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मोदीजी, बच्चों को ‘माफ’ करने से पहले उनसे माफी मांगिए: नई पीढ़ी सवाल पूछना जानती है

जंतर-मंतर की पुलिस की हिंसक कार्रवाई, नाबालिगों की ट्रोलिंग और घर तक पुलिस पहुंचने के आरोपों के बीच प्रधानमंत्री की ‘माफी’ वाली रील पर सवाल—लोकतंत्र में युवा अपराधी नहीं, जवाब मांगने वाले नागरिक हैं

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 1 अगस्त 2026

नई पीढ़ी को उपदेश नहीं, उसके सवालों के जवाब चाहिए

भारत की नई पीढ़ी पुरानी राजनीतिक भाषा से प्रभावित होकर चुप बैठने वाली पीढ़ी नहीं है। वह मोबाइल पर भाषण सुनती है तो उसी मोबाइल पर उसका फैक्ट-चेक भी खोजती है; वह सरकार की रील देखती है तो जमीन की तस्वीरें भी देखती है और किसी बड़े नेता के सामने केवल इसलिए सिर नहीं झुकाती कि वह सत्ता के सर्वोच्च पद पर बैठा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उम्र, पद या राजनीतिक अनुभव अपने स्थान पर हैं, लेकिन लोकतंत्र में कोई व्यक्ति सवालों से ऊपर नहीं होता। किसी नेता के पूरे राजनीतिक जीवन को केवल ‘हिंसा और समाज को बांटने’ की कहानी घोषित कर देना एक राजनीतिक आरोप होगा, तथ्य नहीं; लेकिन यह पूछना पूरी तरह जायज है कि जिस राजनीति पर वर्षों से ध्रुवीकरण, कटु भाषा और विरोधियों के प्रति आक्रामकता के आरोप लगते रहे हैं, वह अचानक नई पीढ़ी को भाषा और संस्कार का पाठ किस नैतिक आधार पर पढ़ा रही है? आज के युवा सत्ता की उम्र नहीं देखते, उसका आचरण देखते हैं। यही Gen Z की ताकत है—उसे सम्मान चाहिए, लेकिन सम्मान के बदले चुप्पी नहीं बेची जा सकती।

मोदीजी, उस बच्ची से व्यक्तिगत तौर पर माफी मांगना राजनीतिक बड़प्पन होगा

प्रधानमंत्री मोदी को उस नाबालिग बच्ची के मामले में व्यक्तिगत संवेदनशीलता दिखानी चाहिए जिसका माफी मांगते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया है। बच्ची ने कोई गलत या आपत्तिजनक शब्द कहा हो तो उसे सही नहीं ठहराया जाना चाहिए। बच्चे भी गलतियां करते हैं और उन्हें गलत भाषा के बारे में समझाया जाना चाहिए। लेकिन क्या एक नाबालिग की गलती की सजा पूरे देश के सामने उसका सार्वजनिक अपमान होना चाहिए? यदि उसे या उसके परिवार को जान से मारने, यौन हिंसा या दूसरी धमकियां मिलीं, उसकी निजी जानकारी प्रसारित की गई अथवा वह भय के कारण कैमरे पर माफी मांगने को मजबूर हुई, तो इन आरोपों की तत्काल और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। प्रधानमंत्री को स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि उनके नाम पर किसी बच्चे को धमकाना स्वीकार्य नहीं है। किसी डरी हुई बच्ची का माफी वाला वीडियो राजनीतिक विजय नहीं है। अगर उसकी माफी डर से निकली है, तो वह हमारे लोकतंत्र की पराजय है।

गलती बच्ची की हो सकती है, लेकिन सजा देने का अधिकार ऑनलाइन भीड़ को किसने दिया?

इस पूरे विवाद में एक बेहद सामान्य मानवीय बात खोती दिखाई दे रही है—वह नाबालिग है। किशोरावस्था में आवेश, क्रोध और गलत शब्द संभव हैं। माता-पिता, शिक्षक और समाज बच्चों को समझाते हैं, सुधारते हैं और आगे बढ़ने का अवसर देते हैं। सभ्य समाज इसी तरह बनता है। लेकिन किसी बच्चे की एक गलती पकड़कर उसका चेहरा लाखों मोबाइल स्क्रीन पर पहुंचा देना, उसे राजनीतिक दुश्मन बना देना और फिर माफी के वीडियो को जीत की ट्रॉफी की तरह प्रसारित करना कैसी संस्कृति है? और यदि यौन हिंसा या हत्या की धमकियां वास्तव में दी गई हैं तो मामला राजनीतिक बहस से बहुत आगे निकल जाता है। धमकी देने वाले व्यक्ति की राजनीतिक विचारधारा चाहे जो हो, कानून को उसके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। किसी बच्चे को डराना न राष्ट्रवाद है, न संस्कार और न राजनीतिक बहादुरी।

20 जुलाई की कार्रवाई के सवाल एक रील से खत्म नहीं होंगे

20 जुलाई को पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। प्रदर्शनकारियों और छात्र संगठनों ने बल प्रयोग, गिरफ्तारी और पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। इन आरोपों पर सरकार और पुलिस का पक्ष भी रिकॉर्ड पर लिया जाना चाहिए और पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र जांच से तथ्य स्पष्ट होने चाहिए। लेकिन यदि छात्रों पर अत्यधिक बल प्रयोग हुआ, तो उसका जवाब यह नहीं हो सकता कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री के लिए अभद्र शब्द इस्तेमाल किए थे। किसी छात्र की गाली पुलिस को मनमाने बल प्रयोग का अधिकार नहीं देती। पुलिस कानून लागू करने वाली संस्था है, राजनीतिक भावनाओं का बदला लेने वाली इकाई नहीं। इसलिए बहस का केंद्र यह भी होना चाहिए कि उस दिन कितना बल प्रयोग हुआ, उसकी आवश्यकता क्या थी, आदेश किस स्तर से दिए गए और यदि कहीं सीमा पार हुई तो जिम्मेदारी किसकी तय हुई।

‘हमने बच्चों को माफ कर दिया’—लेकिन बच्चे पूछ रहे हैं, हमारा अपराध क्या था?

प्रधानमंत्री की ओर से युवाओं को ‘माफ’ करने का संदेश राजनीतिक रूप से उदार दिखाई दे सकता है, लेकिन इसी के साथ एक असुविधाजनक प्रश्न खड़ा होता है—माफी किस अपराध की? सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करना अपराध नहीं है। पेपर लीक पर जवाब मांगना अपराध नहीं है। प्रधानमंत्री की आलोचना करना भी अपराध नहीं है। हां, किसी को गाली देना गलत है और उसकी आलोचना होनी चाहिए। लेकिन यदि ‘माफी’ के समानांतर प्रदर्शनकारियों पर मुकदमे, पुलिस कार्रवाई या उनके घर पहुंचकर दबाव बनाने जैसे आरोप सामने आ रहे हों तो सरकार को उन आरोपों पर भी स्पष्ट जवाब देना चाहिए। क्षमा केवल कैमरे पर बोले गए शब्द से विश्वसनीय नहीं बनती; उसका अर्थ राज्य के व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए।

सोशल मीडिया अकाउंट देखकर घर पहुंच रही पुलिस? आरोप गंभीर हैं, सरकार जवाब दे

छात्रों और कार्यकर्ताओं की ओर से यह आरोप भी लगाया गया है कि सोशल मीडिया गतिविधियों के आधार पर कुछ युवाओं के घर पुलिस पहुंची और उन्हें कथित रूप से धमकाया या पूछताछ की गई। यदि ऐसा हुआ है तो यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि पुलिस किस कानूनी आधार पर गई, संबंधित युवाओं पर क्या आरोप थे और कार्रवाई के लिए क्या प्रक्रिया अपनाई गई। सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना या किसी आंदोलन के समर्थन को अपने आप पुलिस कार्रवाई का आधार नहीं बनाया जा सकता। वहीं यदि किसी पोस्ट में वास्तविक अपराध, हिंसा की धमकी या कानून का उल्लंघन हुआ है तो पुलिस के पास कार्रवाई का अधिकार है। इसीलिए पारदर्शिता जरूरी है। सरकार को आरोपों को केवल राजनीतिक प्रचार कहकर छोड़ने के बजाय तथ्य सार्वजनिक करने चाहिए।

गाली पर नैतिकता की बात होगी तो राजनीति की पुरानी भाषा भी याद आएगी

आज प्रदर्शनकारी युवाओं की भाषा पर संस्कार की बहस छिड़ी है तो राजनीतिक नेताओं की भाषा भी उसी कसौटी पर रखी जाएगी। नरेंद्र मोदी के लंबे राजनीतिक करियर के कई भाषणों और टिप्पणियों पर विपक्ष ने समय-समय पर आपत्ति जताई है। ‘जर्सी गाय’, ‘50 करोड़ की गर्लफ्रेंड’ और ‘दीदी ओ दीदी’ जैसी टिप्पणियां राजनीतिक विवाद का विषय रह चुकी हैं। इन उदाहरणों को सामने रखकर आलोचक पूछ रहे हैं कि यदि सार्वजनिक जीवन में मर्यादा का नया मानक स्थापित करना है तो वह केवल 15 या 20 साल के प्रदर्शनकारियों पर क्यों लागू हो? सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेता से भाषा की जिम्मेदारी कहीं अधिक अपेक्षित होती है। किसी युवा की गाली गलत है तो नेता की अपमानजनक टिप्पणी भी गलत कहने का साहस होना चाहिए। संस्कार की कोई भी कसौटी तभी विश्वसनीय होगी जब वह राजनीतिक पहचान देखकर नहीं बदलेगी।

‘गोडसे वालों को गांधीवादी बना दिया’—सोशल मीडिया पर तीखा व्यंग्य

प्रधानमंत्री के ‘माफ करने’ वाले संदेश के बाद सोशल मीडिया पर व्यंग्य और आलोचना की एक धारा भी दिखाई दी। कुछ टिप्पणीकारों ने इसे गांधीवादी क्षमा की राजनीतिक प्रस्तुति बताते हुए कटाक्ष किया कि नई पीढ़ी ने कठोर राजनीतिक भाषा के लिए पहचाने जाने वाले लोगों को भी क्षमा की बात करने पर मजबूर कर दिया। यह राजनीतिक व्यंग्य है, तथ्यात्मक निष्कर्ष नहीं, लेकिन इसके पीछे मौजूद सवाल महत्वपूर्ण है—क्या सरकार वास्तव में युवाओं के गुस्से को समझ रही है या केवल उसके जवाब में संचार रणनीति तैयार कर रही है? युवा यदि पेपर लीक, परीक्षा व्यवस्था और पुलिस जवाबदेही जैसे सवाल लेकर सड़क पर आए हैं तो एक प्रभावशाली रील उनके मूल सवालों का विकल्प नहीं हो सकती।

विशाल ददलानी हों या पत्रकार—सवाल व्यक्ति का नहीं, राज्य की जवाबदेही का है

गायक-संगीतकार विशाल ददलानी सहित सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों और पत्रकारों द्वारा छात्र आंदोलन तथा पुलिस कार्रवाई पर प्रतिक्रियाएं सामने आना दिखाता है कि मामला केवल छात्र संगठनों के दायरे में नहीं रहा। लेकिन किसी सेलिब्रिटी या पत्रकार की राय अपने आप किसी आरोप को सत्य प्रमाणित नहीं करती। असली कसौटी उपलब्ध वीडियो, मेडिकल रिकॉर्ड, पुलिस रिकॉर्ड, FIR, आदेश और स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। यदि पुलिस ने कानून के मुताबिक न्यूनतम आवश्यक बल इस्तेमाल किया तो तथ्य सामने आने चाहिए; यदि प्रदर्शनकारियों के आरोप सही हैं और अनुपातहीन बल प्रयोग हुआ तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। लोकतंत्र में सरकार से जवाब मांगना पुलिस-विरोध नहीं है और पुलिस की निष्पक्ष जांच की मांग करना राष्ट्र-विरोध भी नहीं है।

अमित शाह से भी सवाल—दिल्ली पुलिस की जवाबदेही कहां तय होगी?

दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में आती है, इसलिए आंदोलनकारी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से राजनीतिक जवाबदेही मांग रहे हैं। AISA नेतृत्व पहले ही उनके इस्तीफे और दिल्ली पुलिस के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठा चुका है। इस्तीफा राजनीतिक मांग है और उस पर सरकार असहमत हो सकती है, लेकिन पुलिस जवाबदेही का प्रश्न उससे अलग और वास्तविक है। यदि 20 जुलाई की कार्रवाई में नियमों का उल्लंघन हुआ तो जांच किसने की? किसी अधिकारी को जिम्मेदार पाया गया या नहीं? किस स्तर पर आदेश दिए गए? क्या कोई आंतरिक समीक्षा हुई? इन सवालों के तथ्यात्मक जवाब सामने आने चाहिए। केवल प्रदर्शनकारियों की भाषा पर चर्चा करके पुलिस कार्रवाई से जुड़े प्रश्न समाप्त नहीं हो जाते।

ये ‘मॉडर्न और स्मार्ट बच्चे’ हैं—इन्हें प्रचार से ज्यादा प्रमाण चाहिए

आज की पीढ़ी राजनीति को केवल टीवी स्टूडियो से नहीं देखती। उसके हाथ में इंटरनेट है, पुराने भाषण हैं, वीडियो हैं, सरकारी दस्तावेज हैं और अलग-अलग पक्षों की बात सुनने की सुविधा है। वह प्रधानमंत्री की रील भी देखती है और प्रदर्शन स्थल का वीडियो भी। वह सरकार का दावा सुनती है तो विपक्ष और स्वतंत्र पत्रकारों के दावों को भी जांचती है। इसलिए नई पीढ़ी से संवाद पुराने राजनीतिक प्रचार की भाषा में नहीं किया जा सकता। उसे यह बताना होगा कि पेपर लीक कैसे रोका जाएगा, परीक्षा व्यवस्था कैसे सुरक्षित होगी, 20 जुलाई को वास्तव में क्या हुआ और पुलिस के खिलाफ लगे आरोपों की जांच कैसे होगी। यही प्रश्न उसे सड़क पर लेकर आए थे और इन्हीं सवालों के उत्तर उसे वापस लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा दिलाएंगे।

प्रधानमंत्री को ‘क्षमा’ से एक कदम आगे बढ़कर जवाबदेही दिखानी चाहिए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास इस विवाद को राजनीतिक टकराव से निकालकर मानवीय संदेश देने का अवसर है। वह स्पष्ट कह सकते हैं कि युवाओं द्वारा इस्तेमाल की गई अपमानजनक भाषा गलत थी, लेकिन किसी नाबालिग को धमकाना उससे कहीं अधिक अस्वीकार्य है। वह संबंधित बच्ची और उसके परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करने को कह सकते हैं, कथित हत्या और यौन हिंसा की धमकियों की जांच का निर्देश दे सकते हैं और 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई की निष्पक्ष समीक्षा का भरोसा दे सकते हैं। जरूरत पड़े तो उस बच्ची से कह सकते हैं—“तुमसे गलती हुई होगी, लेकिन तुम्हें डराया जाना भी गलत था।” यही एक प्रधानमंत्री के पद की गरिमा होगी।

नई पीढ़ी को ‘माफ’ मत कीजिए, उसकी बात सुनिए

भारत के युवा किसी नेता की कृपा से लोकतांत्रिक अधिकार नहीं पाते। सवाल पूछना उनका संवैधानिक अधिकार है। उनकी भाषा गलत हो तो उन्हें समझाइए, आलोचना कीजिए; लेकिन उनके सवालों को गाली के शोर में मत दबाइए। नाबालिग को ऑनलाइन भीड़ के सामने मत छोड़िए और पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाने वालों को दुश्मन मत मानिए। Gen Z को माफी की घोषणा से ज्यादा जवाब चाहिए। वह पूछ रही है कि पेपर क्यों लीक हुआ, प्रदर्शन पर क्या हुआ, कथित ज्यादती के लिए कौन जिम्मेदार है और नाबालिगों को धमकाने वालों पर कार्रवाई कब होगी।

और शायद इस पूरे विवाद का सबसे मानवीय सवाल उसी बच्ची के चेहरे से निकलता है—अगर उससे गलती हुई और उसने माफी मांग ली, तो क्या अब बड़े लोग भी अपनी गलतियों की जिम्मेदारी लेने का साहस दिखाएंगे?

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