राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 18 अगस्त 2026
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मौत की सजा दिए जाने के तरीके को लेकर बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने फांसी के मौजूदा तरीके को असंवैधानिक घोषित करने से इनकार कर दिया और 1983 के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें फांसी को मौत की सजा लागू करने का संवैधानिक तरीका माना गया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने भविष्य के लिए दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया है। अदालत ने साफ किया कि वैज्ञानिक ज्ञान, तकनीक और चिकित्सा क्षेत्र में होने वाले नए विकास के आधार पर आने वाले समय में फांसी के विकल्प की दोबारा समीक्षा की जा सकती है। यानी फिलहाल भारत में मौत की सजा पाने वाले दोषियों के लिए फांसी ही कानूनी तरीका बनी रहेगी, लेकिन अगर भविष्य में कोई ऐसा वैज्ञानिक और कम पीड़ादायक विकल्प सामने आता है जो दोषी की गरिमा को भी बनाए रख सके, तो केंद्र सरकार मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों नहीं बदला फांसी का तरीका?
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने उस चुनौती को खारिज कर दिया जिसमें फांसी को मौत की सजा लागू करने का असंवैधानिक और अमानवीय तरीका बताया गया था। अदालत के सामने मूल सवाल यह था कि क्या संविधान के तहत अदालत खुद फांसी की जगह किसी दूसरे तरीके को लागू करने का निर्देश दे सकती है। याचिकाकर्ता वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने व्यक्तिगत रूप से याचिका दायर करते हुए तर्क दिया था कि फांसी एक पुराना और पीड़ादायक तरीका है तथा यह संविधान के अनुच्छेद 21 में मिले जीवन और गरिमा के अधिकार के खिलाफ जाती है। उन्होंने अदालत से मांग की थी कि मौजूदा कानूनी प्रावधान को या तो रद्द किया जाए या उसमें बदलाव करते हुए मौत की सजा के लिए अधिक मानवीय विकल्प उपलब्ध कराया जाए।
1983 के फैसले पर दोबारा विचार से सुप्रीम कोर्ट का इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि 1983 में संविधान पीठ द्वारा दिए गए Deena @ Deena Dayal vs Union of India फैसले पर दोबारा विचार करने का पर्याप्त आधार नहीं मिला। उस फैसले में अदालत ने फांसी को मौत की सजा लागू करने का संवैधानिक तरीका माना था। मंगलवार के फैसले ने इस कानूनी स्थिति को फिलहाल बरकरार रखा। इसका सीधा अर्थ है कि संसद द्वारा बनाए गए मौजूदा कानून के तहत जब किसी व्यक्ति को अंतिम रूप से मौत की सजा दी जाती है, तो उसे लागू करने के लिए फांसी का तरीका ही इस्तेमाल किया जाएगा। अदालत ने खुद से कोई नया तरीका लागू करने का आदेश देने के बजाय यह विषय भविष्य के वैज्ञानिक और तकनीकी विकास के लिए खुला छोड़ा है।
भविष्य के लिए खुला रखा वैज्ञानिक विकल्प का दरवाजा
इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि सुप्रीम कोर्ट ने फांसी के मौजूदा तरीके को बरकरार रखने के बावजूद भविष्य में इसकी समीक्षा की संभावना खत्म नहीं की। अदालत ने कहा कि उसका फैसला वैज्ञानिक ज्ञान और बाद में होने वाले विकास के आधार पर भविष्य में किसी समीक्षा को नहीं रोकता। यानी अगर आने वाले वर्षों में विज्ञान ऐसा तरीका उपलब्ध कराता है जिसमें मौत की सजा कम पीड़ा के साथ और दोषी की मानवीय गरिमा को बनाए रखते हुए लागू की जा सके, तो सरकार मौजूदा व्यवस्था पर पुनर्विचार कर सकती है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके फैसले में ऐसा कुछ नहीं है जो केंद्र सरकार को वैज्ञानिक और तकनीकी विकास के आधार पर वैकल्पिक तरीका तलाशने या मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा करने से रोकता हो।
पूरा मामला 2017 से सुप्रीम कोर्ट में था
फांसी के तरीके को लेकर यह विवाद नया नहीं है। यह मामला वर्ष 2017 से सुप्रीम कोर्ट के सामने लंबित था। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अदालत को बताया था कि मौत की सजा लागू करने के वैकल्पिक तरीकों पर उच्च स्तर पर विचार किया जा रहा है और इस उद्देश्य से एक समिति भी गठित की गई है। जनवरी में हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल पर भी विचार किया था कि क्या कम पीड़ादायक तरीके से मौत की सजा लागू करने का फैसला संवैधानिक अदालत के अधिकार क्षेत्र में आता है या यह संसद और कार्यपालिका के क्षेत्र का विषय है। अदालत ने उस समय यह सवाल भी उठाया था कि आखिर इस तरह के तरीके का फैसला कौन करे और क्या न्यायपालिका कानून में निर्धारित किसी तरीके को बदलने का सीधा आदेश दे सकती है।
याचिकाकर्ता ने फांसी को बताया था पुराना और पीड़ादायक तरीका
याचिकाकर्ता ऋषि मल्होत्रा का मुख्य तर्क था कि फांसी एक पुरानी व्यवस्था है और इसे मौत की सजा लागू करने के आधुनिक तथा मानवीय तरीके के रूप में जारी नहीं रखा जाना चाहिए। उनका कहना था कि संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जीवन का अधिकार नहीं देता, बल्कि जीवन और मृत्यु की प्रक्रिया में मानवीय गरिमा के सिद्धांत को भी महत्व देता है। उन्होंने अदालत से फांसी के स्थान पर किसी अधिक मानवीय विकल्प पर विचार करने की मांग की थी। याचिका में यह भी सुझाव दिया गया था कि दोषी को मौत की सजा लागू करने के तरीके को चुनने का विकल्प दिया जा सकता है।
केंद्र ने फांसी को बताया सुरक्षित और तेज तरीका
केंद्र सरकार ने फांसी का बचाव करते हुए इसे मौत की सजा लागू करने का सबसे सुरक्षित और तेज तरीका बताया था। सरकार ने दूसरे विकल्पों, खास तौर पर घातक इंजेक्शन जैसे तरीकों को लेकर भी आपत्तियां दर्ज की थीं। अमेरिका में घातक इंजेक्शन के दौरान सामने आए कुछ विवादित मामलों और असफल प्रक्रियाओं का हवाला देते हुए सरकार ने कहा था कि वैकल्पिक तरीका अपने आप में अधिक मानवीय या सुरक्षित साबित हो, यह जरूरी नहीं है। इसके अलावा सरकार ने यह सवाल भी उठाया था कि यदि मौत की सजा लागू करने की प्रक्रिया में चिकित्सकीय पेशेवरों की भूमिका बढ़ाई जाती है, तो इससे चिकित्सा पेशे की नैतिक जिम्मेदारियों और पेशेवर मूल्यों को लेकर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।
अदालत ने गरिमा और वैज्ञानिक विकास दोनों को महत्व दिया
सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक तरह से मौजूदा कानून और भविष्य के वैज्ञानिक विकास के बीच संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। अदालत ने न तो वर्तमान कानूनी व्यवस्था को खत्म किया और न ही भविष्य में बेहतर विकल्प की संभावना को बंद किया। इसका मतलब यह है कि आज की स्थिति में फांसी कानूनी रूप से लागू रहेगी, लेकिन भविष्य में अगर विज्ञान ऐसा विकल्प देता है जो कम पीड़ादायक, विश्वसनीय और गरिमापूर्ण हो, तो उस पर विचार किया जा सकता है। इस तरह अदालत ने यह स्पष्ट किया कि वर्तमान फैसला भविष्य की वैज्ञानिक प्रगति के रास्ते में बाधा नहीं बनेगा।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल भारत में मौत की सजा लागू करने का तरीका नहीं बदला है। यानी जिन मामलों में सभी न्यायिक विकल्प समाप्त हो चुके हैं और मौत की सजा अंतिम रूप से कायम है, वहां मौजूदा कानून के तहत फांसी ही लागू होगी। लेकिन इस फैसले ने केंद्र सरकार के लिए भविष्य में वैकल्पिक तरीकों पर विचार करने की गुंजाइश खुली रखी है। अगर वैज्ञानिक और तकनीकी विकास किसी नए तरीके को अधिक सुरक्षित, कम पीड़ादायक और मानवीय गरिमा के अनुरूप साबित करते हैं, तो सरकार उस दिशा में कदम उठा सकती है।
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सुप्रीम कोर्ट ने फांसी को आज के कानून में बरकरार रखा है, लेकिन भविष्य के भारत के लिए मौत की सजा के तरीके पर वैज्ञानिक बहस का दरवाजा खुला छोड़ा है। फैसला मौजूदा व्यवस्था को जारी रखता है, लेकिन यह भी संकेत देता है कि कानून और न्याय व्यवस्था विज्ञान तथा तकनीक में होने वाले बदलावों से हमेशा के लिए अलग नहीं रह सकती।




