राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 20 अगस्त 2026
अभिजीत डिपके और कॉकरोच जनता पार्टी ने जब यह सीधा सवाल उठाया कि पीएम केयर फंड में पड़े करीब साढ़े आठ हजार करोड़ रुपये का इस्तेमाल बच्चों के स्कूल सुधारने में क्यों नहीं किया जा सकता, तो भाजपा के गोवा इकाई समेत पूरे पार्टी तंत्र में जैसे आग लग गई। उन्होंने तुरंत जवाब दिया कि पीएम केयर फंड इमरजेंसी और आपदा राहत के लिए है, केजरीवाल ने डिपके को बुनियादी तथ्य नहीं सिखाए, और फिर पंजाब के स्कूलों का हवाला देकर ध्यान भटकाने की कोशिश की। लेकिन असली बात यह है कि सवाल इतना सीधा और असुविधाजनक था कि भाजपा को इसके जवाब में सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप और राजनीतिक हमला ही सूझा। बच्चों की शिक्षा और स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं का मुद्दा उठाने वाले को “थिएटर” और “पेट प्रोजेक्ट” कहकर खारिज कर देना आसान है, लेकिन आंकड़े और जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करना मुश्किल हो रहा है।
पीएम केयर फंड की सच्चाई और खर्च का खेल
पीएम केयर फंड के 2024-25 के ऑडिटेड आंकड़ों के अनुसार इस फंड का कॉर्पस बढ़कर 8452 करोड़ रुपये हो गया है, जो पिछले साल के 7173 करोड़ से करीब 18 प्रतिशत ज्यादा है। दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे साल में फंड से खर्च केवल 88 लाख रुपये के आसपास हुआ, यानी कुल रकम का महज 0.01 प्रतिशत। बाकी करीब 93 प्रतिशत पैसा फिक्स्ड डिपॉजिट में बंद करके ब्याज कमाया जा रहा है। दान कम हुए, लेकिन ब्याज और रिफंड से कॉर्पस बढ़ता गया। जब शिक्षा मंत्रालय और राज्य सरकारें बार-बार कहती हैं कि स्कूलों में बेंच-डेस्क, पीने का पानी, साफ टॉयलेट और मरम्मत के लिए पर्याप्त बजट नहीं है, तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि इतनी बड़ी रकम आपदा के नाम पर जमा करके क्यों रखी जा रही है। अगर यह पैसा वाकई जनता का है और आपात स्थितियों के लिए है, तो बच्चों की शिक्षा जैसी स्थायी आपात स्थिति पर इसे लगाने में क्या आपत्ति हो सकती है। भाजपा इस सवाल से इतनी चिढ़ क्यों गई, इसका जवाब शायद यही है कि यह सवाल उनकी प्राथमिकताओं को बेनकाब करता है।
सरकारी स्कूलों की हकीकत आंकड़ों और जमीन दोनों पर
यूडीआईएसई प्लस 2025-26 के आंकड़े बताते हैं कि देश के स्कूलों में पीने के पानी की उपलब्धता 99.5 प्रतिशत, बिजली 95 प्रतिशत और लड़कियों के टॉयलेट 98.5 प्रतिशत तक पहुंच गई है। लेकिन ये प्रतिशत सिर्फ उपलब्धता दिखाते हैं, कार्यक्षमता और गुणवत्ता की बात नहीं करते। कंप्यूटर केवल 69.9 प्रतिशत स्कूलों में हैं, इंटरनेट 67.4 प्रतिशत में। दिव्यांग बच्चों के लिए अनुकूल टॉयलेट सिर्फ 40 प्रतिशत स्कूलों में उपलब्ध हैं और रैंप के साथ हैंडरेल केवल 58 प्रतिशत स्कूलों में। लाखों स्कूल अभी भी बिना पर्याप्त बेंच-डेस्क, टूटी खिड़कियों, गंदे टॉयलेट और अनियमित पानी की आपूर्ति के चल रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में बच्चे आज भी फर्श पर बैठकर पढ़ते हैं, टॉयलेट इस्तेमाल करने लायक नहीं होते और पीने का पानी या तो आता ही नहीं या गंदा होता है। “स्कूल ठीक करो” अभियान के दौरान कई गांवों में यही तस्वीर बार-बार सामने आई है। आधिकारिक आंकड़े और जमीनी अनुभव के बीच का यह अंतर ही बताता है कि सिर्फ प्रतिशत बढ़ाकर समस्या हल नहीं होती। जब तक बुनियादी सुविधाएं सही मायने में काम न करें, तब तक “सुधार” का दावा खोखला ही रहेगा।
पंजाब का मुद्दा और ध्यान भटकाने की कोशिश
भाजपा ने डिपके को पंजाब के स्कूल देखने की सलाह दी, मानो वहां की स्थिति खराब बताकर पूरे मुद्दे को कमजोर किया जा सकता है। पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार ने पिछले साढ़े चार साल में स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर पर करीब 2300 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। हजारों नए टॉयलेट बने, दो लाख डेस्क बांटे गए, नए क्लासरूम और लैब बनाए गए। यूडीआईएसई आंकड़ों में भी पंजाब स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में देश के शीर्ष राज्यों में शुमार है। लेकिन केंद्र के पास 8450 करोड़ रुपये बेकार पड़े हैं, उस पर सवाल पूछने से भाजपा को इतनी तकलीफ क्यों होती है? अगर पंजाब में सुधार हुआ है तो वह राज्य सरकार की जिम्मेदारी और बजट का नतीजा है। केंद्र के पास जमा जनता के पैसे को स्कूलों में लगाने का सवाल अलग है। भाजपा बार-बार राज्य की उपलब्धियों को लक्ष्य बनाकर केंद्र की निष्क्रियता छिपाने की कोशिश करती है, लेकिन यह रणनीति अब उतनी असरदार नहीं रह गई है।
इरादे की कमी ही असली समस्या है
सच यह है कि बच्चों को अच्छी शिक्षा देना इस सरकार के लिए “इमरजेंसी” नहीं लगता। जनता का पैसा फिक्स्ड डिपॉजिट में रखकर ब्याज कमाना प्राथमिकता लगता है। जब कोई सवाल पूछता है तो उसे थिएटर, पेट प्रोजेक्ट या विपक्षी साजिश करार दे दिया जाता है। अगर पीएम केयर फंड का एक हिस्सा भी स्कूलों की मरम्मत, नए बेंच-डेस्क, साफ पानी, ठीक टॉयलेट और नई बिल्डिंग पर लग जाए तो करोड़ों गरीब बच्चों का भविष्य बदल सकता है। लेकिन इसके लिए इरादा चाहिए। पैसा तो है, इरादा नहीं है। यही कारण है कि साधारण से सवाल पर भाजपा को इतनी मिर्ची लग गई। स्कूल ठीक करो अभियान सिर्फ नारा नहीं, बल्कि उन बच्चों की आवाज है जो आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में पढ़ने को मजबूर हैं।




