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2036 तक चीन को पीछे छोड़ सकता है भारत का ‘अमीर उपभोक्ता’ बाजार, 8.2 करोड़ नए अफ्लुएंट भारतीय बदल देंगे अर्थव्यवस्था की तस्वीर

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 25 अगस्त 2026

भारत की आर्थिक कहानी अब केवल GDP की तेज रफ्तार, दुनिया की सबसे बड़ी आबादी या विशाल घरेलू बाजार तक सीमित नहीं रह गई है। देश में खर्च करने की क्षमता रखने वाले उपभोक्ताओं की संख्या जिस तेजी से बढ़ने का अनुमान सामने आया है, वह वैश्विक कारोबार के लिए भारत की बदलती हैसियत का संकेत है। NielsenIQ (NIQ) और World Data Lab की रिपोर्ट के अनुसार, 2036 तक भारत में रोजाना 90 डॉलर से अधिक खर्च करने वाले अफ्लुएंट कंज्यूमर्स की संख्या 10.8 करोड़ तक पहुंच सकती है, जबकि चीन में यह संख्या करीब 10.3 करोड़ रहने का अनुमान है। यानी अगले दस वर्षों में भारत इस महत्वपूर्ण उपभोक्ता वर्ग के मामले में चीन को पीछे छोड़ सकता है। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि भारत में 2026 में ऐसे उपभोक्ताओं की अनुमानित संख्या करीब 2.6 करोड़ है, जो 2036 तक बढ़कर 10.8 करोड़ हो सकती है। इसका मतलब है कि एक दशक में करीब 8.2 करोड़ नए भारतीय इस उच्च खर्च वाले वर्ग में शामिल हो सकते हैं। यह केवल आंकड़ों की बढ़ोतरी नहीं है; यह इस बात का संकेत है कि भारत में करोड़ों परिवारों की उपभोग क्षमता, आकांक्षाएं और जीवनशैली तेजी से बदल सकती है। लंबे समय तक वैश्विक कंपनियों ने चीन को एशिया के सबसे बड़े प्रीमियम उपभोक्ता बाजार के रूप में देखा, लेकिन अगर यह अनुमान वास्तविकता में बदलता है तो आने वाले दशक में भारत उस रणनीतिक गणित को बदल सकता है।

इस बदलाव को समझने के लिए सिर्फ 10.8 करोड़ का आंकड़ा देखना पर्याप्त नहीं है। भारत की असली ताकत इस बात में है कि यहां एक साथ दो विशाल उपभोक्ता वर्ग विकसित हो रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब 64.9 करोड़ कोर कंज्यूमर्स हैं, जिनका दैनिक खर्च 13 से 90 डॉलर के बीच है। यानी भारत में एक तरफ करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनकी खर्च करने की क्षमता तेजी से बढ़ रही है और जो बेहतर गुणवत्ता, ब्रांड, सुविधा, यात्रा, टेक्नोलॉजी और प्रीमियम सेवाओं पर अधिक पैसा खर्च कर सकते हैं; दूसरी तरफ करोड़ों उपभोक्ता अभी भी कीमत, उपयोगिता और रोजमर्रा की जरूरतों को प्राथमिकता देते हैं। यही भारत को चीन या विकसित पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं से अलग बनाता है। भारत का बाजार केवल अमीरों का बाजार नहीं बनेगा और न ही केवल सस्ते उत्पादों का बाजार रहेगा। यह एक ऐसा बाजार बन सकता है जहां एक ही समय में प्रीमियम कारों से लेकर सस्ते पैक, लक्जरी होटल से लेकर किफायती यात्रा, महंगे स्मार्टफोन से लेकर बजट डिवाइस और प्रीमियम खाद्य उत्पादों से लेकर रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं तक, हर स्तर पर मांग मौजूद रहेगी। कंपनियों के लिए यह अवसर बहुत बड़ा है, लेकिन इसके साथ चुनौती भी उतनी ही बड़ी है—उन्हें भारत के उपभोक्ता को एक ही नजर से देखना बंद करना होगा।

दुनिया के उपभोक्ता बाजार में इस बदलाव की अहमियत इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि अफ्लुएंट उपभोक्ताओं की संख्या भले ही कुल आबादी के मुकाबले कम हो, लेकिन उनका खर्च असाधारण रूप से अधिक होता है। रिपोर्ट के मुताबिक 2026 में दुनिया में करीब 65.7 करोड़ अफ्लुएंट कंज्यूमर्स हैं, जबकि कोर कंज्यूमर्स की संख्या करीब 410 करोड़ है। इसके बावजूद अफ्लुएंट उपभोक्ताओं के इस छोटे वर्ग से करीब 35.9 ट्रिलियन डॉलर खर्च होने का अनुमान है, जबकि संख्या में कई गुना बड़े कोर उपभोक्ता वर्ग का खर्च करीब 31.6 ट्रिलियन डॉलर रहने का अनुमान है। यानी संख्या से कहीं अधिक महत्वपूर्ण खर्च करने की क्षमता है। एक अफ्लुएंट उपभोक्ता का अनुमानित सालाना खर्च करीब 54,700 डॉलर है, जबकि कोर कंज्यूमर का करीब 7,900 डॉलर। यही वजह है कि भारत में यदि 8.2 करोड़ अतिरिक्त लोग इस वर्ग में प्रवेश करते हैं तो इसका असर केवल शॉपिंग मॉल या लग्जरी ब्रांड की बिक्री पर नहीं पड़ेगा, बल्कि बैंकिंग, निवेश, बीमा, ऑटोमोबाइल, पर्यटन, होटल, विमानन, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, डिजिटल सेवाओं, रियल एस्टेट और मनोरंजन जैसे पूरे उपभोक्ता इकोसिस्टम पर पड़ सकता है।

लेकिन यहां भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या ज्यादा खर्च करने की क्षमता वास्तव में व्यापक आर्थिक समृद्धि में बदल पाएगी? केवल उपभोक्ता संख्या बढ़ने से अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होती। इसके पीछे स्थायी रोजगार, उत्पादकता, वेतन वृद्धि, उद्यमिता, बेहतर बुनियादी ढांचा और आर्थिक अवसरों का विस्तार जरूरी है। यदि करोड़ों भारतीय वास्तव में उच्च खर्च वाले वर्ग में पहुंचते हैं तो इसका मतलब होगा कि देश में आय और उपभोग का एक बड़ा बदलाव हो रहा है। लेकिन अगर उपभोग कुछ सीमित क्षेत्रों, शहरों या आय समूहों तक ही केंद्रित रहा तो आंकड़ा बड़ा होने के बावजूद इसका लाभ व्यापक समाज तक नहीं पहुंचेगा। इसलिए इस रिपोर्ट को केवल भारत की उपभोक्ता ताकत की सफलता की कहानी के रूप में देखना अधूरा होगा। यह सरकार और नीति निर्माताओं के सामने एक बड़ा सवाल भी रखती है—क्या भारत ऐसी अर्थव्यवस्था बना रहा है जहां करोड़ों लोग वास्तव में अपनी आय और जीवन स्तर को ऊपर ले जा सकें, या केवल कुछ हिस्सों में तेजी से बढ़ती समृद्धि दिखाई देगी?

भारतीय उपभोक्ता को लेकर रिपोर्ट का एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष कंपनियों के लिए चेतावनी है। ज्यादा पैसा होने का अर्थ यह नहीं है कि भारतीय उपभोक्ता आंख बंद करके महंगा सामान खरीद लेगा। NIQ के अनुसार, ‘अपग्रेड माइंडसेट’ वाले करीब 60 प्रतिशत उपभोक्ता वैल्यू फॉर मनी को प्राथमिकता देते हैं। लगभग 46 प्रतिशत सुविधा के लिए अधिक भुगतान करने को तैयार हैं और करीब 38 प्रतिशत नए उत्पादों या ब्रांडों को आजमाने के इच्छुक हैं। इसका सीधा अर्थ है कि भारत का नया affluent consumer सिर्फ महंगा उत्पाद नहीं चाहता, वह यह जानना चाहता है कि अतिरिक्त कीमत देने पर उसे अतिरिक्त फायदा क्या मिलेगा। बेहतर गुणवत्ता है तो कीमत स्वीकार होगी, सुविधा वास्तविक है तो भुगतान होगा, ब्रांड पर भरोसा है तो प्रीमियम चलेगा और उत्पाद प्रदर्शन में स्पष्ट अंतर है तो ग्राहक ज्यादा खर्च करेगा। लेकिन सिर्फ पैकेजिंग बदलकर, नाम बदलकर या कीमत बढ़ाकर प्रीमियम उत्पाद बेचने का दौर आसान नहीं होगा। भारत का नया उपभोक्ता ज्यादा जागरूक, ज्यादा तुलना करने वाला और जरूरत के अनुसार खर्च करने वाला उपभोक्ता है।

यही कारण है कि आने वाले वर्षों में भारतीय बाजार में Premiumisation की असली परीक्षा कीमत नहीं, Value होगी। रिपोर्ट के मुताबिक 2021 से 2025 के बीच वैश्विक FMCG कीमतों में करीब 26 प्रतिशत वृद्धि हुई। लगातार महंगाई ने दुनिया भर के उपभोक्ताओं को इस सवाल के प्रति अधिक संवेदनशील बनाया है कि उन्हें अपने पैसे के बदले क्या मिल रहा है। भारत में भी यही प्रवृत्ति मजबूत हो सकती है। एक परिवार किसी खास श्रेणी में प्रीमियम उत्पाद खरीद सकता है, लेकिन दूसरी श्रेणी में सस्ता विकल्प चुन सकता है। कोई उपभोक्ता महंगा फोन खरीद सकता है, लेकिन किराने में ऑफर तलाश सकता है; महंगे रेस्तरां में जा सकता है, लेकिन रोजमर्रा की खरीदारी में कीमत की तुलना कर सकता है। इसलिए भारतीय उपभोक्ता को केवल ‘अमीर’ या ‘गरीब’ की श्रेणी में बांटना आने वाले समय में ज्यादा उपयोगी नहीं होगा। वास्तविकता इससे कहीं ज्यादा जटिल होगी—भारतीय ग्राहक वहां खर्च करेगा जहां उसे कीमत के बदले वास्तविक मूल्य दिखाई देगा।

भारत की यह संभावित छलांग चीन के लिए भी रणनीतिक महत्व रखती है। चीन लंबे समय से वैश्विक कंपनियों के लिए उत्पादन के साथ-साथ उपभोक्ता बाजार का बड़ा केंद्र रहा है। लेकिन यदि 2036 तक भारत में 10.8 करोड़ और चीन में 10.3 करोड़ affluent consumers होते हैं, तो कंपनियों की वैश्विक रणनीति में भारत का वजन और बढ़ना स्वाभाविक है। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत चीन को हर क्षेत्र में पीछे छोड़ देगा। चीन की औद्योगिक क्षमता, सप्लाई चेन, निर्यात नेटवर्क और विनिर्माण आधार की अपनी ताकत है। लेकिन उपभोक्ता बाजार के नजरिए से भारत की युवा आबादी, बढ़ती आय, शहरीकरण, डिजिटल अर्थव्यवस्था और आकांक्षी मध्यम वर्ग मिलकर ऐसा बाजार बना सकते हैं जिसे कोई भी वैश्विक कंपनी नजरअंदाज नहीं कर सकेगी। यही वह बदलाव है जो भारत को सिर्फ ‘दुनिया का बड़ा बाजार’ नहीं बल्कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण भविष्य के उपभोक्ता बाजारों में से एक बना सकता है।

भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर यह है कि आने वाले दशक में कंपनियों को एक ऐसे बाजार का सामना करना होगा जिसमें Volume और Value दोनों साथ बढ़ सकते हैं। भारत की विशाल आबादी रोजमर्रा के उत्पादों की मांग बनाए रखेगी, जबकि करोड़ों नए affluent consumers प्रीमियम उत्पादों और सेवाओं की मांग पैदा करेंगे। इसका मतलब है कि कंपनियों को सिर्फ महंगे उत्पाद बेचने की रणनीति नहीं बनानी होगी। उन्हें छोटे पैक, अलग-अलग कीमतों के विकल्प, बेहतर गुणवत्ता, किफायती प्रीमियम, डिजिटल सेवाएं और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप उत्पाद विकसित करने होंगे। जो कंपनी भारत को केवल ‘कम कीमत में ज्यादा बेचने वाला बाजार’ समझेगी, वह संभवतः आने वाले बदलाव को पूरी तरह नहीं समझ पाएगी। और जो कंपनी केवल बड़े शहरों के अमीर उपभोक्ताओं को भारत मानेगी, वह भी अधूरी तस्वीर देखेगी। भारत का भविष्य का उपभोक्ता बाजार कई स्तरों पर एक साथ बढ़ेगा।

सबसे बड़ी बात यह है कि यह रिपोर्ट भारत के लिए केवल उत्सव मनाने वाला आंकड़ा नहीं है। यह एक अवसर के साथ-साथ जिम्मेदारी भी है। अगर 2036 तक 8.2 करोड़ नए भारतीय affluent consumer बनते हैं तो यह भारत की आर्थिक क्षमता के विस्तार का बड़ा प्रमाण होगा। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि आर्थिक विकास के लाभ व्यापक हों, रोजगार की गुणवत्ता बेहतर हो, वास्तविक आय बढ़े और मध्यम वर्ग मजबूत बने। तभी उपभोक्ता बाजार की यह संभावित क्रांति टिकाऊ आर्थिक ताकत में बदल सकेगी। अगर अनुमान सही साबित हुआ तो 2036 में भारत चीन से आगे निकलकर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा affluent consumer market बन सकता है। तब वैश्विक कंपनियों के सामने भारत केवल 1.4 अरब से अधिक लोगों वाला बाजार नहीं होगा, बल्कि करोड़ों ऐसे उपभोक्ताओं वाला बाजार होगा जो बेहतर जीवन, बेहतर उत्पाद और बेहतर सेवाओं पर खर्च करने की क्षमता रखते हैं।

भारत की अगली आर्थिक लड़ाई केवल उत्पादन की नहीं, उपभोग की भी होगी। सवाल यह नहीं कि भारत के पास कितने उपभोक्ता हैं; असली सवाल यह है कि आने वाले दस वर्षों में कितने भारतीयों की जेब में इतना पैसा होगा कि वे अपनी पसंद से खर्च कर सकें। अगर 8.2 करोड़ नए affluent consumers का अनुमान सच होता है, तो भारत की आर्थिक तस्वीर बदल सकती है—और वैश्विक कंपनियों के लिए चीन के बाद अगला बड़ा सवाल शायद यही होगा: भारत में कितनी जल्दी और कितनी बड़ी हिस्सेदारी बनाई जाए।

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