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झारखंड में छात्रों की जीत, सरकार के फैसले से मचा नया बवाल: JSSC-CGL रद्द, 2 हजार नौकरियों पर संकट; देवेंद्र महतो बोले—लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई

JSSC-CGL रद्द होने के बाद झारखंड में आंदोलन ने लिया नया मोड़—एक तरफ पेपर लीक और भर्ती में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ छात्रों की बड़ी जीत, दूसरी तरफ नौकरी पा चुके करीब 2 हजार अभ्यर्थियों के भविष्य पर तलवार। देवेंद्र महतो ने 16 दिन की भूख हड़ताल खत्म कर आंदोलन के दूसरे चरण का ऐलान किया और कहा—सिर्फ परीक्षा रद्द करना काफी नहीं, सरकार को भविष्य में पेपर लीक रोकने की गारंटी देनी होगी।

राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/ रांची | 18 अगस्त 2026

16 दिन की भूख हड़ताल ने सरकार को झुकाया, लेकिन आंदोलन खत्म नहीं हुआ

झारखंड में सरकारी नौकरी की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब एक नए और ज्यादा बड़े टकराव की तरफ बढ़ता दिखाई दे रहा है। 16 दिन तक भूख हड़ताल करने वाले JLKM नेता देवेंद्र नाथ महतो ने सरकार द्वारा JSSC-CGL परीक्षा रद्द किए जाने के बाद अपना अनशन तो खत्म कर दिया, लेकिन साफ कर दिया कि आंदोलन खत्म नहीं हुआ है। महतो ने कहा है कि अब लड़ाई भर्ती व्यवस्था को भ्रष्टाचार और पेपर लीक से मुक्त कराने की होगी। यानी सरकार ने एक बड़ा फैसला लेकर तत्काल दबाव तो कम किया है, लेकिन छात्रों के आंदोलन की आग अभी बुझी नहीं है। महतो ने ऐलान किया कि जल्द ही आंदोलन का दूसरा चरण शुरू किया जाएगा और JPSC-JSSC Abhiyarthi Reform Manch के बैनर तले भ्रष्टाचार मुक्त भर्ती व्यवस्था की मांग को लेकर संघर्ष आगे बढ़ेगा।

JSSC-CGL रद्द, 2014 से हुई कई परीक्षाओं पर भी सरकार का बड़ा फैसला

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में हुई आपात कैबिनेट बैठक के बाद सरकार ने JSSC-CGL परीक्षा रद्द करने का फैसला लिया। इसके साथ ही सरकार ने 2014 से आउटसोर्स एजेंसी TSR Data Processing Private Limited यानी TDPL के जरिए कराई गई भर्ती परीक्षाओं को भी रद्द करने की घोषणा की है। सरकार ने परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए वरिष्ठ IAS अधिकारी अमिताभ कौशल की अध्यक्षता में एक समिति गठित करने की बात कही है। सरकार का यह फैसला छात्रों के लंबे आंदोलन के बाद आया है और प्रदर्शनकारी इसे अपनी बड़ी जीत बता रहे हैं। देवेंद्र महतो ने इसे छात्रों के आंदोलन की “ऐतिहासिक जीत” करार दिया है। लेकिन इसी फैसले ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है—अगर परीक्षा और भर्ती प्रक्रिया रद्द होती है तो उन युवाओं का क्या होगा, जिन्हें इसी प्रक्रिया के जरिए नौकरी मिल चुकी है?

एक आंदोलन खत्म हुआ तो दूसरा आंदोलन सड़क पर उतर आया

सरकार के फैसले के बाद झारखंड में विरोध की तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। जिन छात्रों की मांग थी कि कथित गड़बड़ियों वाली परीक्षा को रद्द किया जाए, उन्हें सरकार के फैसले से राहत मिली है। लेकिन दूसरी तरफ JSSC-CGL में सफल होकर सरकारी नौकरी हासिल कर चुके करीब 2 हजार कर्मचारी अब अपने भविष्य को लेकर सड़कों पर हैं। मंगलवार को झारखंड सचिवालय के बाहर ऐसे कर्मचारियों ने प्रदर्शन किया और सवाल उठाया—“हमारा अपराध क्या है? हमें नौकरी से क्यों निकाला जा रहा है?” इन कर्मचारियों का कहना है कि वे किसी भी निष्पक्ष जांच का विरोध नहीं कर रहे, लेकिन उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि कई नियुक्तियां न्यायिक प्रक्रिया और अदालती कार्यवाही के बाद हुई थीं। अब दोनों पक्षों के लोग CBI जांच की मांग कर रहे हैं—एक तरफ परीक्षा में कथित गड़बड़ी की निष्पक्ष जांच के लिए और दूसरी तरफ अपनी नियुक्तियों पर लगे सवालों का सच सामने लाने के लिए।

2 हजार नौकरियां ही नहीं, करीब 3 हजार नियुक्तियों पर मंडरा रहा संकट

JSSC-CGL परीक्षा रद्द होने का असर सिर्फ प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक JSSC-CGL के जरिए नियुक्त करीब 2 हजार कर्मचारियों के भविष्य पर संकट खड़ा हो गया है। इसके अलावा JPSC के जरिए हुई करीब 1 हजार अन्य नियुक्तियां भी सवालों के घेरे में बताई जा रही हैं। इनमें से कई कर्मचारी दिसंबर 2025 के बाद अलग-अलग सरकारी विभागों में अपनी सेवाएं शुरू कर चुके हैं। वित्त, गृह, सड़क परिवहन, श्रम, सूचना एवं जनसंपर्क समेत कई विभागों में काम कर रहे कर्मचारियों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल अपनी नौकरी बचाने का है। यही वजह है कि सरकार का एक फैसला, जिसने एक आंदोलन को शांत करने की कोशिश की, अब दूसरे वर्ग में भारी असंतोष पैदा कर रहा है। सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है—कथित भर्ती अनियमितताओं पर कठोर कार्रवाई भी हो और निर्दोष अभ्यर्थियों के साथ अन्याय भी न हो।

देवेंद्र महतो का ऐलान—‘अनशन खत्म, आंदोलन नहीं’

देवेंद्र महतो ने सरकार के फैसले के बाद बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि उन्होंने भूख हड़ताल खत्म की है, आंदोलन नहीं। उनका कहना है कि सिर्फ CBI या CID जांच से छात्रों को न्याय नहीं मिलेगा, बल्कि सरकार को ऐसी परीक्षा व्यवस्था की गारंटी देनी होगी जिसमें पेपर लीक और भर्ती में अनियमितता की कोई गुंजाइश न हो। महतो ने दावा किया कि उनके पास परीक्षा व्यवस्था में सुधार का एक पूरा खाका है, जिसे वह सरकार के सामने रखेंगे। उन्होंने कहा कि आगे की लड़ाई सिर्फ पुरानी परीक्षाओं को रद्द कराने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की होगी जिसमें भविष्य में किसी छात्र के साथ परीक्षा के नाम पर अन्याय न हो। यानी झारखंड का छात्र आंदोलन अब परीक्षा रद्द कराने से आगे बढ़कर भर्ती व्यवस्था के ढांचे में बदलाव की मांग बन चुका है।

CBI जांच पर अड़ा छात्र आंदोलन, सरकार का जवाब—‘जिद की भी सीमा हो’

सबसे बड़ा टकराव अब CBI जांच की मांग को लेकर है। कई प्रदर्शनकारी छात्र साफ कह रहे हैं कि जब तक कथित परीक्षा अनियमितताओं की CBI जांच नहीं होती, आंदोलन पूरी तरह खत्म नहीं किया जाएगा। दूसरी तरफ झारखंड सरकार की मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने CBI जांच की मांग को लेकर प्रदर्शनकारियों पर सवाल उठाया और कहा कि सरकार उनकी सभी मांगों को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ी है, लेकिन ऐसी मांग भी होनी चाहिए जिसे सरकार पूरा कर सके। उन्होंने इसे “जिद” बताते हुए कहा कि मांगों की भी एक सीमा होनी चाहिए। यही बयान अब राजनीतिक बहस का नया केंद्र बन गया है। छात्रों का सवाल है कि अगर परीक्षा प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठे हैं तो स्वतंत्र और विश्वसनीय जांच से सरकार को पीछे क्यों हटना चाहिए? वहीं सरकार का तर्क है कि जांच निष्पक्ष होगी और दोषी पाए जाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।

विपक्ष का हमला—‘नौकरियां बेची जा रही थीं’ का गंभीर आरोप

झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और बीजेपी नेता बाबूलाल मरांडी ने मामले को और ज्यादा गंभीर राजनीतिक रंग दे दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह महज परीक्षा में छोटी-मोटी अनियमितताओं का मामला नहीं है, बल्कि कथित तौर पर नौकरियां बेचने तक का मामला हो सकता है। मरांडी ने कहा कि JSSC और JPSC की कार्यप्रणाली को लेकर लगातार सवाल और रिपोर्ट सामने आ रही हैं। हालांकि ये विपक्ष के गंभीर राजनीतिक आरोप हैं और इन आरोपों की पुष्टि जांच के जरिए ही हो सकती है। लेकिन इतना साफ है कि परीक्षा विवाद अब सिर्फ छात्रों और सरकार के बीच प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गया है। यह झारखंड की भर्ती व्यवस्था, सरकारी संस्थाओं की विश्वसनीयता और युवाओं के भविष्य से जुड़ा बड़ा राजनीतिक सवाल बन चुका है।

सरकार ने परीक्षा रद्द की, लेकिन CBI पर क्यों नहीं बनी बात?

यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल है। सरकार ने JSSC-CGL समेत कई परीक्षाओं को रद्द करने जैसा बड़ा कदम उठाया, सुधार समिति बनाने की बात कही और छात्रों की कई मांगों पर कार्रवाई का दावा किया। इसके बावजूद प्रदर्शनकारी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि अगर व्यवस्था में इतनी गंभीर खामियां थीं कि परीक्षाएं ही रद्द करनी पड़ीं, तो फिर यह पता लगाना भी जरूरी है कि गड़बड़ी के पीछे कौन था, किस स्तर पर हुई और किसे फायदा पहुंचा। इसी वजह से CBI जांच की मांग आंदोलन का सबसे संवेदनशील मुद्दा बन गई है। सरकार अगर इस मांग को स्वीकार नहीं करती है तो आंदोलन के दूसरे चरण में टकराव और बढ़ सकता है।

नौकरी पा चुके युवाओं का सवाल—गलती हमारी नहीं तो सजा क्यों?

इस पूरे विवाद का सबसे दर्दनाक पहलू उन युवाओं का है जिन्होंने परीक्षा पास की, नियुक्ति पाई और अब सरकारी कर्मचारी बन चुके हैं। इन युवाओं का कहना है कि अगर किसी स्तर पर भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, लेकिन सभी सफल उम्मीदवारों को एक साथ दोषी मानना न्यायसंगत नहीं होगा। कई कर्मचारी उम्र सीमा पार कर चुके हैं और अगर उनकी नियुक्तियां खत्म होती हैं तो उनके सामने दोबारा प्रतियोगी परीक्षा में शामिल होने का अवसर भी सीमित हो सकता है। इसलिए अब सरकार के सामने सिर्फ परीक्षा रद्द करने का सवाल नहीं है, बल्कि उन हजारों परिवारों के भविष्य का सवाल भी है जो सरकारी नौकरी मिलने के बाद अपनी जिंदगी की नई शुरुआत कर चुके हैं।

राहुल गांधी ने छात्रों और सरकार के बीच समझौते को बताया सही रास्ता

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने झारखंड सरकार और प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच बनी सहमति का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ने संवाद का रास्ता अपनाया और छात्रों ने संयम दिखाते हुए अपनी मांगें मनवाईं, यही सही तरीका है। राहुल गांधी ने यह भी कहा कि देशभर में ऐसी व्यवस्था बदलने की जरूरत है जो छात्रों को रोकती है, जबकि जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जो युवाओं को आगे बढ़ाए। झारखंड का घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब देश के कई हिस्सों में प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक और भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर युवाओं में असंतोष दिखाई देता रहा है। ऐसे में झारखंड का फैसला राष्ट्रीय स्तर पर भी एक राजनीतिक संदेश बन सकता है।

तीन प्रदर्शनकारी अब भी भूख हड़ताल पर

देवेंद्र महतो के साथ दो अन्य प्रदर्शनकारियों ने भी अपना अनशन खत्म कर दिया, लेकिन आंदोलन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। राहुल क्रांति, सबिता कुमारी और रूपेश पाल अब भी भूख हड़ताल जारी रखे हुए हैं। इन प्रदर्शनकारियों की मांगों में CBI जांच और भर्ती प्रक्रिया में व्यापक सुधार प्रमुख हैं। यानी सरकार के फैसले के बावजूद आंदोलन की जमीन पूरी तरह खाली नहीं हुई है। अब सरकार को यह साबित करना होगा कि उसका फैसला सिर्फ आंदोलन का दबाव कम करने के लिए नहीं, बल्कि वास्तव में भर्ती व्यवस्था को साफ और पारदर्शी बनाने के लिए है।

14 परीक्षाओं के रद्द होने का दावा, अब असली सवाल—दोषी कौन?

देवेंद्र महतो ने दावा किया कि कुल 14 परीक्षाओं को रद्द किया गया है और इसे उन्होंने छात्रों की ऐतिहासिक जीत बताया। लेकिन किसी भी परीक्षा को रद्द करना अंतिम समाधान नहीं हो सकता। असली सवाल यह है कि कथित अनियमितता हुई तो कैसे हुई, जिम्मेदार कौन था और भविष्य में इसे रोकने के लिए क्या ठोस व्यवस्था बनेगी। अगर सिर्फ परीक्षा रद्द कर दी गई और दोषियों तक जांच नहीं पहुंची, तो छात्रों के आंदोलन का सबसे बड़ा सवाल अनुत्तरित रह जाएगा। इसी वजह से अब झारखंड सरकार की अगली परीक्षा सिर्फ किसी भर्ती परीक्षा की नहीं, बल्कि विश्वसनीयता की परीक्षा होगी।

झारखंड से देश के लिए बड़ा संदेश—युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ नहीं चलेगा

झारखंड का यह पूरा घटनाक्रम एक बड़ा संदेश दे रहा है। सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले लाखों युवाओं के लिए परीक्षा सिर्फ एक प्रश्नपत्र नहीं होती; वह वर्षों की मेहनत, परिवार की उम्मीद और भविष्य की सबसे बड़ी संभावना होती है। अगर पेपर लीक, कथित धांधली या भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं तो उसका सीधा असर उन युवाओं पर पड़ता है जिन्होंने ईमानदारी से परीक्षा दी। लेकिन दूसरी तरफ किसी पूरी भर्ती प्रक्रिया को रद्द करने से उन युवाओं के साथ भी अन्याय हो सकता है जिन्होंने सफल होकर नौकरी हासिल की। इसलिए अब जरूरत सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी की नहीं, बल्कि ऐसी पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था की है जिसमें न पेपर लीक हो, न निर्दोष छात्र फंसें और न दोषी बच निकलें।

अनशन खत्म हुआ है, झारखंड की परीक्षा अभी बाकी है

देवेंद्र महतो ने अनशन खत्म कर दिया है, सरकार ने JSSC-CGL रद्द कर दिया है और सुधार समिति बनाने का ऐलान भी हो चुका है। लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती। एक तरफ आंदोलनकारी छात्र CBI जांच और भविष्य की भर्ती परीक्षाओं में पूर्ण पारदर्शिता की गारंटी मांग रहे हैं, दूसरी तरफ करीब 2 हजार से ज्यादा नौकरी पा चुके कर्मचारी अपने भविष्य को लेकर परेशान हैं। विपक्ष सरकार पर गंभीर आरोप लगा रहा है और सरकार अपने फैसले को छात्रों के हित में ऐतिहासिक कदम बता रही है। अब आने वाले दिनों में यह तय होगा कि झारखंड सरकार इस संकट को सिर्फ एक परीक्षा रद्द करके संभालती है या वास्तव में ऐसी भर्ती व्यवस्था तैयार करती है जिस पर राज्य के युवाओं को दोबारा भरोसा हो सके। क्योंकि सवाल सिर्फ JSSC-CGL का नहीं है—सवाल झारखंड के हर उस युवा के भविष्य का है, जो सरकारी नौकरी को अपनी जिंदगी बदलने का सबसे बड़ा रास्ता मानकर सालों मेहनत करता है।

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