राष्ट्रीय/ अपराध/ आस्था | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 4 अगस्त 2026
देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थित प्रतिष्ठित मंदिरों में श्रद्धालुओं के चढ़ावे, नकदी और आभूषणों की सुरक्षा को लेकर सामने आए मामलों ने मंदिर प्रबंधन की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अयोध्या के राम मंदिर से लेकर उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम, गुजरात के अंबाजी मंदिर, मध्य प्रदेश के नलखेड़ा स्थित मां बगलामुखी मंदिर और मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर तक दान और चढ़ावे से जुड़ी कथित चोरी, हेराफेरी या अनियमितताओं के प्रकरण चर्चा में आए हैं। इन सभी मामलों की प्रकृति और प्रबंधन व्यवस्था अलग-अलग है, इसलिए इन्हें एक ही कानूनी श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। फिर भी इन घटनाओं ने एक साझा सवाल जरूर खड़ा किया है—करोड़ों श्रद्धालुओं द्वारा आस्था से चढ़ाए गए धन और बहुमूल्य वस्तुओं की निगरानी आखिर कितनी मजबूत है?
अयोध्या: राम मंदिर के चढ़ावे की सुरक्षा पर सवाल
अयोध्या का राम मंदिर देश के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में शामिल हो चुका है और यहां देश-दुनिया से आने वाले श्रद्धालु बड़ी मात्रा में दान और चढ़ावा देते हैं। इसी कारण चढ़ावे की चोरी से जुड़ी खबरों ने विशेष रूप से ध्यान खींचा है। इस मामले को लेकर राजनीतिक सवाल भी उठाए जा रहे हैं कि जिस मंदिर के निर्माण और उद्घाटन को राष्ट्रीय स्तर पर इतनी प्रमुखता मिली, उसकी दान व्यवस्था की सुरक्षा में किसी तरह की सेंध लगती है तो जिम्मेदारी किसकी होगी? हालांकि किसी कर्मचारी की कथित चोरी और सरकार या किसी राजनीतिक दल की प्रत्यक्ष संलिप्तता दो अलग बातें हैं और बिना जांच के दोनों को जोड़ना उचित नहीं होगा। लेकिन इतने महत्वपूर्ण धार्मिक संस्थान में चढ़ावे की सुरक्षा, निगरानी, ऑडिट और जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होना श्रद्धालुओं का जायज सवाल है।
बद्रीनाथ धाम: नकदी और सोने-चांदी के सिक्कों को लेकर गंभीर आरोप
उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम से जुड़ा मामला भी मंदिरों में चढ़ावे की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाता है। कर्मचारियों पर नकदी, सोने-चांदी के सिक्कों और अन्य चढ़ावे को कथित तौर पर छिपाने के आरोप सामने आने के बाद यह प्रश्न उठा कि दान प्राप्त होने से लेकर उसकी गिनती, रिकॉर्डिंग और सुरक्षित जमा होने तक निगरानी की व्यवस्था कितनी प्रभावी है। बद्रीनाथ देश के चारधामों में शामिल है और यहां हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। ऐसे धार्मिक संस्थान में यदि कोई कर्मचारी चढ़ावे तक अनधिकृत पहुंच बना सकता है तो यह केवल एक व्यक्ति के आचरण का मामला नहीं रह जाता, बल्कि प्रबंधन व्यवस्था की कमजोरियों की जांच भी जरूरी हो जाती है।
नलखेड़ा का मां बगलामुखी मंदिर: निजी संस्था को चढ़ावा लेने का अधिकार किसने दिया?
मध्य प्रदेश के नलखेड़ा स्थित प्रसिद्ध मां बगलामुखी मंदिर से जुड़ा मामला कई अलग तरह के सवाल पैदा करता है। सामने आई जानकारी के अनुसार एक निजी संस्था द्वारा नकदी और सोने-चांदी के आभूषण एकत्र किए जाने को लेकर विवाद खड़ा हुआ। यदि किसी सरकारी या प्रशासनिक निगरानी वाले धार्मिक संस्थान में कोई निजी संस्था अपनी रसीदों पर श्रद्धालुओं से धन अथवा आभूषण प्राप्त कर रही थी, तो सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि उसे इसकी अनुमति किसने और किन नियमों के तहत दी थी। कलेक्टर, एसडीएम, मंदिर समिति और संबंधित धर्मस्व विभाग की भूमिका भी इसी कारण जांच के दायरे में आती है। कितना पैसा और कितने आभूषण एकत्र किए गए, उनका रिकॉर्ड कहां है और रकम किस खाते में जमा हुई—इन प्रश्नों का दस्तावेजी जवाब सामने आना चाहिए। श्रद्धालुओं द्वारा आस्था से दिया गया एक-एक रुपया मंदिर के घोषित खाते और रिकॉर्ड में दर्ज होना आवश्यक है।
अंबाजी मंदिर: दान की गिनती के बीच नोटों के बंडल गायब होने का मामला
गुजरात के प्रसिद्ध अंबाजी मंदिर में दान की गिनती के दौरान कर्मचारियों द्वारा नोटों के बंडल चुराए जाने और मामले में गिरफ्तारियां होने की खबर ने दान की गणना की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। आम तौर पर बड़े धार्मिक संस्थानों में दानपेटियां खोलने से लेकर रकम गिनने तक CCTV निगरानी, एक से अधिक कर्मचारियों की मौजूदगी और बैंकिंग रिकॉर्ड जैसी कई स्तर की व्यवस्था होती है। ऐसे में यदि इसी प्रक्रिया के दौरान चोरी संभव हो जाती है तो सुरक्षा प्रणाली में मौजूद खामियों की पहचान करना जरूरी है। मामला गुजरात का होने के कारण राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हुए हैं, लेकिन मूल प्रश्न राजनीतिक नारे से कहीं अधिक प्रशासनिक है—मंदिरों में आने वाले विशाल दान को चोरी से बचाने के लिए पर्याप्त तकनीकी और संस्थागत सुरक्षा मौजूद है या नहीं?
सिद्धिविनायक मंदिर: दान की राशि में अंतर से उठे करोड़ों की हेराफेरी के सवाल
मुंबई का सिद्धिविनायक मंदिर देश के सबसे समृद्ध और प्रसिद्ध मंदिरों में गिना जाता है। यहां दान की राशि में असामान्य अंतर को आधार बनाकर करोड़ों रुपये की संभावित हेराफेरी के आरोप उठाए गए हैं। आरोप अपने आप में दोष सिद्ध नहीं करते और वास्तविक स्थिति किसी निष्पक्ष जांच तथा वित्तीय रिकॉर्ड की पड़ताल से ही स्पष्ट हो सकती है। लेकिन यदि घोषित और वास्तविक दान के आंकड़ों में बड़ा अंतर पाया जाता है तो मंदिर प्रशासन को उसका कारण सार्वजनिक करना चाहिए। कितनी रकम प्राप्त हुई, कितनी दर्ज हुई, कहां जमा हुई और अंतर किस वजह से आया—इसका ऑडिट ट्रेल उपलब्ध होना चाहिए।
गिरफ्तारियां हुईं तो सवाल व्यवस्था तक भी पहुंचेंगे
कुछ मंदिरों से जुड़े मामलों में कर्मचारियों की गिरफ्तारी और पुलिस कार्रवाई की खबरें सामने आना यह दिखाता है कि शिकायतों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया गया। लेकिन केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई पर्याप्त है या नहीं, यह प्रत्येक मामले की जांच पर निर्भर करेगा। यदि चोरी किसी एक व्यक्ति ने सुरक्षा व्यवस्था को चकमा देकर की तो उसकी व्यक्तिगत जवाबदेही बनती है, लेकिन अगर लंबे समय तक अनियमितता चलती रही, रिकॉर्ड में अंतर रहा अथवा निजी लोगों को चढ़ावा एकत्र करने की छूट मिलती रही तो प्रशासनिक निगरानी की भूमिका की जांच भी आवश्यक हो जाती है। मंदिरों में दान की पूरी प्रक्रिया—दानपेटी सील होने से लेकर खोलने, गिनती, वीडियो रिकॉर्डिंग, बैंक में जमा करने और अंतिम ऑडिट तक—ऐसी होनी चाहिए जिसमें किसी एक व्यक्ति या समूह के लिए हेराफेरी की गुंजाइश न्यूनतम रहे।
बीजेपी शासित राज्यों के मामलों को लेकर राजनीति तेज
इन घटनाओं का एक राजनीतिक पहलू भी सामने आया है। विपक्ष और बीजेपी के आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि धर्म, मंदिर और सनातन को अपनी राजनीति में प्रमुख स्थान देने वाली बीजेपी की सरकारों वाले राज्यों में जब मंदिरों के चढ़ावे से जुड़े मामले सामने आते हैं तो राजनीतिक नेतृत्व को उतनी ही मुखरता से जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए। हालांकि यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि मंदिरों का प्रशासन अलग-अलग ट्रस्टों, समितियों, बोर्डों और सरकारी व्यवस्थाओं के तहत संचालित होता है और किसी कर्मचारी या संस्था की कथित गड़बड़ी को स्वतः किसी राजनीतिक दल की चोरी नहीं कहा जा सकता। इसलिए राजनीतिक जवाबदेही और आपराधिक जिम्मेदारी के बीच अंतर बनाए रखते हुए यह पूछा जा सकता है कि संबंधित सरकारों ने जांच, ऑडिट और भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए क्या कदम उठाए।
मंदिर केवल राजनीति का प्रतीक नहीं, करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था हैं
इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि मंदिर किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं हैं। भगवान राम, बद्रीनाथ, मां अंबाजी, मां बगलामुखी या सिद्धिविनायक में आस्था रखने वाला प्रत्येक श्रद्धालु अपने विश्वास के कारण दान देता है। कोई सौ रुपये चढ़ाता है तो कोई लाखों की संपत्ति या सोने-चांदी के आभूषण। श्रद्धालु यह भरोसा करके धन देता है कि उसका दान मंदिर और उससे जुड़े धार्मिक-सामाजिक कार्यों में इस्तेमाल होगा। इसलिए उस पैसे का हिसाब मांगना धर्म का विरोध नहीं, बल्कि धार्मिक संस्थानों की विश्वसनीयता की रक्षा का सवाल है।
हर मंदिर के दान का डिजिटल रिकॉर्ड और स्वतंत्र ऑडिट क्यों नहीं?
इन मामलों के बाद सबसे जरूरी बहस किसी एक पार्टी को कटघरे में खड़ा करने से आगे जाकर मंदिरों की वित्तीय व्यवस्था सुधारने की होनी चाहिए। बड़े मंदिरों में दानपेटियों की 24 घंटे CCTV निगरानी, गिनती की वीडियो रिकॉर्डिंग, डिजिटल रसीद, नियमित स्वतंत्र ऑडिट, बैंक में रकम जमा होने तक इलेक्ट्रॉनिक ट्रैकिंग और सालाना आय-व्यय का सार्वजनिक विवरण जैसी व्यवस्थाएं लागू की जा सकती हैं। सोने-चांदी और अन्य बहुमूल्य चढ़ावे का भी डिजिटल इन्वेंटरी रिकॉर्ड उपलब्ध होना चाहिए। यदि करोड़ों श्रद्धालुओं का पैसा है तो उसका हिसाब भी करोड़ों श्रद्धालुओं के सामने होना चाहिए।
आस्था का सम्मान तभी, जब चढ़ावे के एक-एक रुपये का हिसाब हो
अयोध्या, बद्रीनाथ, अंबाजी, नलखेड़ा और सिद्धिविनायक से जुड़े मामलों को एक साथ देखने पर सबसे बड़ा संदेश यही निकलता है कि मंदिरों की सुरक्षा का अर्थ केवल परिसर में पुलिस और सुरक्षाकर्मी तैनात करना नहीं है। गर्भगृह जितना सुरक्षित होना चाहिए, उतनी ही सुरक्षित दानपेटी और लेखा व्यवस्था भी होनी चाहिए। सरकार किसी भी दल की हो और मंदिर का प्रबंधन किसी भी संस्था के हाथ में हो, श्रद्धालुओं के पैसे पर पहला अधिकार पारदर्शिता का है। भगवान के नाम पर राजनीति अपनी जगह है, लेकिन भगवान के नाम पर दिए गए चढ़ावे का हिसाब मांगना हर श्रद्धालु का अधिकार है।




