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26/11 के 18 साल बाद हाफिज सईद समेत 6 आतंकियों पर शिकंजा, भारत में शुरू होगी गैरहाजिरी में सुनवाई

अपराध/ अंतरराष्ट्रीय/ राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 18 अगस्त 2026

मुंबई पर हुए 26/11 के आतंकी हमले को 18 साल बीत चुके हैं, लेकिन इस हमले के पीछे मौजूद उन चेहरों और साजिशकर्ताओं पर भारतीय कानून का शिकंजा अब और कसने जा रहा है, जो पाकिस्तान में बैठे रहे और भारतीय अदालत के सामने कभी पेश नहीं हुए। मुंबई पुलिस ने 26/11 मामले में पाकिस्तान स्थित आतंकी नेटवर्क से जुड़े छह फरार आरोपियों के खिलाफ ‘इन एब्सेंटिया’ यानी उनकी गैरमौजूदगी में मुकदमा चलाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इनमें लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख चेहरों में शामिल हाफिज सईद और जकी-उर-रहमान लखवी के अलावा साजिद मीर, अबू अलकामा, आसिम उर्फ अबू काहफा और मेजर अब्दुर रहमान पाशा के नाम शामिल हैं। ट्रायल कोर्ट की ओर से इन छह आरोपियों के खिलाफ उद्घोषणा जारी की जा चुकी है और अब उस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद उनके खिलाफ उनकी गैरमौजूदगी में मुकदमा आगे बढ़ाने की तैयारी है। यानी 26/11 की उस साजिश के खिलाफ भारतीय न्यायिक प्रक्रिया अब उन आरोपियों की अनुपस्थिति को मुकदमे में बाधा बनने नहीं देगी, जो वर्षों से भारत की अदालतों से दूर हैं।

26/11: मुंबई पर हमला, लेकिन साजिश की जड़ें पाकिस्तान तक

26 नवंबर 2008 की रात मुंबई में शुरू हुआ आतंकी हमला सिर्फ एक शहर पर हमला नहीं था। दस आतंकियों ने समुद्री रास्ते से मुंबई में दाखिल होकर कई जगहों को निशाना बनाया और करीब तीन दिन तक देश की आर्थिक राजधानी को दहशत में रखा। छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस, ताज होटल, ओबेरॉय ट्राइडेंट, नरीमन हाउस और अन्य स्थानों पर हुए हमलों में 166 लोगों की जान गई और सैकड़ों लोग घायल हुए। भारतीय सुरक्षा बलों ने जवाबी कार्रवाई में नौ आतंकियों को मार गिराया, जबकि अजमल कसाब को जिंदा पकड़ा गया। कसाब की गिरफ्तारी ने जांच एजेंसियों को हमले की साजिश, प्रशिक्षण, समुद्री रास्ते और पाकिस्तान से जुड़े नेटवर्क तक पहुंचने में महत्वपूर्ण सुराग दिए। बाद की जांच में हमले के पीछे मौजूद हैंडलरों और साजिशकर्ताओं की भूमिका सामने आई और कई नाम भारतीय जांच के केंद्र में आए। लेकिन इस पूरी कहानी का एक बड़ा हिस्सा अदालत के सामने अधूरा रहा, क्योंकि जिन प्रमुख आरोपियों पर भारत ने गंभीर आरोप लगाए, वे पाकिस्तान में मौजूद रहे और भारतीय न्यायिक प्रक्रिया के सामने पेश नहीं हुए।

हाफिज सईद और लखवी समेत छह पर अब अदालत की नजर

मुंबई पुलिस की ताजा कार्रवाई इसी अधूरे न्यायिक अध्याय को आगे बढ़ाने की कोशिश है। पुलिस ने इस संबंध में विशेष लोक अभियोजक उज्ज्वल निकम को पत्र भेजकर छह फरार आरोपियों के खिलाफ इन एब्सेंटिया ट्रायल की प्रक्रिया शुरू करने की जानकारी दी है। अभियोजन पक्ष के अनुसार ट्रायल कोर्ट ने इन छह आरोपियों के खिलाफ उद्घोषणा जारी की है। इसके बाद निर्धारित कानूनी प्रक्रिया पूरी होने पर अदालत उनकी गैरमौजूदगी में मुकदमे की कार्यवाही आगे बढ़ा सकती है। सूची में हाफिज सईद और जकी-उर-रहमान लखवी के नाम सबसे प्रमुख हैं। इनके अलावा साजिद मीर, अबू अलकामा, आसिम उर्फ अबू काहफा और मेजर अब्दुर रहमान पाशा भी इस प्रक्रिया के दायरे में हैं। इन सभी के खिलाफ भारतीय जांच एजेंसियों ने 26/11 की साजिश और आतंकी हमले से जुड़े गंभीर आरोपों के आधार पर कार्रवाई की मांग की है।

‘इन एब्सेंटिया ट्रायल’ क्या है और क्यों अहम है?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब आरोपी भारत में मौजूद ही नहीं हैं तो मुकदमा कैसे चलेगा? इन एब्सेंटिया ट्रायल का मूल अर्थ है आरोपी की अनुपस्थिति में न्यायिक कार्यवाही आगे बढ़ाना, जब कानून में निर्धारित शर्तें पूरी हो जाएं और आरोपी को अदालत के सामने लाने के लिए आवश्यक प्रक्रिया अपनाई जा चुकी हो। 26/11 मामले में यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत लंबे समय से उन आरोपियों को अदालत के सामने लाने की कोशिश करता रहा है जिन पर हमले की साजिश और उसे अंजाम देने में मदद करने के आरोप हैं, लेकिन वे भारत की हिरासत में नहीं हैं। अब अदालत द्वारा जारी उद्घोषणा और आगे की कानूनी प्रक्रिया के बाद उनकी अनुपस्थिति को मुकदमे को अनिश्चितकाल तक रोकने का आधार नहीं बनने देने की दिशा में कदम उठाया जा रहा है। इसका मतलब यह नहीं है कि अदालत पहले से किसी आरोपी को दोषी मान रही है। मुकदमे में अभियोजन को अपने आरोप और सबूत अदालत के सामने रखने होंगे और अंतिम फैसला न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होगा।

18 साल बाद भी क्यों जिंदा है 26/11 का मामला?

26/11 का मामला भारत के लिए सिर्फ एक पुराना आतंकी केस नहीं है। यह उन मामलों में शामिल है जिसने भारत की सुरक्षा व्यवस्था, समुद्री निगरानी, आतंकवाद-रोधी रणनीति और भारत-पाकिस्तान संबंधों को लंबे समय तक प्रभावित किया। हमले के बाद जांच में यह सवाल लगातार सामने आया कि मुंबई में आतंकियों का प्रवेश कैसे हुआ, उन्हें समुद्र के रास्ते किस तरह मदद मिली, हमले के दौरान उन्हें निर्देश कौन दे रहा था और पाकिस्तान में बैठे हैंडलरों की भूमिका क्या थी। अजमल कसाब की गिरफ्तारी और उससे मिली जानकारी ने जांच को महत्वपूर्ण दिशा दी। लेकिन साजिश के उन हिस्सों तक न्यायिक प्रक्रिया को पहुंचाना कठिन रहा जिनमें पाकिस्तान में बैठे आरोपी शामिल थे। भारत की तरफ से बार-बार इन आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई और उन्हें न्याय के सामने लाने की मांग उठती रही, लेकिन उनकी भारत में मौजूदगी नहीं होने के कारण मामला लंबे समय तक अटका रहा।

पाकिस्तान में बैठे आरोपियों तक पहुंचने की चुनौती

इस मामले की सबसे बड़ी चुनौती यही रही कि भारतीय जांच एजेंसियों द्वारा चिन्हित कई आरोपी भारत की न्यायिक सीमा से बाहर हैं। ऐसे मामलों में किसी आरोपी को भारत लाना केवल जांच या अदालत का मामला नहीं रहता, बल्कि इसमें अंतरराष्ट्रीय सहयोग, प्रत्यर्पण, संबंधित देश की कार्रवाई और कूटनीतिक स्तर पर भी कई सवाल जुड़ जाते हैं। 26/11 के मामले में यही चुनौती वर्षों से सामने रही है। भारत ने हमले की साजिश से जुड़े आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की, लेकिन पाकिस्तान में मौजूद प्रमुख आरोपियों के खिलाफ भारतीय अदालत में सामान्य तरीके से मुकदमा चलाना संभव नहीं हो पाया। अब गैरहाजिरी में ट्रायल की प्रक्रिया इसी न्यायिक गतिरोध को तोड़ने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है।

अब अदालत में क्या होगा?

विशेष लोक अभियोजक उज्ज्वल निकम के अनुसार ट्रायल कोर्ट ने छह फरार आरोपियों के खिलाफ उद्घोषणा जारी की है। निर्धारित प्रक्रिया के तहत इस उद्घोषणा से संबंधित रिपोर्ट अदालत के सामने आने के बाद उनके खिलाफ गैरहाजिरी में मुकदमा आगे बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इसका अगला चरण अभियोजन की ओर से आरोपों और उपलब्ध सबूतों को अदालत के सामने रखना हो सकता है। जांच एजेंसियों के पास हमले की साजिश से जुड़े डिजिटल, तकनीकी, संचार और अन्य साक्ष्यों के आधार पर अपनी बात रखने का अवसर होगा। अदालत इन सबूतों को कानून के मुताबिक परखेगी और बचाव पक्ष के अधिकार भी न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप सुनिश्चित किए जाएंगे। यानी अब यह मामला केवल पाकिस्तान से आरोपियों को भारत लाने की कोशिश तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारतीय अदालत के सामने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर न्यायिक परीक्षण की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

26/11 के पीड़ितों के लिए न्याय की लंबी लड़ाई

18 साल का यह अंतराल अपने आप में बहुत कुछ कहता है। जिन परिवारों ने अपने लोगों को खोया, उनके लिए 26/11 आज भी केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं है। मुंबई में उस रात की गोलियों, धमाकों और आतंक की यादें आज भी इस हमले की गंभीरता को सामने रखती हैं। ऐसे में मामले में शामिल फरार आरोपियों के खिलाफ न्यायिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाना पीड़ित परिवारों के लिए भी महत्वपूर्ण है। हालांकि किसी भी मुकदमे में न्याय का अंतिम आधार भावनाएं नहीं, बल्कि अदालत के सामने पेश किए गए सबूत और कानून होते हैं। इसलिए इस प्रक्रिया की सफलता इसी में होगी कि मामला मजबूत साक्ष्यों के साथ अदालत में आगे बढ़े और हर आरोपी की भूमिका का न्यायिक परीक्षण हो।

भारत के लिए संदेश साफ—आतंक की साजिश का हिसाब बाकी है

26/11 के मामले में इन एब्सेंटिया ट्रायल की शुरुआत एक बड़ा न्यायिक कदम जरूर है, लेकिन इसे अंतिम परिणाम नहीं माना जा सकता। अभी अदालत की प्रक्रिया आगे बढ़नी है, आरोपों का परीक्षण होना है और सबूतों की कानूनी कसौटी पर जांच होनी है। फिर भी 18 साल पुराने इस मामले में छह फरार आरोपियों के खिलाफ भारतीय अदालत की कार्यवाही आगे बढ़ने की तैयारी अपने आप में महत्वपूर्ण है। संदेश साफ है—आरोपी भारत से बाहर हों, अदालत के सामने मौजूद न हों या वर्षों तक न्यायिक प्रक्रिया से दूर रहें, इससे गंभीर आतंकी मामलों की जांच और न्याय की प्रक्रिया हमेशा के लिए खत्म नहीं हो जाती।

26/11 ने मुंबई को जख्म दिया था, लेकिन उस हमले की पूरी साजिश का न्यायिक हिसाब अभी बाकी था। अब 18 साल बाद भारतीय अदालत उस अधूरे अध्याय को आगे बढ़ाने की तैयारी में है। हाफिज सईद, लखवी और चार अन्य फरार आरोपियों के खिलाफ गैरहाजिरी में मुकदमा इसी दिशा में एक बड़ा कदम है। अब नजर अदालत पर होगी—क्या उपलब्ध सबूत उस साजिश की पूरी तस्वीर सामने ला पाएंगे और क्या 26/11 के उन आरोपियों तक कानून की पहुंच आखिरकार न्याय के अंतिम फैसले तक पहुंचेगी?

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