राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 28 जुलाई 2026
NEET पेपर लीक के खिलाफ देशभर में हुए छात्र आंदोलनों और 20 जुलाई के संसद मार्च के दौरान कथित पुलिस कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अहम टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रदर्शनकारियों और पुलिस, दोनों से जुड़े सभी गंभीर आरोपों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। अदालत ने संकेत दिया कि दिल्ली समेत विभिन्न राज्यों में हुई घटनाओं की जांच के लिए एक हाई-पावर्ड समिति गठित करने पर विचार किया जा रहा है, ताकि पूरे घटनाक्रम की वस्तुनिष्ठ जांच हो सके।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन यदि किसी भी पक्ष ने कानून अपने हाथ में लिया है, चाहे वह प्रदर्शनकारी हों या कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाले अधिकारी, उनके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
दिल्ली तक सीमित नहीं रहेगी जांच
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि मामला केवल 20 जुलाई को दिल्ली में हुए संसद मार्च तक सीमित नहीं है। असम, बिहार, पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में छात्र आंदोलनों के दौरान पुलिस कार्रवाई, बल प्रयोग और कथित ज्यादतियों से जुड़े आरोपों की भी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। अदालत का मानना है कि अलग-अलग राज्यों में हुई घटनाओं को एक व्यापक दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है, ताकि यदि कहीं भी नियमों का उल्लंघन हुआ हो तो उसकी जवाबदेही तय की जा सके।
पुलिस कार्रवाई पर बन सकता है राष्ट्रीय प्रोटोकॉल
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश में बड़े विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई के लिए एक समान और स्पष्ट राष्ट्रीय प्रोटोकॉल की आवश्यकता है। अदालत ने संकेत दिया कि मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा कर ऐसी गाइडलाइंस तैयार की जा सकती हैं, जिनमें प्रदर्शनकारियों के अधिकारों और कानून-व्यवस्था दोनों के बीच संतुलन बनाया जा सके।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन स्वाभाविक हैं, लेकिन भीड़ नियंत्रण के तरीके समय के साथ बदल रहे हैं। इसलिए पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के लिए आधुनिक, मानवीय और स्पष्ट दिशानिर्देश तैयार करना आवश्यक है।
‘कानून हाथ में लेने वालों पर कार्रवाई हो’
अदालत ने साफ कहा कि यदि किसी प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई है या किसी भी पक्ष ने कानून अपने हाथ में लिया है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। इसी तरह यदि पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग या नियमों के उल्लंघन के आरोप हैं, तो उनकी भी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
पीठ ने कहा कि महिलाओं, छात्रों, वकीलों और मीडियाकर्मियों पर कथित हमलों सहित सभी आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी है। प्रथम दृष्टया यदि किसी मामले में अपराध बनता है, तो कानून अपना काम करेगा।
20 जुलाई की कार्रवाई पर बढ़ी न्यायिक निगरानी
20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर पहले ही कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की जा चुकी हैं। प्रदर्शनकारियों ने लाठीचार्ज, अत्यधिक बल प्रयोग और भीड़ नियंत्रण के दौरान निर्धारित मानकों के उल्लंघन के आरोप लगाए हैं। दूसरी ओर पुलिस का कहना है कि प्रदर्शन के दौरान हिंसा और कानून-व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कार्रवाई करनी पड़ी।
अब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होने वाली जांच से यह स्पष्ट हो सकेगा कि घटनाक्रम के दौरान किस पक्ष ने नियमों का उल्लंघन किया और क्या पुलिस ने निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप कार्रवाई की थी।
देशभर की नजर सुप्रीम कोर्ट के अगले कदम पर
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी छात्र आंदोलनों और पुलिस कार्रवाई से जुड़ी बहस में महत्वपूर्ण मोड़ मानी जा रही है। यदि अदालत हाई-पावर्ड जांच समिति का गठन करती है और राष्ट्रीय स्तर पर पुलिस कार्रवाई के लिए एक समान प्रोटोकॉल तैयार होता है, तो भविष्य में बड़े आंदोलनों के दौरान नागरिक अधिकारों और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अगले आदेश पर हैं, जिसमें जांच समिति की संरचना, उसके अधिकार क्षेत्र और जांच की समय-सीमा को अंतिम रूप दिया जा सकता है।




