Home » International » रूस पर बढ़ती निर्भरता, अमेरिका की 100% टैरिफ की तलवार: भारत के तेल कारोबार के सामने नई चुनौती

रूस पर बढ़ती निर्भरता, अमेरिका की 100% टैरिफ की तलवार: भारत के तेल कारोबार के सामने नई चुनौती

जून में भारत के कुल तेल आयात में रूसी कच्चे तेल की हिस्सेदारी रिकॉर्ड 48%; अमेरिकी प्रतिबंध लागू हुए तो महंगे तेल, व्यापार और रणनीतिक रिश्तों पर पड़ सकता है असर

अंतरराष्ट्रीय/व्यापार/ऊर्जा | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/ मॉस्को | 10 अगस्त 2026

भारत की ऊर्जा जरूरतों और रूस से बढ़ते तेल कारोबार के बीच अब अमेरिका की संभावित 100 फीसदी टैरिफ कार्रवाई ने नई चिंता पैदा कर दी है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक जून 2026 में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी बढ़कर 48 फीसदी के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। इसी समय अमेरिका रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर भारी टैरिफ लगाने की तैयारी कर रहा है। अमेरिकी सीनेट से संबंधित विधेयक पारित हो चुका है और अब इसे प्रतिनिधि सभा की मंजूरी का इंतजार है।

रूस से 8.7 मिलियन टन तेल आयात

जून में भारत ने रूस से करीब 8.7 मिलियन मीट्रिक टन कच्चा तेल खरीदा। यह मात्रा मई की तुलना में लगभग एक फीसदी कम रही, लेकिन पिछले साल जून के मुकाबले करीब 25 फीसदी अधिक है। इसका सीधा मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद भारत की रूसी तेल पर निर्भरता कम होने के बजाय फिलहाल बढ़ी है।

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों की ओर से रूसी तेल पर प्रतिबंध और मूल्य-सीमा लगाए जाने के बीच भारत ने रूस से अपेक्षाकृत सस्ता तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया। इससे भारत की रिफाइनरियों को प्रतिस्पर्धी कीमतों पर कच्चा माल मिला और घरेलू ईंधन बाजार को भी कुछ राहत मिली।

अमेरिका ने बढ़ाया दबाव

अमेरिकी सीनेट ने Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 को भारी बहुमत से मंजूरी दी है। रिपोर्ट के मुताबिक विधेयक राष्ट्रपति को रूस से तेल या गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रावधान करता है। भारत और चीन उन प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं जिन पर यह प्रावधान लागू हो सकता है। सीनेट में विधेयक 86-11 के वोट से पारित हुआ और अब प्रतिनिधि सभा में जाना है।

यह अभी अंतिम अमेरिकी कानून नहीं है। इसलिए भारत पर 100 फीसदी टैरिफ तत्काल लागू हो गया है, ऐसा कहना सही नहीं होगा। लेकिन विधेयक के आगे बढ़ने से भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर दबाव जरूर बढ़ा है।

भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा क्या?

अगर भविष्य में भारत पर इस तरह का भारी टैरिफ लगाया जाता है तो उसका असर केवल रूस से तेल खरीदने वाली कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा। भारत और अमेरिका के बीच होने वाले दूसरे व्यापार पर भी इसका असर पड़ सकता है।

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा सुरक्षा और कीमतों की होगी। रूस से मिलने वाले कच्चे तेल की जगह अचानक दूसरे स्रोतों से तेल खरीदना पड़ सकता है। यदि वैकल्पिक तेल महंगा हुआ तो इसका असर रिफाइनिंग लागत, पेट्रोल-डीजल की कीमतों, परिवहन और अंततः महंगाई पर पड़ सकता है।

दूसरी ओर भारत के पास एक महत्वपूर्ण ताकत भी है। भारत दुनिया के बड़े तेल आयातकों में है और उसकी विशाल रिफाइनिंग क्षमता उसे अलग-अलग स्रोतों से कच्चा तेल खरीदने और उसे घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए उत्पादों में बदलने की क्षमता देती है।

सस्ता रूसी तेल भारत के लिए फायदा

रूस से खरीद का एक सकारात्मक पहलू यह रहा है कि भारतीय रिफाइनरों को कई मौकों पर पश्चिमी बाजारों की तुलना में अनुकूल कीमतों पर कच्चा तेल मिला। इससे रिफाइनिंग कंपनियों की लागत और मार्जिन पर सकारात्मक असर पड़ सकता है।

भारत का तर्क भी यही रहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद का प्राथमिक उद्देश्य देश के 1.4 अरब से अधिक लोगों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना है। ऐसे में किसी एक देश के दबाव में आकर ऊर्जा स्रोत बदलना भारत के लिए आसान फैसला नहीं होगा।

लेकिन रिकॉर्ड निर्भरता भी जोखिम

यहीं इस कहानी का दूसरा और नकारात्मक पहलू सामने आता है। किसी एक देश से कुल तेल आयात का लगभग आधा हिस्सा आने लगे तो भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ जाता है। रूस से आपूर्ति में युद्ध, प्रतिबंध, भुगतान व्यवस्था, बीमा, शिपिंग या पश्चिमी देशों की नई पाबंदियों के कारण कोई व्यवधान आता है तो भारत के लिए वैकल्पिक आपूर्ति जुटाना महंगा पड़ सकता है।

यानी सस्ता तेल भारत के लिए आर्थिक फायदा है, लेकिन बहुत अधिक निर्भरता रणनीतिक जोखिम भी बन सकती है।

भारत के सामने संतुलन की चुनौती

अमेरिकी दबाव के बीच भारत के लिए रास्ता न तो केवल रूस से दूरी बनाना है और न ही किसी एक स्रोत पर अत्यधिक निर्भर रहना। बेहतर रणनीति यह होगी कि रूस के साथ ऊर्जा व्यापार जारी रखते हुए भारत मध्य-पूर्व, अमेरिका, अफ्रीका और अन्य उत्पादक देशों से भी आपूर्ति के विकल्प मजबूत करे।

इससे भारत किसी एक देश के राजनीतिक फैसले या प्रतिबंध का आसानी से शिकार नहीं होगा।

रूस भारत को बड़ी मात्रा में तेल दे रहा है, जबकि अमेरिका रूस की ऊर्जा आय को कमजोर करने के लिए खरीदार देशों पर दबाव बढ़ा रहा है। भारत के लिए असली चुनौती सस्ता तेल हासिल करने और वैश्विक व्यापारिक रिश्तों को सुरक्षित रखने के बीच संतुलन बनाने की है। आने वाले दिनों में अमेरिकी विधेयक प्रतिनिधि सभा से आगे बढ़ता है या नहीं और राष्ट्रपति इसे किस रूप में लागू करते हैं, यही भारत की ऊर्जा और व्यापार नीति के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल होगा।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted