राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 18 अगस्त 2026
देश की राजधानी दिल्ली के तीन बड़े और प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थान—जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), जामिया मिल्लिया इस्लामिया और जामिया हमदर्द—इन दिनों नियुक्तियों, भर्ती प्रक्रियाओं, पदोन्नति, प्रशासनिक फैसलों और वित्तीय व्यवस्था को लेकर उठे गंभीर सवालों के कारण चर्चा में हैं। JNU में भर्ती प्रक्रिया को लेकर विवाद के बाद अब जामिया मिल्लिया इस्लामिया के मौजूदा रजिस्ट्रार डॉ. मोहम्मद महताब आलम रिजवी की वर्ष 2017 में एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति, उनके अनुभव, CV, बाद की पदोन्नति और रजिस्ट्रार पद तक पहुंचने की प्रक्रिया की जांच की मांग पुलिस शिकायत के जरिए सामने आई है। दूसरी ओर जामिया हमदर्द के पूर्व कुलपति डॉ. अफशार आलम के करीब पांच वर्ष के कार्यकाल में हुई नियुक्तियों, वित्तीय फैसलों, बाहरी कंपनियों को दिए गए काम, चांसलर की नियुक्ति और पुराने मामले को लेकर UGC में स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। यानी मामला अब किसी एक व्यक्ति या किसी एक संस्थान तक सीमित नहीं रह गया है। तीनों विश्वविद्यालयों को लेकर उठ रहे सवाल एक बड़ी बहस की ओर इशारा करते हैं—क्या देश के बड़े विश्वविद्यालयों में भर्ती और नियुक्ति की प्रक्रिया वास्तव में उतनी ही पारदर्शी है, जितनी कागजों पर दिखाई देती है? क्या चयन समितियों, प्रशासनिक अधिकारियों और विश्वविद्यालय की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्थाओं ने हर स्तर पर नियमों का पालन किया? और अगर सब कुछ नियमों के मुताबिक हुआ है, तो फिर शिकायतों में उठाए गए सवालों का जवाब मूल दस्तावेजों से क्यों न दिया जाए?
JNU भर्ती विवाद ने खोली बड़ी बहस
JNU में भर्ती प्रक्रिया को लेकर उठे विवाद ने देश के विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों और चयन व्यवस्था को लेकर बहस तेज कर दी है। किसी विश्वविद्यालय में भर्ती केवल किसी व्यक्ति को नौकरी देने की प्रक्रिया नहीं होती। शिक्षक और अधिकारी संस्थान की अकादमिक गुणवत्ता, प्रशासनिक व्यवस्था और भविष्य की दिशा तय करते हैं। इसलिए विज्ञापन से लेकर आवेदन, स्क्रीनिंग, पात्रता जांच, चयन समिति, नियुक्ति और अंतिम मंजूरी तक हर चरण का पारदर्शी होना जरूरी है। JNU से जुड़े विवाद के बीच अब जामिया मिल्लिया और जामिया हमदर्द से सामने आई शिकायतों ने सवाल को और व्यापक बना दिया है। यहां असली मुद्दा किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष या विपक्ष में खड़ा होना नहीं, बल्कि यह देखना है कि संस्थानों की भर्ती और प्रशासनिक व्यवस्था कितनी जवाबदेह है। अगर नियुक्तियां नियमों के तहत हुई हैं, तो रिकॉर्ड इस बात को साबित कर सकते हैं। लेकिन अगर कहीं प्रक्रिया से समझौता हुआ है, तो उसी रिकॉर्ड से जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
जामिया मिल्लिया के रजिस्ट्रार पर 2017 की नियुक्ति से सवाल
जामिया मिल्लिया इस्लामिया के मौजूदा रजिस्ट्रार डॉ. मोहम्मद महताब आलम रिजवी के खिलाफ 17 जुलाई 2026 को जामिया नगर थाने के SHO को दी गई शिकायत में उनकी वर्ष 2017 की एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में शुरुआती नियुक्ति से लेकर बाद की पदोन्नति और रजिस्ट्रार पद पर नियुक्ति तक की प्रक्रिया की जांच की मांग की गई है। शिकायत में उनकी योग्यता, अनुभव और नियुक्ति के समय जमा किए गए दस्तावेजों की जांच के साथ-साथ Screening Committee, Selection Committee और Executive Council की भूमिका की पड़ताल की मांग की गई है। शिकायत में cheating, forgery, forged documents के इस्तेमाल, रिकॉर्ड में हेरफेर और criminal conspiracy जैसे गंभीर कानूनी पहलुओं की जांच और FIR दर्ज करने की मांग भी की गई है। हालांकि ये शिकायत में लगाए गए आरोप हैं और इनकी पुष्टि स्वतंत्र जांच के बाद ही हो सकती है, लेकिन शिकायतकर्ता ने जिस तरह मूल आवेदन फॉर्म, CV, अनुभव प्रमाण-पत्र, शैक्षणिक दस्तावेज, चयन समिति की कार्यवाही, नियुक्ति आदेश, सेवा रिकॉर्ड और डिजिटल दस्तावेज सुरक्षित रखने की मांग की है, उससे साफ है कि विवाद का केंद्र व्यक्ति से ज्यादा रिकॉर्ड और नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया है।
जामिया मिल्लिया मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल डॉ. रिजवी की 2017 की नियुक्ति के समय उनके अनुभव को लेकर है। शिकायत में MP-IDSA यानी Manohar Parrikar Institute for Defence Studies and Analyses से जुड़े उनके अनुभव को विशेष रूप से जांच के दायरे में लाने की मांग की गई है। उपलब्ध संस्थागत रिकॉर्ड में उनके वहां काम करने और Associate Fellow के रूप में जुड़े होने का उल्लेख है। अब शिकायतकर्ता का सवाल है कि एसोसिएट प्रोफेसर पद के लिए आवश्यक अनुभव की जो शर्तें उस समय लागू थीं, उनमें इस अनुभव को किस आधार पर स्वीकार किया गया। क्या इसे teaching experience माना गया या research experience? चयन समिति ने किस नियम के आधार पर इसे स्वीकार किया? क्या अनुभव प्रमाण-पत्रों का स्वतंत्र सत्यापन हुआ? यही वह बिंदु है जहां मूल भर्ती फाइल बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। क्योंकि किसी उम्मीदवार को योग्य मानने का अंतिम आधार चयन समिति की कार्यवाही और उस समय लागू नियम ही होते हैं।
CV के अलग-अलग संस्करणों पर भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ता ने विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर उपलब्ध CV के अलग-अलग संस्करणों का हवाला देते हुए योग्यता, अनुभव और सेवा से संबंधित विवरणों की तुलना की मांग की है। यहां यह स्पष्ट है कि CV का अपडेट होना अपने आप में कोई अपराध या फर्जीवाड़ा नहीं है। लेकिन जब नियुक्ति की पात्रता पर औपचारिक शिकायत सामने आ चुकी हो, तब यह जानना जरूरी हो जाता है कि अलग-अलग रिकॉर्ड में अंतर क्यों है। क्या यह सामान्य अपडेट था? क्या कोई जानकारी बाद में जोड़ी या हटाई गई? क्या मूल नियुक्ति के समय जमा CV और बाद में उपलब्ध CV में कोई महत्वपूर्ण अंतर है? इसका जवाब वेबसाइट आर्काइव, मूल CV, अनुभव प्रमाण-पत्र और नियुक्ति फाइलों की तुलना से ही मिल सकता है।
शिकायत केवल 2017 की नियुक्ति तक सीमित नहीं है। इसमें बाद की पदोन्नति और रजिस्ट्रार पद तक पहुंचने की प्रक्रिया की भी जांच की मांग की गई है। जामिया के उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार नवंबर 2024 में डॉ. रिजवी को Officiating Registrar बनाया गया और मार्च 2025 में उन्होंने नियमित Registrar के रूप में कार्यभार संभाला। ऐसे में शिकायतकर्ता का सवाल है कि अगर शुरुआती नियुक्ति की पात्रता को लेकर कोई गंभीर प्रश्न है, तो उसके बाद हुई पदोन्नति और रजिस्ट्रार नियुक्ति के समय पुराने रिकॉर्ड की किस तरह जांच हुई। क्या Screening Committee ने दस्तावेजों को दोबारा सत्यापित किया? क्या Selection Committee के सामने सभी मूल रिकॉर्ड मौजूद थे? Executive Council ने किन दस्तावेजों के आधार पर फैसला लिया? अगर पूरी प्रक्रिया नियमसम्मत थी, तो इन सभी सवालों का जवाब फाइलों में होना चाहिए।
शिकायत का एक और गंभीर हिस्सा डॉ. रिजवी के कार्यकाल में शिक्षक और गैर-शिक्षक कर्मचारियों की नियुक्तियों तथा विभिन्न विभागों में पोस्टिंग से जुड़ा है। शिकायतकर्ता ने इन प्रक्रियाओं की भी स्वतंत्र जांच की मांग की है और नियुक्तियों में बड़ी रकम के लेन-देन से जुड़ी शिकायतों और चर्चाओं का उल्लेख किया है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है, इसलिए इन्हें तथ्य के रूप में नहीं बल्कि शिकायत में उठाए गए आरोप के रूप में देखा जाना चाहिए। लेकिन यदि जांच होती है तो नियुक्ति फाइलों के साथ वित्तीय और डिजिटल रिकॉर्ड की जांच भी जरूरी होगी।
जामिया हमदर्द में पूर्व कुलपति के कार्यकाल पर सवाल
जामिया मिल्लिया के बाद मामला जामिया हमदर्द पहुंचता है, जहां विश्वविद्यालय के कर्मचारियों के रूप में अपनी पहचान बताने वाले एक समूह ने 5 अगस्त 2026 को UGC अध्यक्ष को शिकायत भेजी है। शिकायत में पूर्व कुलपति डॉ. अफशार आलम के करीब पांच वर्ष के कार्यकाल में हुए प्रशासनिक और वित्तीय फैसलों की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। इसमें नियुक्तियों, नियमित और संविदा कर्मचारियों की चयन प्रक्रिया, विश्वविद्यालय की सोसाइटी के रिकॉर्ड, चांसलर की नियुक्ति, बाहरी कंपनियों को वित्तीय काम दिए जाने और डॉ. अफशार आलम से जुड़े पुराने मामले का उल्लेख किया गया है। शिकायतकर्ताओं ने UGC से फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी गठित करने और जरूरत पड़ने पर आगे की जांच पर विचार करने की मांग की है।
जामिया हमदर्द मामले में तौहीद आलम की असिस्टेंट रजिस्ट्रार और PRO पद पर नियुक्ति को लेकर विशेष सवाल उठाए गए हैं। शिकायत में उनके पूर्व कुलपति के परिवार से संबंध और नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर प्रश्न खड़े किए गए हैं। इस तरह के आरोपों की पुष्टि नियुक्ति फाइल की जांच से ही हो सकती है। पद का विज्ञापन, आवेदनकर्ताओं की संख्या, पात्रता, स्क्रीनिंग, चयन समिति की कार्यवाही, चयन की सिफारिश और अंतिम नियुक्ति आदेश—हर दस्तावेज महत्वपूर्ण होगा।
शिकायत में पूर्व डिप्टी रजिस्ट्रार सरफराज अहसन की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ताओं ने पूर्व कुलपति के कार्यकाल में हुई नियमित और संविदा नियुक्तियों की व्यापक समीक्षा की मांग की है।
वित्तीय फैसलों को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ताओं के अनुसार कुछ वित्तीय काम पहले KPMG और बाद में Deloitte जैसी बाहरी कंपनियों को दिए गए। किसी बाहरी पेशेवर संस्था को काम सौंपना अपने आप में अनियमितता नहीं है। असली सवाल है—चयन की प्रक्रिया क्या थी? क्या टेंडर हुआ? क्या प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया अपनाई गई? किस समिति या अधिकारी ने मंजूरी दी? अनुबंध की शर्तें क्या थीं? कितना भुगतान किया गया? काम की निगरानी कैसे हुई? और क्या विश्वविद्यालय के वित्तीय नियंत्रण पर इसका असर पड़ा? इन सवालों का जवाब टेंडर फाइल, अनुबंध, भुगतान रिकॉर्ड, समिति की कार्यवाही और ऑडिट दस्तावेजों से ही मिल सकता है।
चांसलर की नियुक्ति को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ता चाहते हैं कि यह जांच हो कि नियुक्ति विश्वविद्यालय की सोसाइटी के नियमों और उपनियमों के मुताबिक हुई या नहीं। इसके अलावा डॉ. अफशार आलम से जुड़े पुराने मामले में Case No. RC.MAI: 2009.A.0056 का भी उल्लेख किया गया है। लेकिन किसी पुराने केस नंबर का शिकायत में जिक्र होना किसी व्यक्ति को दोषी साबित नहीं करता। इस मामले की वास्तविक स्थिति, जांच और अंतिम कानूनी निष्कर्ष संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड से ही स्पष्ट हो सकते हैं।
तीनों विश्वविद्यालयों में एक जैसा सवाल—चयन समितियों ने क्या देखा?
JNU, जामिया मिल्लिया इस्लामिया और जामिया हमदर्द के मामलों को एक साथ देखने पर सबसे बड़ा सवाल चयन और मंजूरी देने वाली संस्थागत व्यवस्थाओं पर आता है। उम्मीदवार की योग्यता कौन जांचता है? अनुभव को कौन स्वीकार करता है? चयन समिति किन दस्तावेजों को आधार बनाती है? क्या Screening Committee और Selection Committee के सदस्य स्वतंत्र रूप से रिकॉर्ड की जांच करते हैं? Executive Council या अन्य सक्षम निकाय के सामने कौन-से दस्तावेज रखे जाते हैं? और अगर किसी रिकॉर्ड में विसंगति होती है तो उसे उसी समय क्यों नहीं पकड़ा जाता? यही सवाल विश्वविद्यालयों की भर्ती व्यवस्था की वास्तविक मजबूती का परीक्षण करते हैं।
अब बयान नहीं, मूल फाइलों की जरूरत है। JNU में भर्ती विवाद हो, जामिया मिल्लिया में रजिस्ट्रार की नियुक्ति और पदोन्नति से जुड़े सवाल हों या जामिया हमदर्द में पूर्व कुलपति के कार्यकाल की नियुक्तियां और वित्तीय फैसले—हर मामले में दस्तावेज सामने आने चाहिए। नियुक्ति विज्ञापन, आवेदन, पात्रता, अनुभव प्रमाण-पत्र, CV, स्क्रीनिंग रिकॉर्ड, चयन समिति की कार्यवाही, नियुक्ति आदेश, पदोन्नति रिकॉर्ड, Executive Council की मंजूरी और जहां वित्तीय फैसले हैं वहां टेंडर, अनुबंध और भुगतान रिकॉर्ड की जांच होनी चाहिए। अगर डिजिटल रिकॉर्ड पर सवाल हैं तो वेबसाइट आर्काइव और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड भी सुरक्षित किए जाने चाहिए।
आरोप गंभीर हैं, लेकिन अंतिम फैसला जांच ही करेगी। इन मामलों में आरोप गंभीर जरूर हैं, लेकिन शिकायत में लगाए गए आरोपों को अंतिम सत्य मानना भी सही नहीं होगा। किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा और करियर पर असर डालने वाले आरोपों की पुष्टि स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के बाद ही होनी चाहिए। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है—गंभीर शिकायतों को सिर्फ इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि वे किसी वरिष्ठ अधिकारी या विश्वविद्यालय से जुड़ी हैं। यदि प्रक्रिया साफ है तो जांच से संबंधित लोगों को मजबूती मिलेगी। अगर कहीं नियमों की अनदेखी, गलत जानकारी, दस्तावेजी हेरफेर, पक्षपात या वित्तीय अनियमितता सामने आती है, तो जिम्मेदारी तय करना भी जरूरी होगा।
JNU, जामिया मिल्लिया इस्लामिया और जामिया हमदर्द—तीनों संस्थानों की अपनी अलग परिस्थितियां हैं, लेकिन तीनों से जुड़े विवाद एक साझा सवाल खड़ा करते हैं—देश के बड़े विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों और प्रशासनिक फैसलों की निगरानी आखिर कितनी मजबूत है? इन संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों, काम करने वाले शिक्षकों और कर्मचारियों तथा सार्वजनिक व्यवस्था का भरोसा तभी कायम रह सकता है जब नियुक्तियों में योग्यता, प्रशासन में पारदर्शिता और वित्तीय फैसलों में जवाबदेही दिखाई दे। इसलिए अब जरूरत आरोपों को दबाने की नहीं, बल्कि रिकॉर्ड खोलने की है; सवालों को टालने की नहीं, बल्कि उनका जवाब देने की है। अगर सब कुछ नियमों के मुताबिक हुआ है तो फाइलें यही साबित करेंगी। और अगर कहीं नियम टूटे हैं, तो वही फाइलें जिम्मेदारी तय करने का रास्ता भी दिखाएंगी।




