राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | तिरुवनंतपुरम | 1 अगस्त 2026
तीन दशक से केरल में पैर पसारे है लेप्टोस्पायरोसिस
केरल में लेप्टोस्पायरोसिस एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बन गया है और इस साल जुलाई में ही इस बीमारी से 50 लोगों की मौत की खबर ने चिंता और बढ़ा दी है। लेप्टोस्पायरोसिस एक उष्णकटिबंधीय जूनोटिक बीमारी है, यानी ऐसा संक्रमण जो जानवरों से मनुष्यों तक पहुंच सकता है। यह रोग Leptospira नामक रोगजनक बैक्टीरिया के कारण होता है और इसका संबंध पर्यावरण, जानवरों तथा मनुष्यों के बीच संपर्क से है। केरल में 1989 से इसके मामले दर्ज किए जा रहे हैं और पिछले तीन दशकों से अधिक समय में यह राज्य में स्थानिक यानी नियमित रूप से मौजूद बीमारी बन चुकी है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह अब केरल में सबसे अधिक मृत्यु-भार वाले संक्रामक रोगों में शामिल हो गया है।
मानसून आते ही तेजी से बढ़ने लगते हैं मामले और मौतें
केरल में लेप्टोस्पायरोसिस के मामले पूरे वर्ष सामने आते हैं, लेकिन दक्षिण-पश्चिम मानसून शुरू होने के बाद संक्रमण और मौतों में तेजी देखी जाती है। बारिश, जलभराव और दूषित पानी के संपर्क से संक्रमण का जोखिम बढ़ सकता है। पिछले तीन वर्षों के आंकड़े विशेष रूप से चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। राज्य में लगातार हर साल लगभग 5,000 मामले और करीब 400 मौतें दर्ज की जा रही हैं, जिनमें पुष्ट और संभावित दोनों मामले शामिल हैं। इस वर्ष जुलाई में ही बीमारी से 50 लोगों की मौत के बाद लेप्टोस्पायरोसिस एक बार फिर राज्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती के रूप में उभरा है।
जानवरों से इंसानों तक कैसे पहुंचता है संक्रमण?
लेप्टोस्पायरोसिस फैलाने वाला बैक्टीरिया संक्रमित जानवरों, विशेषकर चूहों और दूसरे स्तनधारियों के मूत्र के जरिए पर्यावरण में पहुंच सकता है। संक्रमित मूत्र से दूषित पानी या मिट्टी के संपर्क में आने पर बैक्टीरिया त्वचा पर मौजूद कट या घाव तथा शरीर की श्लेष्म झिल्लियों के रास्ते मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर सकता है। मानसून के दौरान खेतों, जलभराव वाले इलाकों, नालियों या बाढ़ के पानी में काम करने और चलने वाले लोगों के लिए जोखिम बढ़ सकता है। यही वजह है कि भारी वर्षा वाले केरल जैसे राज्य में पर्यावरणीय परिस्थितियां इस बीमारी के प्रसार को रोकना कठिन बना देती हैं।
मामूली बुखार से गंभीर बीमारी तक पहुंच सकता है संक्रमण
लेप्टोस्पायरोसिस की गंभीरता हर मरीज में एक जैसी नहीं होती। कुछ लोगों में संक्रमण बहुत हल्का हो सकता है, जबकि गंभीर मामलों में स्थिति तेजी से बिगड़ सकती है। इसके लक्षणों में बुखार, मांसपेशियों में दर्द, आंखों में लालिमा और पेट तथा पाचन तंत्र से जुड़ी समस्याएं शामिल हो सकती हैं। शुरुआती लक्षण कई दूसरी बुखार वाली बीमारियों से मिलते-जुलते होने के कारण समय रहते इसकी पहचान चुनौतीपूर्ण हो सकती है। गंभीर संक्रमण शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को प्रभावित कर सकता है, इसलिए बीमारी की जल्द पहचान और समय पर चिकित्सा महत्वपूर्ण होती है।
केरल में मृत्यु दर इतनी बड़ी चिंता क्यों?
केरल के सामने चुनौती केवल संक्रमण के मामलों की संख्या नहीं, बल्कि उससे जुड़ी मौतों का लगातार ऊंचा स्तर है। पिछले तीन वर्षों से लगभग 5,000 वार्षिक मामलों के साथ करीब 400 पुष्ट और संभावित मौतों का दर्ज होना बताता है कि बीमारी को केवल मानसून के दौरान होने वाले सामान्य संक्रमण की तरह नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे देर से अस्पताल पहुंचना, शुरुआती लक्षणों का दूसरी बीमारियों जैसा होना, गंभीर संक्रमण की तेजी और पर्यावरणीय जोखिम जैसे कई कारक भूमिका निभा सकते हैं। बीमारी की पहचान और इलाज में देरी होने पर मरीज की स्थिति गंभीर हो सकती है।
बारिश और जलभराव के बीच सावधानी बेहद जरूरी
मानसून के दौरान लेप्टोस्पायरोसिस से बचाव में दूषित पानी और मिट्टी से अनावश्यक संपर्क कम करना महत्वपूर्ण है। खेतों, नालियों, जलभराव या बाढ़ के पानी में काम करने वाले लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए और त्वचा पर मौजूद घावों को दूषित पानी के संपर्क से बचाना चाहिए। जोखिम वाले पानी के संपर्क के बाद बुखार, तेज मांसपेशियों में दर्द, आंखों में लालिमा या अन्य असामान्य लक्षण दिखाई दें तो चिकित्सकीय सलाह लेने में देरी नहीं करनी चाहिए। स्वयं दवा लेने के बजाय डॉक्टर से जांच कराना ज्यादा सुरक्षित है।
जुलाई की 50 मौतें केरल के लिए गंभीर चेतावनी
सिर्फ जुलाई में 50 मौतों का आंकड़ा बताता है कि लेप्टोस्पायरोसिस को केरल में केवल मौसमी बीमारी मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। तीन दशकों से राज्य में मौजूद इस संक्रमण के खिलाफ मानसून से पहले तैयारी, जोखिम वाले इलाकों की पहचान, लोगों में जागरूकता, समय पर जांच और शीघ्र उपचार बेहद महत्वपूर्ण हैं। हर साल करीब 5,000 मामलों और लगभग 400 पुष्ट तथा संभावित मौतों का सिलसिला यदि लगातार बना हुआ है, तो चुनौती केवल बीमारी का इलाज करने की नहीं बल्कि मौतों को रोकने की भी है। केरल की मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि संक्रमण को पूरी तरह रोक पाना मुश्किल होने की स्थिति में लेप्टोस्पायरोसिस से होने वाली मौतों को तेजी से कैसे कम किया जाए।




