राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 4 अगस्त 2026
ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि कानून में बदलाव होने भर से पहले से मिले अधिकार स्वतः समाप्त नहीं हो सकते। अदालत ने केंद्र सरकार से मौखिक रूप से कहा कि पुराने कानून के तहत जारी किए गए ट्रांसजेंडर पहचान पत्रों को नया कानून लागू होने के बाद पिछली तारीख से अपने-आप अमान्य नहीं माना जा सकता।
मामले में ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्यों और कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से आग्रह किया कि अधिकारियों को पहले से जारी ट्रांसजेंडर पहचान पत्र रद्द करने से रोका जाए। उनका कहना है कि ये पहचान पत्र समुदाय के लोगों के लिए केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि उनकी कानूनी पहचान और उससे जुड़े अधिकारों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब नए कानून के कारण ट्रांसजेंडर समुदाय के स्व-पहचान के अधिकार (Right to Self-Identification) पर असर पड़ने को लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं।
अदालत ने संकेत दिया कि पहले के कानून के तहत वैध रूप से हासिल पहचान और अधिकारों को केवल इस आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता कि बाद में कानून बदल गया है। याचिकाकर्ताओं ने भी जोर दिया कि सरकार पहले से जारी ट्रांसजेंडर पहचान पत्रों और उनसे जुड़े अधिकारों के महत्व को नजरअंदाज नहीं कर सकती।
यह मामला पहचान पत्रों से आगे बढ़कर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल भी खड़ा करता है—क्या नया कानून पहले से हासिल अधिकारों को खत्म कर सकता है? सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी फिलहाल उन ट्रांसजेंडर लोगों के लिए महत्वपूर्ण राहत का संकेत है, जिन्हें अपने मौजूदा पहचान पत्र और उससे जुड़े अधिकारों के प्रभावित होने की आशंका है।




