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NEET-UG प्रदर्शन पर दिल्ली पुलिस का SC में बड़ा खुलासा: चेहरे पहचानने वाली तकनीक का इस्तेमाल, 2,873 गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोग चिन्हित

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 18 अगस्त 2026

NEET-UG पेपर लीक के खिलाफ दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन को लेकर दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में एक बड़ा खुलासा किया है। पुलिस ने स्वीकार किया है कि प्रदर्शन के दौरान Facial Recognition System यानी चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक का इस्तेमाल किया गया था, लेकिन उसका कहना है कि यह कार्रवाई “वैध राज्य हित” में की गई और इसका इस्तेमाल अंधाधुंध निगरानी के लिए नहीं किया गया। पुलिस के मुताबिक इस तकनीक के जरिए गंभीर आपराधिक मामलों से जुड़े 2,873 लोगों की पहचान की गई, जिनमें 92 लोग ऐसे थे जिनके खिलाफ 10 से अधिक मामले दर्ज थे और इनमें 47 हिस्ट्रीशीटर बताए गए हैं। पुलिस ने कहा है कि हत्या, बलात्कार, अपहरण, बच्चों के यौन शोषण और मादक पदार्थों से जुड़े गंभीर अपराधों में रिकॉर्ड रखने वाले लोगों की पहचान की गई। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पुलिस ने बल प्रयोग को “अनुपातिक, उचित और कानून के अनुरूप” बताया है, जबकि प्रदर्शनकारियों की ओर से पुलिस कार्रवाई, कथित पेलेट गन के इस्तेमाल और महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार जैसे गंभीर सवाल उठाए गए हैं। ऐसे में अब मामला सिर्फ प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई का नहीं, बल्कि प्रदर्शन स्थल पर आधुनिक निगरानी तकनीक के इस्तेमाल, निजता के अधिकार और पुलिस बल के इस्तेमाल की सीमा का भी बन गया है।

Facial Recognition पर पुलिस का बचाव—“अंधाधुंध निगरानी नहीं”

दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि Facial Recognition System का इस्तेमाल किसी भी प्रदर्शनकारी की बायोमेट्रिक जानकारी अंधाधुंध तरीके से जमा करने के लिए नहीं किया गया। पुलिस का दावा है कि गंभीर अपराधों में शामिल लोगों के चेहरे से संबंधित रिकॉर्ड के आधार पर पहचान की गई और सामान्य या छोटे मामलों में शामिल लोगों को इस प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनाया गया। पुलिस ने यह भी कहा कि यह धारणा गलत है कि प्रदर्शन में मौजूद हर व्यक्ति की जानकारी स्वतः इकट्ठा की गई या प्रदर्शनकारियों को आधार कार्ड लेकर बुलाया गया। पुलिस के मुताबिक FRS का इस्तेमाल एक “legitimate, bona fide and proportionate policing measure” के रूप में किया गया। लेकिन इस पूरे विवाद में एक बड़ा सवाल फिर भी कायम है—प्रदर्शन जैसे लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़े सार्वजनिक आयोजन में Facial Recognition जैसी तकनीक का इस्तेमाल किन स्पष्ट नियमों, सुरक्षा प्रोटोकॉल और डेटा संरक्षण व्यवस्था के तहत किया गया? किसका डेटा कितने समय तक रखा गया और उसका इस्तेमाल किन परिस्थितियों में किया जा सकता है? इन सवालों पर आगे की न्यायिक जांच महत्वपूर्ण होगी।

2,873 लोगों की पहचान, 92 पर 10 से ज्यादा मामले

दिल्ली पुलिस ने अपने हलफनामे में आंकड़े देते हुए कहा कि Facial Recognition System के जरिए 2,873 ऐसे लोगों की पहचान हुई जिनके गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड थे। इनमें 92 लोग ऐसे बताए गए जिनके खिलाफ 10 से अधिक मामले दर्ज थे और 47 को हिस्ट्रीशीटर बताया गया। पुलिस के अनुसार इन लोगों से जुड़े अपराधों में हत्या, बलात्कार, अपहरण, बच्चों के यौन शोषण और नशीले पदार्थों से जुड़े मामले शामिल थे। पुलिस का तर्क है कि इतने बड़े प्रदर्शन में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए ऐसे लोगों की पहचान करना सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा था। लेकिन अब सवाल यह भी है कि इन लोगों की पहचान किस आधार पर हुई, पहचान के बाद पुलिस ने क्या कार्रवाई की और प्रदर्शन में मौजूद अन्य लोगों की निजता को किस तरह सुरक्षित रखा गया। यही वह बिंदु है जहां सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन की बहस और गहरी हो जाती है।

पेलेट गन के सवाल पर पुलिस ने नहीं दिया सीधा जवाब

सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली पुलिस के हलफनामे का एक अहम पहलू यह है कि पुलिस ने Facial Recognition और बल प्रयोग को लेकर विस्तार से अपना पक्ष रखा, लेकिन Rapid Action Force द्वारा प्रदर्शनकारियों पर पेलेट गन के कथित इस्तेमाल के सवाल को सीधे तौर पर संबोधित नहीं किया। इससे पहले RTI से सामने आई जानकारी में 20 जुलाई की कार्रवाई के दौरान पेलेट से कम से कम 10 लोगों के घायल होने की बात सामने आई थी। प्रदर्शनकारियों की ओर से पेलेट गन, लाठी और अन्य बल प्रयोग को लेकर सवाल उठाए गए हैं। ऐसे में अब निगाहें उस समिति की जांच पर हैं, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस के बल प्रयोग से जुड़े व्यापक मुद्दों की जांच के लिए प्रस्तावित किया है। पुलिस का कहना है कि अधिकारियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों से वह इस समिति के सामने निपटेगी।

पुलिस का दावा—बल प्रयोग “अनुपातिक और कानून के मुताबिक”

दिल्ली पुलिस ने अपने बचाव में कहा कि 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर स्थिति तेजी से बिगड़ रही थी और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल किया गया बल अनुपातिक, उचित, क्रमिक और कानून के अनुरूप था। पुलिस ने आंसू गैस के गोले को अंतिम उपाय बताया और कहा कि लाठीचार्ज भी सीमित तथा नियंत्रित तरीके से किया गया। पुलिस ने “नेल लाठी” के इस्तेमाल से इनकार करते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर जिस वीडियो को नेल लाठी से जोड़ा गया, उसमें दिखाई देने वाली वस्तु एक डंडा थी, जिस पर संभवतः किसी प्रदर्शनकारी ने राष्ट्रीय ध्वज लगाया हुआ था। पुलिस ने सादे कपड़ों में तैनात कर्मचारियों को भी सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा बताया और कहा कि वे असामाजिक तत्वों और आपराधिक गतिविधियों पर नजर रखने के लिए प्रदर्शनकारियों के बीच मौजूद थे।

30 हजार से ज्यादा प्रदर्शनकारी और करीब 5 हजार पुलिसकर्मी—पुलिस का तर्क

दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट को 20 जुलाई की स्थिति का अपना पूरा घटनाक्रम भी बताया है। पुलिस के अनुसार जंतर-मंतर पर शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे बड़ा होता गया और संसद का मानसून सत्र शुरू होने के बाद स्थिति और संवेदनशील हो गई। पुलिस का कहना है कि 20 जुलाई को संसद की ओर मार्च की अनुमति नहीं ली गई थी और न ही इसकी अनुमति दी गई थी। इसके बावजूद प्रदर्शनकारियों का एक हिस्सा बैरिकेड तोड़कर संसद की ओर बढ़ने की कोशिश करने लगा। पुलिस के अनुसार उस समय प्रदर्शनकारियों की संख्या 30 हजार से अधिक हो गई थी, जबकि करीब 5 हजार वर्दीधारी पुलिसकर्मी उन्हें नियंत्रित करने की स्थिति में थे। पुलिस ने दावा किया कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़ने का प्रयास किया और सुरक्षा बलों के साथ टकराव की स्थिति पैदा हुई। पुलिस ने संसद, राष्ट्रपति भवन, केंद्रीय सरकारी कार्यालयों, मंत्रियों के आवास और अन्य महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा का भी हवाला दिया है।

महिला प्रदर्शनकारियों से बदसलूकी के आरोप भी जांच के घेरे में

प्रदर्शन के दौरान महिला प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिसकर्मियों द्वारा कथित बदसलूकी के आरोपों से भी मामला जुड़ा है। दिल्ली पुलिस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि महिला प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिसकर्मियों ने दुर्व्यवहार या मारपीट नहीं की। पुलिस का कहना है कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप घटनाओं की अधूरी तस्वीर और कुछ चुनिंदा वीडियो पर आधारित हैं। पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि तेजी से बदलती कानून-व्यवस्था की स्थिति में मौके पर मौजूद अधिकारियों को तत्काल सुरक्षा संबंधी फैसले लेने पड़ते हैं और बाद में केवल अलग-अलग वीडियो या मीडिया रिपोर्टों के आधार पर उनके फैसलों का आकलन करना उचित नहीं होगा।

अब असली सवाल—सुरक्षा जरूरी, लेकिन निगरानी की सीमा क्या?

इस पूरे मामले ने एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल खड़ा कर दिया है। किसी बड़े प्रदर्शन में कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है और अगर गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोग भीड़ में मौजूद हों तो उनकी पहचान सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा हो सकती है। लेकिन दूसरी तरफ लोकतांत्रिक प्रदर्शन में शामिल हर व्यक्ति को संदिग्ध मानकर उसकी निगरानी करना भी स्वीकार्य नहीं हो सकता। इसलिए अब बहस सिर्फ इस बात पर नहीं है कि Facial Recognition इस्तेमाल हुआ या नहीं—पुलिस खुद इसके इस्तेमाल की पुष्टि कर चुकी है। असली सवाल यह है कि इस तकनीक के इस्तेमाल की कानूनी सीमा क्या थी, डेटा का संरक्षण कैसे हुआ, किस स्तर की निगरानी की गई और क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की निजता सुरक्षित रही?

सुप्रीम कोर्ट की जांच तय करेगी बल प्रयोग की सीमा

अब पूरे मामले की दिशा सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही से तय होगी। पुलिस ने अपने हलफनामे में बल प्रयोग को उचित बताया है, जबकि प्रदर्शनकारियों की ओर से पेलेट गन, लाठीचार्ज और अन्य कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए गए हैं। ऐसे में प्रस्तावित समिति की जांच महत्वपूर्ण होगी। उसे यह देखना होगा कि 20 जुलाई को वास्तव में स्थिति कितनी गंभीर थी, पुलिस के सामने क्या परिस्थितियां थीं, किस स्तर पर बल प्रयोग का निर्णय लिया गया, क्या उपलब्ध विकल्पों का इस्तेमाल पहले किया गया और क्या कार्रवाई कानून तथा निर्धारित पुलिस प्रोटोकॉल के अनुरूप थी।

NEET-UG आंदोलन अब केवल पेपर लीक और छात्रों के विरोध का मामला नहीं रह गया है। यह मामला पुलिस बल के इस्तेमाल, प्रदर्शन के अधिकार, Facial Recognition जैसी निगरानी तकनीक और नागरिकों की निजता के बीच संतुलन की बड़ी संवैधानिक बहस बन चुका है। पुलिस ने अपना पक्ष सुप्रीम कोर्ट के सामने रख दिया है। अब सवाल यह है कि जांच और न्यायिक पड़ताल के बाद 20 जुलाई की उस कार्रवाई की पूरी तस्वीर सामने आती है या नहीं—और अगर कहीं पुलिस ने सीमा पार की थी तो जवाबदेही किसकी तय होती है।

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