग करता है। यानी विवाद केवल तारीख या चुनाव कार्यक्रम तक सीमित नहीं है; इसके पीछे यह सवाल भी जुड़ा है कि पार्टी के संगठनात्मक फैसलों और वर्तमान प्रक्रिया को कानूनी रूप से किस आधार पर वैध माना जाए।
अब आगे क्या हो सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल दोनों अर्जियां स्वीकार कर उनकी समीक्षा शुरू की है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि महाधिवेशन रुक ही जाएगा। लेकिन यदि अदालत ने महाधिवेशन की प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगा दी या पार्टी से जवाब मांगते हुए मौजूदा कार्यक्रम पर सवाल उठाए, तो 2 से 5 अक्टूबर के लिए तय महाधिवेशन की पूरी समय-सारणी प्रभावित हो सकती है।
महाधिवेशन से पहले निचले स्तर के संगठनात्मक चुनाव और प्रतिनिधियों के चयन जैसी प्रक्रियाएं भी महत्वपूर्ण होती हैं। इसलिए यदि अदालत किसी स्तर पर रोक लगाती है तो उसका असर केवल अक्टूबर में होने वाले मुख्य सम्मेलन पर नहीं बल्कि उससे पहले की पूरी चुनावी प्रक्रिया पर पड़ सकता है।
नेपाली कांग्रेस के लिए यह सिर्फ एक कानूनी मामला नहीं
नेपाली कांग्रेस नेपाल की सबसे पुरानी और प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में से एक है। पार्टी के भीतर नेतृत्व, संगठन और वैधता को लेकर विवाद का अदालत तक पहुंचना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका असर पार्टी की भविष्य की राजनीतिक दिशा पर पड़ सकता है।
महाधिवेशन किसी भी लोकतांत्रिक राजनीतिक दल में नेतृत्व चुनने और संगठनात्मक ढांचे को नया जनादेश देने की सबसे बड़ी प्रक्रिया होती है। ऐसे में यदि उसी प्रक्रिया की वैधता को लेकर पार्टी के शीर्ष नेताओं में से ही अदालत का दरवाजा खटखटाने की स्थिति बनती है, तो यह नेपाली कांग्रेस के भीतर गहरे मतभेदों का संकेत माना जाएगा।
यह विवाद नेपाल की व्यापक राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण है। नेपाली कांग्रेस देश की सत्ता और विपक्ष की राजनीति में केंद्रीय भूमिका निभाती रही है। पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता या महाधिवेशन में देरी का असर उसके संगठनात्मक प्रदर्शन, आगामी राजनीतिक रणनीति और गठबंधन की राजनीति पर पड़ सकता है।
अभी सबसे बड़ा सवाल
अब असली फैसला सुप्रीम कोर्ट के हाथ में है। क्या अदालत देउबा की मांग पर महाधिवेशन की प्रक्रिया रोकती है? क्या खड़का की याचिका को पहले से चल रहे पार्टी वैधता विवाद के साथ जोड़कर सुनवाई की जाती है? और क्या नेपाली कांग्रेस 2–5 अक्टूबर के निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार महाधिवेशन करा पाएगी?
फिलहाल इन सवालों का जवाब नहीं आया है। लेकिन इतना साफ है कि नेपाली कांग्रेस का अंदरूनी विवाद अब पार्टी कार्यालय से निकलकर नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया है। अक्टूबर का महाधिवेशन अब सिर्फ संगठनात्मक चुनाव नहीं रहा; यह पार्टी के भीतर चल रहे सत्ता, नेतृत्व और वैधता के संघर्ष की अगली बड़ी परीक्षा बन गया है।




