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‘दिमागी नक्सल’ पर चिदंबरम का पलटवार—असहमति पर सवाल या लोकतंत्र पर पहरा?

राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 17 अगस्त 2026

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम का पलटवार देश की राजनीति में असहमति और लोकतंत्र की स्थिति को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। चिदंबरम ने तंज भरे अंदाज में कहा, “मुझे दिमागी नक्सल होने पर गर्व है।” सवाल यह नहीं है कि चिदंबरम ने प्रधानमंत्री के शब्द का किस अंदाज में जवाब दिया; असली सवाल यह है कि आखिर व्यवस्था पर सवाल उठाना, सरकार की नीतियों की आलोचना करना या देश की दिशा को लेकर चिंता जताना कब से किसी व्यक्ति को ‘दिमागी नक्सल’ जैसे राजनीतिक ठप्पे का पात्र बना देता है? लोकतंत्र में सरकार से सवाल करना अपराध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी जिम्मेदारी है। यदि सत्ता से असहमति रखने वाले हर व्यक्ति को संदेह की नजर से देखा जाएगा, तो फिर लोकतंत्र में बहस, आलोचना और वैकल्पिक विचारों के लिए जगह कहां बचेगी?

प्रधानमंत्री के इस बयान पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या लोकतंत्र में सत्ता से सवाल पूछने वालों को देश और समाज के लिए खतरा बताना उचित है? कोई पत्रकार व्यवस्था पर सवाल उठाए, कोई विपक्षी नेता सरकार की नीति की आलोचना करे, कोई बुद्धिजीवी किसी फैसले पर चिंता व्यक्त करे या कोई नागरिक अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाए—इन सभी को एक ही राजनीतिक चश्मे से देखना लोकतांत्रिक समाज के लिए स्वस्थ संकेत नहीं हो सकता। सरकार चाहे किसी भी दल की हो, सत्ता से सवाल पूछना जनता का अधिकार है और असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी ताकत है। यही वह जगह है जहां चिदंबरम का पलटवार राजनीतिक महत्व हासिल करता है। उन्होंने जिस शब्द को प्रधानमंत्री ने चेतावनी के रूप में इस्तेमाल किया, उसी शब्द को अपने ऊपर लेकर दरअसल यह संदेश देने की कोशिश की कि विचारों पर पहरा नहीं लगाया जा सकता और सवाल पूछने की आदत को किसी लेबल से खत्म नहीं किया जा सकता।

यह आरोप लंबे समय से विपक्ष की राजनीति में सुनाई देता रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार आलोचना को सहजता से स्वीकार नहीं करती। आलोचकों का कहना है कि सत्ता के खिलाफ उठने वाली आवाजों को कभी राष्ट्रविरोध, कभी साजिश और अब ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्दों से परिभाषित करने की कोशिश की जाती है। इसे लोकतांत्रिक विमर्श के लिए गंभीर चिंता के रूप में देखा जा सकता है। किसी भी मजबूत लोकतंत्र में प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक कोई भी व्यक्ति सवालों से ऊपर नहीं हो सकता। सत्ता जनता से आती है और जनता के प्रति जवाबदेही ही लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है। इसलिए किसी सरकार की आलोचना को स्वतः राष्ट्र-विरोध या व्यवस्था-विरोध मान लेना लोकतांत्रिक बहस को कमजोर कर सकता है।

चिदंबरम का बयान इसी व्यापक सवाल को सामने लाता है—क्या आज भारत में असहमति के लिए पर्याप्त जगह बची है? यदि कोई व्यक्ति सरकार की नीतियों से सहमत नहीं है तो क्या उसे चुप रहना चाहिए? यदि किसी नागरिक को किसी सरकारी नीति में कमी दिखाई देती है तो क्या उसे सवाल नहीं पूछना चाहिए? यदि विपक्ष सत्ता के फैसलों पर उंगली उठाता है तो क्या उसे राजनीतिक दुश्मन समझ लिया जाना चाहिए? लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव कराना नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ यह भी है कि चुनाव जीतने वाली सरकार को लगातार सवालों का सामना करना पड़े, विपक्ष को बोलने दिया जाए, मीडिया सत्ता से जवाब मांगे और नागरिक बिना डर अपनी असहमति व्यक्त कर सकें।

‘दिमागी नक्सल’ विवाद इसलिए गंभीर है क्योंकि शब्दों की राजनीति धीरे-धीरे लोकतांत्रिक बहस की दिशा तय करने लगती है। जब सत्ता किसी आलोचक को एक कठोर राजनीतिक पहचान दे देती है, तो बहस उसके सवाल पर नहीं बल्कि उसके चरित्र-चित्रण पर केंद्रित हो जाती है। सवाल यह होना चाहिए कि आलोचक ने क्या कहा, उसमें तथ्य क्या हैं और सरकार उसका जवाब क्या देती है। लेकिन यदि सवाल पूछने वाले को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाए तो मूल मुद्दा पीछे छूट जाता है। यही लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी चिंता हो सकती है—सत्ता से सवाल खत्म नहीं होने चाहिए, बल्कि सत्ता को सवालों के जवाब देने की आदत डालनी चाहिए।

लोकतंत्र में प्रधानमंत्री शक्तिशाली हो सकता है, लेकिन सवालों से ऊपर नहीं। किसी भी सरकार की आलोचना को देश के खिलाफ खड़ा करना लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए खतरनाक मिसाल बन सकता है। नरेंद्र मोदी की राजनीति के आलोचक उन पर असहमति के प्रति कठोर रवैये का आरोप लगाते रहे हैं; ‘दिमागी नक्सल’ जैसी भाषा उस बहस को और तीखा करती है। चिदंबरम का जवाब इसी असहमति की राजनीति को सामने लाता है। लोकतंत्र की असली परीक्षा यह नहीं कि सत्ता कितनी ताकतवर है; असली परीक्षा यह है कि सत्ता अपने सबसे तीखे आलोचक की आवाज को कितना स्थान देती है। सवाल पूछने वाले से डरने के बजाय उसके सवाल का जवाब दिया जाना चाहिए—क्योंकि सवालों को दबाकर लोकतंत्र मजबूत नहीं होता, बल्कि उसकी सांस घुटती है।

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