ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 20 अगस्त 2026
भारतीय राजनीति में बीजेपी ने पिछले वर्षों में अपने लिए एक ऐसी छवि बनाई है जिसमें मजबूत नेतृत्व, राष्ट्रवाद, विकास और निर्णायक सरकार उसके प्रमुख राजनीतिक दावे रहे हैं। लेकिन मौजूदा दौर में पार्टी के सामने एक असहज सवाल खड़ा है—जब सरकार और बीजेपी अलग-अलग मुद्दों पर लगातार घिरती हैं, तो क्या उनके पास हर सवाल का जवाब देने के लिए तथ्य और तर्क हैं, या फिर वे एक बार फिर उसी पुराने राजनीतिक हथियार की तरफ लौट रही हैं, जिसका नाम है—हिंदू-मुसलमान, पाकिस्तान और मुस्लिम लीग? छात्रों और CJP से जुड़े आंदोलनों से लेकर शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था पर उठते सवाल, अमेरिका के साथ ट्रेड डील को लेकर विपक्ष की आपत्तियां, अयोध्या के राम मंदिर से जुड़े चंदे के कथित गबन के आरोप और संसद में सरकार से जवाब मांगता विपक्ष—इन मुद्दों ने सत्ता पक्ष को लगातार रक्षात्मक स्थिति में खड़ा किया है। ऐसे समय में बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन का कांग्रेस को “न्यू मुस्लिम लीग” कहना सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं लगता, बल्कि उस पुराने राजनीतिक रास्ते की वापसी जैसा दिखाई देता है जिसमें जब शासन के सवाल कठिन हो जाएं तो समाज की धार्मिक पहचान को राजनीतिक बहस का केंद्र बना दिया जाए।
सवाल यह है कि कांग्रेस की वंदे मातरम् को लेकर नीति पर बीजेपी को आपत्ति है तो वह खुलकर उस फैसले पर बहस क्यों नहीं करती? कांग्रेस के निर्णय की आलोचना कीजिए, उसके इतिहास और तर्क पर सवाल उठाइए, जनता को बताइए कि पूरा वंदे मातरम् क्यों गाया जाना चाहिए। यह लोकतांत्रिक बहस है और बीजेपी को इसका पूरा अधिकार है। लेकिन कांग्रेस को “नई मुस्लिम लीग” कह देना बहस को मुद्दे से हटाकर पहचान की राजनीति में ले जाना है। आखिर मुस्लिम लीग का नाम आते ही भारतीय राजनीति में कौन-सी स्मृतियां जगाई जाती हैं? विभाजन, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और पाकिस्तान। यानी एक बयान में वर्तमान की राजनीतिक बहस को अतीत के सबसे संवेदनशील धार्मिक-राजनीतिक संघर्ष से जोड़ दिया गया। यही वह जगह है जहां सवाल उठता है कि क्या बीजेपी के पास कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक और वैचारिक तर्क खत्म हो रहे हैं? अगर नहीं, तो फिर हर रास्ता घूम-फिरकर हिंदू-मुसलमान और पाकिस्तान तक क्यों पहुंच रहा है?
और यहां इतिहास की किताब भी बीजेपी के सामने एक असहज आईना लेकर खड़ी है। भारत का विभाजन केवल मुस्लिम लीग के खाते में डाल देना इतिहास को बेहद सरल और सुविधाजनक तरीके से पेश करना होगा। मुस्लिम लीग की विभाजनकारी राजनीति और पाकिस्तान की मांग उसकी ऐतिहासिक भूमिका का महत्वपूर्ण हिस्सा थी, लेकिन विभाजन की राजनीति में उस दौर की दूसरी सांप्रदायिक राजनीतिक धाराओं की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग दोनों ने अलग-अलग राजनीतिक तर्कों से धार्मिक आधार पर राष्ट्र की अवधारणाओं को आगे बढ़ाया। और जिस विनायक दामोदर सावरकर का आज बीजेपी और आरएसएस बड़े सम्मान के साथ उल्लेख करते हैं, उन्होंने 1937 में हिंदू महासभा के अध्यक्ष के रूप में अपने भाषण में भारत में “दो राष्ट्र” की अवधारणा की बात रखी थी। बाद में मुस्लिम लीग ने भी अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग को राजनीतिक आंदोलन का केंद्र बनाया। इसलिए आज अगर बीजेपी कांग्रेस को “मुस्लिम लीग” कहकर राष्ट्रवाद का प्रमाणपत्र बांटती है, तो इतिहास उससे यह सवाल भी पूछता है कि टू-नेशन थ्योरी की राजनीति के इतिहास में हिंदू महासभा और सावरकर की भूमिका को वह किस तरह देखती है?
यही वह ऐतिहासिक विरोधाभास है जिसे बीजेपी को जनता के सामने स्पष्ट करना चाहिए। अगर मुस्लिम लीग का नाम लेना आज राष्ट्रविरोधी राजनीति का पर्याय है, तो फिर सावरकर के राजनीतिक इतिहास की उस भूमिका पर बीजेपी की क्या व्याख्या है? अगर विभाजन के लिए केवल मुस्लिम लीग को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त है, तो फिर हिंदू महासभा की उस समय की राजनीति पर चर्चा क्यों नहीं होती? इतिहास को चुन-चुनकर राजनीतिक हथियार बनाना इतिहास नहीं, इतिहास का राजनीतिक इस्तेमाल है। और यही समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब सत्ता में बैठी पार्टी अपने राजनीतिक विरोधियों को इतिहास के सबसे भयावह अध्यायों से जोड़कर वर्तमान की बहस को ध्रुवीकृत करने लगे।
बीजेपी को यह भी बताना चाहिए कि आज का भारत 1940 का भारत नहीं है। आज करोड़ों युवा रोजगार, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, महंगाई, कारोबार, तकनीक और आर्थिक अवसरों की चिंता कर रहे हैं। उन्हें यह जानना है कि उनके बच्चों का भविष्य क्या होगा। उन्हें यह जानना है कि परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा कैसे कायम होगा। उन्हें यह जानना है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों का किसान, मजदूर, छोटे कारोबारी और उद्योग पर क्या असर पड़ेगा। उन्हें यह जानना है कि मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं से जुड़े धन के आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी या नहीं। लेकिन राजनीति बार-बार उन्हें बताना चाहती है कि असली सवाल यह नहीं है—असली सवाल यह है कि सामने वाला हिंदू है या मुसलमान, भारत समर्थक है या पाकिस्तान समर्थक। यह जनता के सवालों को छोटा करने की कोशिश है।
संसद का हालिया राजनीतिक वातावरण भी इसी बहस का हिस्सा है। विपक्ष का आरोप रहा है कि महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की सदन में मौजूदगी को लेकर सवाल उठे और विपक्ष लगातार जवाब मांगता रहा। अगर विपक्ष के आरोप गलत हैं तो सरकार को सदन में खड़े होकर उन्हें गलत साबित करना चाहिए। संसद किसी पार्टी का प्रचार मंच नहीं है। संसद वह जगह है जहां सरकार से सवाल पूछा जाता है और सरकार जवाब देती है। अगर सरकार को लगता है कि विपक्ष झूठ बोल रहा है, तो आंकड़े रखिए, दस्तावेज रखिए, तथ्य रखिए और विपक्ष को सदन के भीतर जवाब दीजिए। लेकिन अगर संसद के सवालों का जवाब राजनीतिक रैलियों में हिंदू-मुसलमान के नारों से दिया जाने लगे, तो लोकतंत्र की गंभीरता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
बीजेपी के लिए यह समझना जरूरी है कि हर राजनीतिक संकट का समाधान धार्मिक ध्रुवीकरण नहीं हो सकता। CJP और छात्रों के आंदोलनों पर सवाल हैं तो छात्रों को जवाब चाहिए। अगर सरकार को लगता है कि आंदोलन राजनीति से प्रेरित है, तो भी छात्रों की वास्तविक शिकायतों का जवाब देना पड़ेगा। अमेरिका के साथ ट्रेड डील पर सवाल हैं तो समझौते की शर्तें और उसके फायदे-नुकसान जनता के सामने रखिए। अयोध्या मंदिर के चंदे को लेकर आरोप हैं तो जांच को पारदर्शी बनाइए और तथ्य सामने रखिए। किसी आरोप को विपक्ष की साजिश बताने से आरोप समाप्त नहीं हो जाता। सवाल का जवाब देना पड़ता है। यही लोकतंत्र है।
लेकिन बीजेपी की राजनीति अगर इन सवालों से निकलकर सीधे “कांग्रेस = मुस्लिम लीग” तक पहुंचती है, तो यह सिर्फ विपक्ष पर हमला नहीं है। यह एक राजनीतिक स्वीकारोक्ति जैसी दिखाई देती है कि पार्टी को लगता है कि धार्मिक ध्रुवीकरण अब भी सबसे प्रभावी राजनीतिक रास्ता है। यानी बेरोजगारी की बहस को पाकिस्तान से काटो, शिक्षा की बहस को मुसलमान से जोड़ो, आर्थिक नीतियों पर सवाल उठें तो राष्ट्रवाद सामने रखो और भ्रष्टाचार के आरोप लगें तो राजनीतिक साजिश की बात करो। यह रणनीति चुनावी राजनीति में कुछ समय के लिए काम कर सकती है, लेकिन शासन की विश्वसनीयता का विकल्प नहीं बन सकती।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बीजेपी को सचमुच लगता है कि भारत की जनता हमेशा इसी राजनीतिक पटकथा में फंसी रहेगी? भारत का युवा अब सोशल मीडिया पर केवल भाषण नहीं सुनता, वह दस्तावेज खोजता है। वह एक बयान को दूसरे बयान से मिलाता है। वह इतिहास पढ़ता है। वह दुनिया की राजनीति देखता है। वह अमेरिका, चीन, यूरोप और एशिया की अर्थव्यवस्था की तुलना करता है। वह जानता है कि दूसरे देशों में रोजगार, शिक्षा और तकनीक पर बहस हो रही है। वह यह भी पूछता है कि भारत में हर गंभीर सवाल के बीच पाकिस्तान क्यों आ जाता है?
और बीजेपी को यह भी याद रखना चाहिए कि हिंदू समाज को केवल भावनात्मक नारों से हमेशा संतुष्ट नहीं किया जा सकता। हिंदू समाज का युवा भी नौकरी चाहता है। किसान भी अपनी फसल का उचित मूल्य चाहता है। व्यापारी भी स्थिर आर्थिक नीति चाहता है। मध्यम वर्ग भी महंगाई और टैक्स का हिसाब चाहता है। छात्र भी निष्पक्ष परीक्षा चाहता है। माता-पिता भी अपने बच्चों के भविष्य को लेकर आश्वस्त होना चाहते हैं। उन्हें मंदिर की राजनीति के साथ-साथ मंदिर के चंदे का हिसाब भी चाहिए। उन्हें राष्ट्रवाद के साथ-साथ अर्थव्यवस्था की मजबूती भी चाहिए। उन्हें पाकिस्तान का नाम सुनने से ज्यादा यह जानना है कि उनके घर की आर्थिक स्थिति कब बेहतर होगी।
इसलिए बीजेपी अध्यक्ष का “न्यू मुस्लिम लीग” वाला बयान कांग्रेस को जितना निशाना बनाता है, उससे कहीं ज्यादा यह बीजेपी की राजनीतिक प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है। क्या बीजेपी 2026 के भारत के सवालों का सामना करने के लिए तैयार है, या वह फिर 1947 के जख्मों को कुरेदकर 2026 की राजनीति चलाना चाहती है? क्या वह रोजगार पर बहस करेगी या पाकिस्तान पर? क्या वह शिक्षा व्यवस्था पर बहस करेगी या मुसलमानों पर? क्या वह व्यापार समझौतों की शर्तों पर बहस करेगी या राष्ट्रवाद का प्रमाणपत्र बांटेगी? क्या वह भ्रष्टाचार के आरोपों पर दस्तावेज रखेगी या विपक्ष को देशविरोधी बताएगी?
यहां एक और बात साफ होनी चाहिए। कांग्रेस कोई पवित्र राजनीतिक संस्था नहीं है। उसकी गलतियों पर सवाल उठना चाहिए। उसके फैसलों की आलोचना होनी चाहिए। उसकी वंशवादी राजनीति, उसकी नीतियों और उसके शासन का हिसाब भी जनता को मिलना चाहिए। लेकिन कांग्रेस को हराने का सबसे मजबूत तरीका उसे “मुस्लिम लीग” कहना नहीं है। उसे राजनीतिक और वैचारिक रूप से पराजित करना है। अगर बीजेपी के पास बेहतर आर्थिक मॉडल है तो वह सामने रखे। अगर बेहतर शिक्षा नीति है तो बताए। अगर बेहतर रोजगार नीति है तो लागू करे। अगर बेहतर शासन है तो उसके आंकड़े सामने रखे। लोकतंत्र में विपक्ष को गाली देकर नहीं, जनता का विश्वास जीतकर हराया जाता है।
असल संकट यह है कि भारतीय राजनीति में धार्मिक ध्रुवीकरण इतना सामान्य बनाया जा रहा है कि राजनीतिक दलों को लगता है कि हर चुनाव और हर संकट में हिंदू-मुसलमान का मुद्दा उठाना स्वाभाविक है। यही वह प्रवृत्ति है जिसे रोकने की जरूरत है। क्योंकि जब राजनीति लगातार धर्म के आधार पर समाज को बांटती है, तो अंततः नुकसान किसी एक पार्टी का नहीं होता—नुकसान देश के सामाजिक ताने-बाने का होता है। लोकतंत्र में असहमति दुश्मनी नहीं होती। विपक्ष राष्ट्र का शत्रु नहीं होता। सरकार की आलोचना देश की आलोचना नहीं होती। और किसी नागरिक का सरकार से सवाल पूछना उसे पाकिस्तान का समर्थक नहीं बना देता।
बीजेपी के सामने अब चुनाव सिर्फ कांग्रेस से नहीं है। चुनाव उसकी अपनी राजनीतिक भाषा से भी है। वह चाहे तो एक परिपक्व लोकतांत्रिक पार्टी की तरह सवालों का जवाब दे सकती है। वह चाहे तो संसद को फिर गंभीर बहस का मंच बना सकती है। वह चाहे तो छात्रों के आक्रोश को सुने, आर्थिक नीतियों पर पारदर्शिता दिखाए, संस्थाओं पर भरोसा कायम करे और भ्रष्टाचार के हर आरोप की निष्पक्ष जांच का समर्थन करे। लेकिन अगर रास्ता बार-बार हिंदू-मुसलमान, पाकिस्तान और मुस्लिम लीग की तरफ ही जाएगा, तो सवाल उठेगा कि क्या बीजेपी के पास वर्तमान के सवालों का जवाब नहीं है?
क्योंकि राजनीति का यह सबसे आसान फार्मूला है—जब जनता रोजगार पूछे तो धर्म की बात करो, जब छात्र परीक्षा पूछें तो राष्ट्रवाद की बात करो, जब विपक्ष आर्थिक नीति पूछे तो पाकिस्तान की बात करो और जब भ्रष्टाचार पर सवाल हो तो राजनीतिक साजिश की बात करो। लेकिन यह फार्मूला हमेशा नहीं चलता। लोकतंत्र आखिरकार सवाल पूछता है। जनता आखिरकार हिसाब मांगती है। और इतिहास भी आखिरकार हिसाब मांगता है।
भारत को 1947 की नफरत से 2026 का भविष्य नहीं बनाना है। भारत को 2026 के सवालों के जवाब 2026 की राजनीति से चाहिए। बीजेपी अगर सचमुच दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों में अपनी जगह का दावा करती है, तो उसे भी बड़ी राजनीति करनी होगी—छोटी सांप्रदायिक लकीरों से ऊपर उठकर। क्योंकि हर बार हिंदू-मुसलमान का कार्ड निकालना ताकत की निशानी नहीं है। कई बार यह इस बात का संकेत होता है कि सत्ता के पास सवालों के जवाब कम पड़ रहे हैं।
और अगर राजनीति फिर से उसी पुराने हिंदू-मुसलमान-पाकिस्तान के रास्ते पर लौटती है, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय राजनीति भविष्य की तरफ बढ़ने के बजाय अपने ही अतीत के गटर में उतर रही है।




