अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | काठमांडू | 17 अगस्त 2026
नेपाल में तिब्बत से जुड़े एक बड़े अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सम्मेलन को रद्द किए जाने ने नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर तिब्बतन स्टडीज (आईएटीएस) का 17वां सेमिनार 23 से 29 अगस्त 2026 तक काठमांडू विश्वविद्यालय में होना तय था। इसमें करीब 700 प्रतिभागियों की भागीदारी प्रस्तावित थी, जिनमें चीन, भारत, अमेरिका समेत करीब 40 देशों के विद्वान शामिल थे। सम्मेलन रद्द होने के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या नेपाल ने चीन के दबाव में यह फैसला लिया।
काठमांडू विश्वविद्यालय के हिमालय सेंटर फॉर एशियन स्टडीज (हाईकैस) ने आयोजन की जिम्मेदारी संभाली थी। यह सम्मेलन चार साल की तैयारी के बाद होना था। नेपाल को 2022 में ही इसका मेजबान चुना गया था। कई प्रतिभागियों ने पहले ही हवाई टिकट और होटल बुक कर लिए थे। लेकिन 3 अगस्त को नेपाल के मुख्य सचिव गोविंद बहादुर कार्की और विदेश सचिव अमृत बहादुर राई ने विश्वविद्यालय के कुलपति सहित वरिष्ठ अधिकारियों को मौखिक निर्देश देकर कार्यक्रम रद्द करने को कहा। सुरक्षा चिंताओं का हवाला दिया गया।
मामले ने इसलिए भी तूल पकड़ा है क्योंकि नेपाल की सुरक्षा एजेंसियों ने पहले यह स्पष्ट किया था कि सम्मेलन से कोई सुरक्षा खतरा नहीं है। गृह मंत्री सूदन गुरुंग ने भी कुछ दिन पहले कहा था कि कार्यक्रम रद्द नहीं होगा, केवल प्रतिभागियों की सुरक्षा जांच की जाएगी। फिर भी अचानक रद्दीकरण का आदेश आ गया।
चीनी दबाव का जिक्र
जुलाई के तीसरे सप्ताह में चीनी राजदूत झांग माओमिंग ने नेपाल के विदेश सचिव से मुलाकात की थी। रिपोर्ट्स के अनुसार, राजदूत ने संभावित प्रो-तिब्बत बयानों को लेकर सतर्कता बरतने की सलाह दी थी। इसके बाद दलाई लामा के निर्वासन प्रशासन (सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन) ने भी आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला वापस ले लिया। कुछ तिब्बती विद्वानों ने भी भागीदारी से किनारा कर लिया। वहीं चीन के राज्य-समर्थित संस्थानों से लगभग 100 प्रतिभागी रजिस्टर्ड थे।
सम्मेलन अब ऑनलाइन होगा। आईएटीएस बोर्ड ने आपात बैठक में फैसला लिया कि कार्यक्रम उसी तारीख पर वर्चुअल रूप में आयोजित किया जाएगा।
तिब्बती शरणार्थियों की मौजूदगी भी अहम
नेपाल में करीब 12,000 तिब्बती शरणार्थी रहते हैं। बड़ी संख्या में तिब्बती लोग नेपाल के रास्ते भारत भी पहुंचते हैं, जहां दलाई लामा निर्वासन में रहते हैं। तिब्बत का मुद्दा चीन के लिए बेहद संवेदनशील है। बीजिंग तिब्बत से जुड़ी किसी भी राजनीतिक या अकादमिक गतिविधि को लेकर सतर्क रहता है और नेपाल से ‘वन चाइना’ नीति के अनुरूप रुख बनाए रखने की अपेक्षा करता रहा है। नेपाल लंबे समय से प्रो-तिब्बत प्रदर्शनों या गतिविधियों पर रोक लगाता आया है।
नेपाल की संतुलन साधने की चुनौती
नेपाल के लिए चीन के साथ संबंध आर्थिक और रणनीतिक दोनों लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। बेल्ट एंड रोड परियोजनाओं, निवेश और व्यापार के जरिए बीजिंग का प्रभाव काठमांडू में लगातार बढ़ा है। वहीं भारत के साथ उसके ऐतिहासिक, सामाजिक और भौगोलिक संबंध भी बेहद गहरे हैं। ऐसे में काठमांडू के सामने दोनों पड़ोसी देशों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती बनी हुई है।
सम्मेलन रद्द होने से अब बहस केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि क्या नेपाल अपनी अकादमिक और सार्वजनिक गतिविधियों पर स्वतंत्र फैसला ले रहा है या बढ़ते चीनी प्रभाव के कारण संवेदनशील मुद्दों पर उसकी नीति बदल रही है। नेपाल सरकार की ओर से अभी तक चीन के दबाव की बात को लेकर कोई स्पष्ट सार्वजनिक स्पष्टीकरण नहीं आया है। इसलिए इस विवाद में आरोपों और आशंकाओं को पुष्ट तथ्यों से अलग रखकर देखना जरूरी है।




