ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | 27 जुलाई 2026
अगर CJP और वांगचुक को लेकर उठ रहे संदेह सही भी मान लें, तो कहानी सत्ता की जीत की नहीं—रणनीति के उल्टा पड़ जाने की है
पिछले ओपिनियन में हमने एक असहज सवाल उठाया था—क्या CJP और सोनम वांगचुक के इर्द-गिर्द उभरे आंदोलन के पीछे किसी ऐसी राजनीतिक-वैचारिक रणनीति की छाया थी, जिसमें जनता के गुस्से को खत्म करने के बजाय उसका नेतृत्व अपने अनुकूल हाथों में रखने की कोशिश हो? गीतांजलि अंगमो से जोड़े जा रहे ‘मोदी महान’, धर्म और राज्य के रिश्ते, संविधान से ‘सेक्युलर’ शब्द हटाने और संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाने जैसे बयानों ने इस संदेह को और हवा दी है। लेकिन अब इसी बहस का दूसरा और शायद ज्यादा दिलचस्प पहलू देखिए। एक क्षण के लिए मान भी लिया जाए कि CJP या आंदोलन के कुछ चेहरों को लेकर RSS-BJP की कथित रणनीतिक भूमिका के आरोपों में कोई सच्चाई थी, तब भी नतीजा क्या निकला? शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पद छोड़ना पड़ा, सरकार को आंदोलनकारियों से बातचीत करनी पड़ी, पुलिस कार्रवाई राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनी, मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और Gen Z ने सत्ता के सामने अपनी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत दर्ज करा दी। यानी यदि कोई रणनीति आंदोलन की ऊर्जा को नियंत्रित करने की थी, तो वह ऊर्जा नियंत्रण में रहने के बजाय सत्ता के दरवाजे तक जा पहुंची। जिस आग को कथित तौर पर दिशा देने की कोशिश की गई, उसी आग ने सत्ता की राजनीतिक दीवारों को झुलसा दिया। इसीलिए इस कहानी का दूसरा सवाल पहले से भी ज्यादा बड़ा है—अगर ‘मोहरा’ था भी, तो आखिर मात किसकी हुई?
जिस आंदोलन को नियंत्रित करने का आरोप लगा, उसी ने मंत्री की कुर्सी ले ली
राजनीति में किसी रणनीति की सफलता उसके इरादे से नहीं, उसके नतीजे से तय होती है। NEET, पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था को लेकर छात्रों का गुस्सा कोई प्रयोगशाला में पैदा किया गया असंतोष नहीं था। उसके पीछे वर्षों की मेहनत, परीक्षाओं की विश्वसनीयता को लेकर सवाल, छात्रों की निराशा और परिवारों की बेचैनी थी। CJP हो, कांग्रेस हो, NSUI हो, युवा कांग्रेस हो, सोनम वांगचुक हों या कोई और—कोई भी इस गुस्से को पैदा करने का दावा नहीं कर सकता। राजनीतिक और सामाजिक संगठन अधिकतम उसे मंच दे सकते थे। और यही वह जगह है जहां कथित ‘कंट्रोल्ड ऑपोजिशन’ वाली थ्योरी अपने सबसे बड़े विरोधाभास से टकराती है। यदि किसी का उद्देश्य यह था कि युवाओं के असंतोष को एक ऐसे मंच में समेट दिया जाए जो सत्ता के लिए अंततः सुरक्षित साबित हो, तो फिर वह आंदोलन इतना बड़ा कैसे हुआ कि धर्मेंद्र प्रधान की कुर्सी चली गई? सरकार को सार्वजनिक आश्वासन क्यों देने पड़े? संसद तक उसकी गूंज क्यों पहुंची? पुलिस कार्रवाई को लेकर देशव्यापी बहस क्यों खड़ी हुई? इसका अर्थ कम से कम इतना जरूर है कि आंदोलन की ताकत उसके चेहरों से कहीं बड़ी हो चुकी थी। जिसे कोई नियंत्रित करना चाहता भी था, वह नियंत्रण से बाहर निकल चुका था।
‘सत्ता भी हमारी, विपक्ष भी हमारा’ का मॉडल Gen Z के सामने क्यों टिक नहीं पाया?
पुरानी राजनीति में नेतृत्व को नियंत्रित करना कई बार आंदोलन को नियंत्रित करने के बराबर माना जाता था। ऊपर बैठे कुछ नेताओं से बात कर लीजिए, समझौता करा दीजिए, मंच खाली करा दीजिए और आंदोलन खत्म। लेकिन डिजिटल पीढ़ी की राजनीति इतनी सरल नहीं है। Gen Z किसी एक पार्टी कार्यालय, छात्र संगठन या स्थापित नेता के आदेश से पैदा हुई भीड़ नहीं है। उसके पास अपना फोन है, अपना कैमरा है, अपनी लाइव स्ट्रीम है, अपने सोशल मीडिया नेटवर्क हैं और सबसे महत्वपूर्ण—अपनी कहानी खुद दुनिया तक पहुंचाने की क्षमता है। इसलिए यदि किसी ने यह सोचा कि आंदोलन का कोई लोकप्रिय चेहरा अपने अनुकूल होने भर से पूरा आंदोलन अपने अनुकूल हो जाएगा, तो यही सबसे बड़ी राजनीतिक भूल थी। युवा CJP के मंच पर आ सकता है, सोनम वांगचुक को सुन सकता है, राहुल गांधी के साथ खड़ा हो सकता है, किसी स्वतंत्र डिजिटल एक्टिविस्ट को फॉलो कर सकता है और अगले ही दिन इन्हीं सभी से सवाल भी पूछ सकता है। नई पीढ़ी की यही तरलता पुरानी ‘कंट्रोल्ड पॉलिटिक्स’ के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
आंदोलन खत्म हुआ, लेकिन सरकार की मुश्किल खत्म नहीं हुई
अगर किसी रणनीति का उद्देश्य धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद आंदोलन को तेजी से समेटकर राजनीतिक नुकसान रोकना था, तो यहां भी कहानी उल्टी दिखाई देती है। आंदोलन समाप्त होने के बाद विवाद खत्म नहीं हुआ। प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी और हिरासत की खबरों पर खुद CJP को सवाल उठाने पड़े। पुलिस कार्रवाई को लेकर राजनीतिक हमला जारी रहा। सुप्रीम कोर्ट में शांतिपूर्ण विरोध के संवैधानिक अधिकार और पुलिस के आचरण जैसे बड़े सवाल पहुंच गए। यानी जंतर-मंतर से तंबू हट जाना राजनीतिक कहानी का अंत नहीं बना। बल्कि आंदोलन सड़क से निकलकर अदालत, संसद, मीडिया और सोशल मीडिया—चारों जगह फैल गया। सत्ता के लिए कभी-कभी सड़क पर बैठी भीड़ से निपटना आसान होता है; उससे कहीं कठिन उस विचार से निपटना होता है जो भीड़ के घर लौट जाने के बाद भी जिंदा रहता है। इस आंदोलन ने वही किया—उसने पेपर लीक के मुद्दे को केवल परीक्षा की समस्या नहीं रहने दिया, बल्कि जवाबदेही, पुलिस कार्रवाई और विरोध के संवैधानिक अधिकार से जोड़ दिया।
पुलिस कार्रवाई ने वह कर दिया जो शायद आंदोलन के नेता भी नहीं कर सकते थे
किसी भी आंदोलन को कमजोर करने का सबसे आसान तरीका उसे जनता की सहानुभूति से काट देना होता है। लेकिन जब शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप सामने आते हैं, घायल युवाओं की तस्वीरें फैलती हैं और पुलिस कार्रवाई खुद राष्ट्रीय बहस बन जाती है, तो सत्ता के लिए राजनीतिक समीकरण उल्टा पड़ सकता है। जिस आंदोलन को ‘कुछ प्रदर्शनकारियों’ तक सीमित किया जा सकता था, वह नागरिक अधिकारों की बहस बन जाता है। यही कारण है कि पुलिस की प्रत्येक कार्रवाई केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं होती; उसका राजनीतिक परिणाम भी होता है। यदि राज्य जरूरत से ज्यादा ताकत दिखाता हुआ दिखाई दे, तो आंदोलन के नेताओं की कमियां पीछे चली जाती हैं और सत्ता का व्यवहार केंद्र में आ जाता है। इस छात्र आंदोलन के साथ भी यही जोखिम पैदा हुआ। CJP की संरचना क्या है, सोनम वांगचुक किस विचारधारा के करीब हैं—ये सवाल अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन पुलिस कार्रवाई की बहस ने एक और बड़ा सवाल सामने रख दिया: क्या लोकतंत्र अपने युवाओं की नाराजगी सुन सकता है, या उसका पहला जवाब बल होगा?
सोनम वांगचुक ‘मोहरा’ थे या नहीं, इससे बड़ा सवाल यह है कि आंदोलन किसी का मोहरा नहीं रहा
सोनम वांगचुक को लेकर उठ रहे आरोपों की स्वतंत्र तथ्यात्मक जांच होनी चाहिए। गीतांजलि अंगमो के कथित बयानों को पूरे मूल संदर्भ में देखा जाना चाहिए और RSS-BJP से कथित रिश्तों को दस्तावेजों के आधार पर परखा जाना चाहिए। लेकिन मान लीजिए, केवल तर्क के लिए, कि आंदोलन में कोई ऐसा चेहरा मौजूद था जिसे सत्ता या किसी वैचारिक संगठन के लिए सुविधाजनक माना जाता था—तब भी क्या उससे लाखों युवाओं की चेतना नियंत्रित हो गई? जवाब घटनाक्रम में दिखाई देता है। युवा अपनी मांग लेकर आए थे; मंत्री के इस्तीफे के बाद भी पुलिस कार्रवाई, गिरफ्तारियों और मुकदमों पर सवाल कर रहे हैं। वे आंदोलन के नेतृत्व से भी पूछ रहे हैं कि समझौता क्या हुआ था। यही वह क्षण है जहां ‘मोहरा’ वाली राजनीति टूटती है। शतरंज में मोहरा वही है जिसकी चाल कोई दूसरा तय करता है। लेकिन यहां मैदान में मौजूद हजारों युवाओं ने अपनी चाल खुद चलनी शुरू कर दी। चेहरे किसी के हो सकते हैं, जनाक्रोश किसी की निजी संपत्ति नहीं होता।
धर्मेंद्र प्रधान का जाना प्रतीक से कहीं ज्यादा बड़ा राजनीतिक संदेश बना
किसी केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा अपने आप पूरी व्यवस्था की हार नहीं होता और न ही इससे पेपर लीक जैसी समस्या समाप्त हो जाती है। लेकिन राजनीति प्रतीकों से भी चलती है। धर्मेंद्र प्रधान का जाना आंदोलनकारी युवाओं के लिए इस विश्वास का प्रतीक बना कि दबाव बनाया जाए तो सत्ता को जवाब देना पड़ सकता है। यही सत्ता के लिए सबसे असुविधाजनक परिणाम है। सरकारें एक मंत्री बदल सकती हैं; लेकिन जनता के भीतर पैदा हुआ यह विश्वास आसानी से नहीं बदल सकतीं कि संगठित दबाव परिणाम दे सकता है। यदि किसी कथित रणनीति का लक्ष्य युवाओं के गुस्से को नियंत्रित रास्ते से निकालकर निष्प्रभावी करना था, तो मंत्री का इस्तीफा उस रणनीति के ठीक विपरीत संदेश लेकर गया—सड़क पर उतरोगे तो सत्ता झुक सकती है। आने वाले आंदोलनों के लिए यह मनोवैज्ञानिक पूंजी किसी एक संगठन की जीत से कहीं बड़ी चीज है।
RSS-BJP के लिए असली खतरा CJP नहीं, राजनीतिक रूप से आत्मनिर्भर होती नई पीढ़ी है
यहीं इस पूरे घटनाक्रम की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक परत खुलती है। RSS या BJP के लिए चुनौती किसी एक CJP, सोनम वांगचुक या अभिजीत दीपके से नहीं है। आज कोई चेहरा लोकप्रिय है, कल दूसरा हो सकता है। असली चुनौती उस पीढ़ी से है जिसकी राजनीतिक निष्ठाएं पहले की तुलना में कहीं कम स्थायी हैं। वह सरकार की किसी नीति का समर्थन कर सकती है और दूसरी नीति पर उसी सरकार के खिलाफ सड़क पर उतर सकती है। वह राहुल गांधी की किसी बात से सहमत हो सकती है लेकिन कांग्रेस से सवाल पूछना नहीं छोड़ेगी। वह सोनम वांगचुक का सम्मान कर सकती है और अगले दिन उनसे RSS को लेकर उनकी स्थिति पूछ सकती है। वह CJP के आंदोलन में शामिल हो सकती है और आंदोलन खत्म करने के फैसले पर उसी CJP को कठघरे में खड़ा कर सकती है। यही नई राजनीति है—जहां समर्थक हमेशा कार्यकर्ता नहीं होता और फॉलोअर हमेशा अनुयायी नहीं होता।
कांग्रेस के लिए भी यह मुफ्त की जीत नहीं है
इस घटनाक्रम को केवल BJP की पराजय और कांग्रेस की जीत बताना भी जल्दबाजी होगी। राहुल गांधी, कांग्रेस, NSUI और युवा कांग्रेस ने पेपर लीक तथा छात्रों के सवालों को उठाया—यह उनकी राजनीतिक भूमिका का हिस्सा है। लेकिन Gen Z अगर BJP के नियंत्रण में आसानी से नहीं आती तो यह मान लेना भी भूल होगी कि वह स्वाभाविक रूप से कांग्रेस की स्थायी राजनीतिक संपत्ति बन जाएगी। युवा यदि सत्ता से परिणाम मांग रहा है तो विपक्ष से भी विश्वसनीयता, निरंतरता और जवाबदेही मांगेगा। कांग्रेस को इसका राजनीतिक लाभ तभी मिलेगा जब वह छात्रों के मुद्दों पर आंदोलन समाप्त होने के बाद भी खड़ी दिखाई दे, गिरफ्तार युवाओं, मुकदमों, परीक्षा सुधार और संस्थागत जवाबदेही के प्रश्नों को लगातार उठाए। नई पीढ़ी को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि सरकार गलत है; उसे यह भी बताना होगा कि विकल्प बेहतर कैसे होगा।
सबसे बड़ी हार उस राजनीति की हुई जो मानती है कि जनता को ‘मैनेज’ किया जा सकता है
इस पूरे घटनाक्रम को RSS, BJP, CJP, कांग्रेस या सोनम वांगचुक से थोड़ा ऊपर उठकर देखने की जरूरत है। सबसे बड़ी चोट उस पुरानी राजनीतिक सोच को लगी है जिसमें जनता को वोट बैंक, सोशल मीडिया समूह, जातीय समीकरण, धार्मिक पहचान या किसी लोकप्रिय चेहरे के जरिए स्थायी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है। डिजिटल युग का नागरिक विरोधाभासी हो सकता है, अस्थिर हो सकता है, भावुक हो सकता है—लेकिन वह सूचना के पुराने दरवाजों पर निर्भर नहीं है। वह अपनी कहानी खुद रिकॉर्ड करता है और स्थापित मीडिया को बायपास करके लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। इसीलिए यदि वास्तव में किसी ने सोचा था कि आंदोलन के भीतर अपना ‘सुविधाजनक चेहरा’ मौजूद रहने से आंदोलन सुरक्षित रहेगा, तो उसने 2026 की युवा राजनीति को पुराने राजनीतिक चश्मे से पढ़ने की गलती की।
‘मोहरा’ बिठाया था तो मोहरा भी नहीं बचा और बाजी भी हाथ से निकल गई
यही इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम का सबसे तीखा निष्कर्ष है—बशर्ते ‘कंट्रोल्ड ऑपोजिशन’ वाले आरोप कभी ठोस प्रमाणों से सिद्ध हों। अगर CJP या सोनम वांगचुक के जरिए आंदोलन को नियंत्रित करने की कोई योजना थी, तो नतीजों की कसौटी पर वह योजना सफल दिखाई नहीं देती। मंत्री की कुर्सी गई, सरकार को पीछे हटना पड़ा, पुलिस कार्रवाई सवालों में आई, सुप्रीम कोर्ट तक विरोध के संवैधानिक अधिकार की बहस पहुंची और सबसे बढ़कर युवाओं को अपनी सामूहिक ताकत का एहसास हुआ। उलटे अब उन्हीं चेहरों से भी सवाल शुरू हो गए हैं जिन्हें आंदोलन का नेतृत्व मिला था। यानी जिस कथित व्यवस्था में नेतृत्व के जरिए आंदोलन को नियंत्रित किया जाना था, वहां आंदोलन ने नेतृत्व को ही जवाबदेह बनाना शुरू कर दिया।
और शायद यही सबसे बड़ा राजनीतिक उलटफेर है।
अगर RSS-BJP ने कोई मोहरा बिठाया ही नहीं था, तो आरोप लगाने वालों को प्रमाण देना होगा। लेकिन अगर कभी प्रमाणित हुआ कि ऐसा कोई प्रयोग सचमुच था, तो इतिहास में उसकी कहानी किसी सफल राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक की नहीं लिखी जाएगी। कहानी यह होगी कि मोहरा बिठाने वाले भूल गए थे—शतरंज की बिसात पर मोहरे नियंत्रित किए जा सकते हैं, जागे हुए नागरिक नहीं।
जंतर-मंतर से निकला सबसे बड़ा संदेश शायद यही है: नई पीढ़ी किसी की स्थायी सेना नहीं है। उसे इस्तेमाल करने निकलिएगा तो संभव है कि वह पहले सत्ता को चुनौती दे और फिर मुड़कर अपने कथित नेतृत्व से भी हिसाब मांग ले।
और अगर ऐसा हुआ है, तो हार किसी एक मंत्री या पार्टी की नहीं है। हार उस पूरी राजनीति की है जो आज भी यह मानकर चलती है—“सत्ता भी हमारी और विपक्ष भी हमारा।”




