मनोरंजन | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 17 अगस्त 2026
हिंदी सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री शर्मिला टैगोर और भारतीय क्रिकेट के पूर्व कप्तान मंसूर अली खान पटौदी की प्रेम कहानी अपने दौर की सबसे चर्चित अंतरधार्मिक शादियों में से एक रही। बंगाली हिंदू परिवार से आने वाली शर्मिला टैगोर और मुस्लिम शाही परिवार से ताल्लुक रखने वाले मंसूर अली खान की शादी दिसंबर 1969 में हुई थी। उस समय अंतरधार्मिक विवाह आज की तुलना में कहीं अधिक सामाजिक दबाव और विरोध का सामना करते थे। अब उनकी बेटी सबा पटौदी ने अपने माता-पिता के रिश्ते और अपने बचपन की धार्मिक परवरिश को लेकर एक अहम खुलासा किया है, जिसने इस परिवार की निजी जिंदगी के एक अलग पहलू को सामने ला दिया है।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यूट्यूब चैनल Big Bollywood Buff से बातचीत में सबा ने कहा कि वह खुद को इस्लाम से जुड़ा मानती हैं और उनकी मां शर्मिला टैगोर ने उन्हें और उनके भाई-बहनों को इस्लाम की समझ दी। सबा ने बताया कि उनकी मां ने शादी के बाद इस्लाम अपनाया था और शायद बच्चों को एक धार्मिक आधार देने के लिए उन्हें इस्लाम के बारे में समझाया। सबा के मुताबिक, उनके घर में हिंदू धर्म की नियमित धार्मिक प्रथा या मंदिर नहीं था। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दूसरे धर्मों के प्रति सम्मान उनके परिवार का हिस्सा रहा और आस्था को किसी व्यक्ति पर जबरन थोपा नहीं गया।
सबा ने धर्म को व्यक्तिगत पसंद से जोड़ते हुए कहा कि उन्होंने अपनी आस्था को समझा और उससे जुड़ीं, लेकिन आगे चलकर हर व्यक्ति को अपनी राह चुनने की स्वतंत्रता दी गई। उनके मुताबिक, उनकी मां ने उन्हें इस्लाम, रमजान और उससे जुड़ी परंपराओं की जानकारी दी, लेकिन अंतिम चुनाव बच्चों पर छोड़ा। यही बात इस परिवार की परवरिश को खास बनाती है—धर्म की शिक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, दोनों को एक साथ रखने की कोशिश।
सबा ने अपने परिवार के व्यापक माहौल का जिक्र करते हुए यह भी बताया कि उनके भाई-बहन अंतरधार्मिक विवाह में हैं और परिवार ने अलग-अलग त्योहारों को भी मनाया है। क्रिसमस, दिवाली और होली जैसे त्योहारों का जश्न उनके बचपन और पारिवारिक जीवन का हिस्सा रहा। यानी परिवार में धार्मिक पहचान को लेकर एक आधार जरूर था, लेकिन सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता के लिए दरवाजे बंद नहीं किए गए।
शर्मिला टैगोर और मंसूर अली खान पटौदी की शादी भी अपने समय में आसान फैसला नहीं थी। दोनों ने करीब चार साल तक एक-दूसरे को समझने के बाद शादी की थी। शर्मिला बंगाली हिंदू परिवार से थीं, जबकि मंसूर अली खान पटौदी एक प्रतिष्ठित मुस्लिम शाही परिवार से आते थे। शादी से पहले दोनों परिवारों की चिंताएं और विरोध भी सामने आया था। शर्मिला टैगोर ने अलग-अलग बातचीत में बताया है कि शादी से पहले उनके परिवार को धमकी भरे टेलीग्राम तक मिले थे। इसके बावजूद दोनों ने अपने रिश्ते को आगे बढ़ाया।
यह रिश्ता सिर्फ एक फिल्म स्टार और क्रिकेटर की चर्चित प्रेम कहानी नहीं रहा, बल्कि भारतीय समाज में बदलती सोच का भी एक उदाहरण बना। एक ओर उस दौर की सामाजिक रूढ़ियां थीं, दूसरी ओर दो अलग धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों से आए दो लोगों का अपने रिश्ते पर भरोसा। दोनों ने विवाह के बाद 42 वर्षों तक साथ जीवन बिताया। सितंबर 2011 में मंसूर अली खान पटौदी के निधन तक यह रिश्ता कायम रहा। दोनों के तीन बच्चे हुए—सैफ अली खान, सबा पटौदी और सोहा अली खान।
इस परिवार की कहानी का दिलचस्प पहलू यह भी है कि इसके सदस्य सार्वजनिक जीवन में अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी पहचान बना चुके हैं। सैफ अली खान हिंदी सिनेमा के जाने-माने अभिनेता हैं, सोहा अली खान भी अभिनय के क्षेत्र में सक्रिय रही हैं, जबकि सबा पटौदी आभूषण डिजाइन और सामाजिक-परिवारिक गतिविधियों से जुड़ी रही हैं। तीनों की परवरिश जिस अंतरधार्मिक और बहुसांस्कृतिक माहौल में हुई, उसकी झलक समय-समय पर उनकी बातचीत में दिखाई देती रही है।
सबा की हालिया टिप्पणी इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि यह सवाल सिर्फ पटौदी परिवार की धार्मिक परवरिश का नहीं है। भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में ऐसे परिवारों की निजी कहानियां यह दिखाती हैं कि अंतरधार्मिक परिवार अपनी पहचान, आस्था और परंपराओं को किस तरह संतुलित करते हैं। सबा के अनुसार, उनके घर में धार्मिक समझ दी गई, लेकिन विश्वास को व्यक्तिगत चुनाव के रूप में भी देखा गया।
ABC NATIONAL NEWS की सीधी बात:
शर्मिला टैगोर और मंसूर अली खान पटौदी की कहानी सिर्फ बॉलीवुड और क्रिकेट की चमकदार प्रेम कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी भी है जब दो अलग धार्मिक पृष्ठभूमियों से आने वाले दो लोगों ने सामाजिक दबाव के बावजूद साथ रहने का फैसला किया। और आज उनकी बेटी सबा की बात एक और पहलू सामने लाती है—धर्म की समझ परिवार दे सकता है, लेकिन आस्था का अंतिम रास्ता व्यक्ति खुद चुनता है। यही शायद इस परिवार की कहानी को आज भी दिलचस्प और प्रासंगिक बनाता है।




