ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | 27 जुलाई 2026
सत्ता भी हमारी, विपक्ष भी हमारा? RSS के एजेंडे, CJP और सोनम वांगचुक के रिश्तों का सच सामने आना चाहिए
भारतीय राजनीति में कई बार जो सामने दिखाई देता है, पूरी कहानी उतनी सीधी नहीं होती। कोई आंदोलन कैसे खड़ा होता है, उसे ताकत कौन देता है, सही समय पर उसका सबसे बड़ा चेहरा कौन बन जाता है, उससे राजनीतिक फायदा किसे मिलता है और आखिर में वह आंदोलन किन शर्तों पर खत्म होता है—इन सवालों को पूछना किसी के खिलाफ साजिश नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जरूरत है। आज ऐसे ही सवाल Cockroach Janta Party यानी CJP और सोनम वांगचुक के इर्द-गिर्द खड़े हो रहे हैं। सवाल यह नहीं कि हर आंदोलन के पीछे कोई छिपी हुई शक्ति होती ही है। सवाल यह है कि जब कोई आंदोलन लाखों युवाओं के गुस्से, उम्मीद और भविष्य की आवाज बनने लगे, तब उसके नेतृत्व, वैचारिक रिश्तों, संसाधनों और फैसलों की पड़ताल क्यों न हो? और यदि सब कुछ साफ और स्वतंत्र है, तो पारदर्शिता से परेशानी भी क्यों हो? इसी बीच सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो से जोड़े जा रहे कुछ पुराने बयानों ने इस बहस को और तीखा कर दिया है। अब सवाल केवल CJP के संगठन और आंदोलन खत्म करने के फैसले तक सीमित नहीं रहा। सवाल उस वैचारिक जमीन का भी है, जिसके आसपास आंदोलन के कुछ प्रमुख चेहरे खड़े दिखाई देते हैं। और यहीं वह असहज सवाल सामने आता है—क्या कहीं ऐसा राजनीतिक मॉडल तो नहीं बन रहा जिसमें “सत्ता भी हमारी और विपक्ष भी हमारा?”
‘धर्म राज्य का हिस्सा’, ‘मोदी महान’, ‘सेक्युलर’ शब्द हटे—इन बयानों को हल्के में नहीं लिया जा सकता
सोशल मीडिया पर प्रसारित एक वीडियो में गीतांजलि अंगमो से ऐसे विचार जोड़े जा रहे हैं जिनमें धर्म और राज्य के संबंध, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा, संविधान की प्रस्तावना से ‘सेक्युलर’ शब्द हटाने और संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाने जैसी बातें शामिल बताई जा रही हैं। यदि पूरे मूल वीडियो और उसके संदर्भ में भी उनका आशय यही है, तो ये कोई साधारण टिप्पणियां नहीं हैं। ये सीधे भारत के संवैधानिक चरित्र, राष्ट्र की अवधारणा और राजनीति में धर्म की भूमिका से जुड़े सवाल हैं। किसी नागरिक को नरेंद्र मोदी महान लग सकते हैं—यह उसका अधिकार है। कोई संस्कृत को अधिक महत्व देने या उसके व्यापक प्रचार की मांग कर सकता है—उस पर लोकतांत्रिक बहस हो सकती है। लेकिन जब बात धर्म और राज्य के रिश्ते तथा संविधान में दर्ज ‘सेक्युलर’ शब्द को हटाने तक पहुंचे तो वह विचार स्वाभाविक रूप से राजनीतिक और संवैधानिक पड़ताल का विषय बन जाता है। इसलिए इन कथनों का पूरा मूल संदर्भ सामने आना जरूरी है। किसी कटी हुई वायरल क्लिप को अंतिम प्रमाण मानना ठीक नहीं होगा, लेकिन अगर असंपादित रिकॉर्ड में भी यही बातें कही गई हैं तो फिर उनसे पैदा होने वाले सवालों को केवल ‘राजनीतिक हमला’ बताकर खारिज भी नहीं किया जा सकता।
गीतांजलि की विचारधारा सोनम की विचारधारा नहीं—लेकिन सोनम अपनी बात तो साफ करें
यहां एक बुनियादी फर्क बनाए रखना जरूरी है। पत्नी के विचार अपने आप पति के विचार नहीं हो जाते। गीतांजलि अंगमो एक स्वतंत्र व्यक्ति हैं और उनकी राजनीतिक तथा वैचारिक मान्यताओं को बिना प्रमाण सोनम वांगचुक की मान्यता घोषित नहीं किया जा सकता। इसी तरह परिवार के किसी सदस्य के RSS या BJP से कथित संबंध से यह साबित नहीं हो जाता कि सोनम भी किसी संगठन के एजेंडे पर काम कर रहे हैं। लेकिन इसके बाद भी कुछ सवाल बचते हैं। सोनम वांगचुक अब केवल पर्यावरण, शिक्षा या लद्दाख तक सीमित सार्वजनिक व्यक्तित्व नहीं रहे। वे देशव्यापी आंदोलनों में प्रभाव रखने वाला चेहरा हैं और बड़ी संख्या में युवा उन पर भरोसा करते हैं। इसलिए उनसे यह पूछना पूरी तरह जायज है कि RSS को लेकर उनकी अपनी सोच क्या है? भारत के धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक स्वरूप पर वे कहां खड़े हैं? संविधान से ‘सेक्युलर’ शब्द हटाने की मांग पर उनका मत क्या है? धर्म और राज्य के संबंध को वे किस तरह देखते हैं? हिंदू राष्ट्र की अवधारणा पर उनकी राय क्या है? इन सवालों का स्पष्ट जवाब आ जाए तो बहुत-सी अटकलें और आरोप अपने आप कमजोर पड़ सकते हैं।
राहुल गांधी ने लद्दाख में जो सवाल उठाए थे, वे आखिर कहां गए?
सोनम वांगचुक के इर्द-गिर्द पैदा हुए राजनीतिक संदेह को समझने के लिए लद्दाख के घटनाक्रम को भी देखना होगा। राहुल गांधी ने अपनी लद्दाख यात्राओं के दौरान चीन से जुड़े सीमा विवाद, स्थानीय लोगों की चिंताओं और क्षेत्र के राजनीतिक भविष्य जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श में उठाया था। दूसरी तरफ सोनम वांगचुक लद्दाख को राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा, पर्यावरण और स्थानीय अधिकारों की मांग को लेकर आंदोलन का बड़ा चेहरा बने। इसके बाद घटनाक्रम तेजी से बदला—आंदोलन हुआ, टकराव हुआ, हिरासत हुई और फिर रिहाई भी हुई। यहां सवाल सोनम की मांगों को गलत साबित करने का नहीं है। सवाल यह है कि इतने बड़े राजनीतिक शोर के बाद लद्दाख के उन तमाम मुद्दों का क्या हुआ जो पहले राष्ट्रीय बहस के केंद्र में थे? चीन, सीमा सुरक्षा, जमीन, स्थानीय प्रतिनिधित्व और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े सवालों में कौन से आगे बढ़े और कौन से पीछे छूट गए? किसी आंदोलन की नीयत का फैसला केवल उसके परिणाम देखकर नहीं किया जा सकता, लेकिन यह जरूर पूछा जा सकता है कि अंततः राजनीतिक लाभ किसे मिला और मूल मुद्दों का क्या हुआ।
फिर छात्र आंदोलन आया और CJP-वांगचुक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गए
2026 में NEET, पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था को लेकर युवाओं का गुस्सा जब सड़कों पर फूटा तो CJP और अभिजीत दीपके तेजी से आंदोलन के सबसे चर्चित चेहरों में शामिल हो गए। सोनम वांगचुक भी आंदोलन से जुड़े और उनका अनशन राष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बन गया। आंदोलन ने सरकार पर जबरदस्त दबाव बनाया और अंततः धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री का पद छोड़ना पड़ा। यह युवा आंदोलन की बड़ी राजनीतिक उपलब्धि के रूप में सामने आया। लेकिन किसी आंदोलन की सफलता उसके नेतृत्व को सवालों से मुक्त नहीं करती; बल्कि उसकी जवाबदेही और बढ़ाती है। इसलिए अब पूछा जाना चाहिए—CJP आखिर कैसे बना? इसकी संगठनात्मक संरचना क्या है? फैसले कौन करता है? इसके संसाधन कहां से आते हैं? सरकार से बातचीत करने का अधिकार किसके पास था? AAP, RSS या किसी दूसरे राजनीतिक अथवा वैचारिक संगठन से संबंधों को लेकर जो आरोप लगाए जा रहे हैं, उनका आधार क्या है? अभी ऐसा निर्णायक सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं है जिसके आधार पर यह तथ्य घोषित किया जा सके कि RSS ने CJP को बनवाया या नियंत्रित किया। लेकिन आरोप गलत हैं तो उनका सबसे प्रभावी जवाब भी बेहद सरल है—पूरी पारदर्शिता।
सबसे बड़ा सवाल—जीत के बाद आंदोलन समेटने की इतनी जल्दी क्यों?
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद 36 दिनों से चल रहा आंदोलन समाप्त कर दिया गया। सरकार की ओर से शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं किए जाने के आश्वासन की बात सामने आई। लेकिन कुछ ही दिनों बाद खुद CJP को असम, पश्चिम बंगाल और बिहार में छात्रों तथा प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी और हिरासत पर चिंता जतानी पड़ी। संगठन ने बंदियों को छोड़ने और FIR वापस लेने की मांग की। यही वह जगह है जहां आंदोलन के नेतृत्व से सबसे कठिन सवाल पूछा जाना चाहिए। यदि आंदोलन खत्म करने से पहले सरकार ने प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा का भरोसा दिया था तो वह भरोसा लिखित था या मौखिक? बातचीत किन लोगों के बीच हुई? दर्ज मुकदमों को वापस लेने पर क्या सहमति बनी थी? आगे कोई कार्रवाई नहीं होगी, इसकी क्या गारंटी थी? और यदि समझौते के कुछ ही दिनों बाद आंदोलन से जुड़े लोगों को गिरफ्तारियों और मुकदमों का सामना करना पड़ा तो क्या आंदोलन खत्म करने का फैसला जल्दबाजी में लिया गया? आंदोलन की सफलता केवल मंत्री का इस्तीफा लेने में नहीं मापी जा सकती। आंदोलन के बाद उसके कार्यकर्ताओं और समर्थकों के साथ क्या होता है, यह भी नेतृत्व की जिम्मेदारी का हिस्सा है।
अन्ना आंदोलन की याद इसलिए बार-बार लौटती है
भारत गैर-दलीय दिखाई देने वाले जनआंदोलनों की राजनीतिक ताकत पहले भी देख चुका है। अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन नागरिक आंदोलन के रूप में सामने आया और उसी दौर की ऊर्जा से आगे चलकर AAP का जन्म हुआ। उस आंदोलन में RSS की भूमिका को लेकर वर्षों से राजनीतिक दावे और प्रतिदावे होते रहे हैं। इसलिए जब कोई नया, मुख्यतः डिजिटल माध्यमों से उभरा और कथित तौर पर गैर-दलीय आंदोलन बहुत कम समय में असाधारण राष्ट्रीय प्रभाव हासिल करता है तो उसके संगठन, नेटवर्क, वित्तपोषण और निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन यहां तथ्य और आरोप के बीच की सीमा नहीं मिटनी चाहिए। “RSS ने अन्ना आंदोलन खड़ा किया, फिर AAP बनवाई और अब CJP बनवाई”—इतनी बड़ी राजनीतिक श्रृंखला को केवल संदेह के आधार पर तथ्य घोषित नहीं किया जा सकता। जिसके पास इसके प्रमाण हैं, उसे दस्तावेज सामने रखने चाहिए। लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण प्रमाण देने का दायित्व भी है।
सोनम वांगचुक की प्रतिष्ठा जितनी बड़ी है, जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी होगी
सोनम वांगचुक की शिक्षा, नवाचार, पर्यावरण और लद्दाख से जुड़े मुद्दों पर वर्षों की सार्वजनिक भूमिका रही है। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है और इसी ने उन्हें युवाओं के बीच नैतिक विश्वसनीयता दी है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठा सवालों से सुरक्षा कवच नहीं बन सकती। प्रभाव जितना बड़ा होता है, जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी होती है। यदि यह दावा किया जा रहा है कि किसी सरकारी अधिकारी के कहने या आग्रह पर वे छात्र आंदोलन से जुड़े थे, तो उस कथित बातचीत का पूरा संदर्भ सामने आना चाहिए। यदि किसी इंटरव्यू में उन्होंने ऐसी कोई बात कही है तो पूरा इंटरव्यू देखा जाना चाहिए, न कि कुछ सेकंड की क्लिप। उसी तरह गीतांजलि अंगमो के बयानों का भी पूरा मूल रिकॉर्ड देखा जाना चाहिए। लेकिन सोनम स्वयं RSS, BJP, धर्मनिरपेक्षता, धर्म और राज्य के रिश्ते तथा संविधान से जुड़े सवालों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करके इस बहस का बड़ा हिस्सा समाप्त कर सकते हैं। सवालों का जवाब सवाल पूछने वालों की नीयत पर हमला करना नहीं, तथ्य और स्पष्टता देना होना चाहिए।
असली लड़ाई छात्रों की थी—किसी पार्टी या आंदोलनकारी की जागीर नहीं
इस पूरे राजनीतिक शोर में सबसे जरूरी बात कहीं खो नहीं जानी चाहिए। NEET और पेपर लीक के खिलाफ कांग्रेस, NSUI, युवा कांग्रेस और राहुल गांधी ने अपनी राजनीतिक लड़ाई लड़ी। CJP ने सड़क पर अलग तरह का युवा आंदोलन खड़ा किया। सोनम वांगचुक उसमें शामिल हुए। दूसरे राजनीतिक और सामाजिक समूहों ने भी समर्थन किया। लेकिन इस आंदोलन की पीड़ा पर किसी का कॉपीराइट नहीं हो सकता। इसका असली चेहरा वह छात्र था जिसने वर्षों मेहनत की और फिर पाया कि व्यवस्था की गड़बड़ी उसकी मेहनत से बड़ी हो गई है। इसका असली दर्द उन माता-पिताओं का था जिन्होंने बच्चों की पढ़ाई और भविष्य के लिए अपनी कमाई लगा दी। इसकी असली ताकत उन युवाओं की थी जो सड़क पर उतरे। इसलिए किसी एक पार्टी, संगठन या आंदोलनकारी को पूरी जीत का नायक बना देना उतना ही गलत होगा जितना दूसरों के योगदान को मिटा देना।
Gen Z ने सरकार से सवाल किया, अब अपने आंदोलन के नेताओं से भी करे
नई पीढ़ी ने दिखा दिया है कि उसे हल्के में लेना किसी भी सरकार के लिए राजनीतिक भूल हो सकती है। Gen Z सोशल मीडिया पर सवाल उठा सकती है, उसे सड़क तक पहुंचा सकती है और सड़क से सत्ता के सबसे ऊंचे गलियारों तक दबाव बना सकती है। लेकिन यही ताकत हर राजनीतिक दल और वैचारिक संगठन को आकर्षित भी करेगी। हर कोई इस ऊर्जा को अपने पक्ष में मोड़ना चाहेगा। इसलिए युवाओं की अगली परीक्षा सरकार से लड़ने से भी कठिन है—उन्हें अपने नेताओं से भी सवाल पूछने होंगे। पैसा कहां से आया? फैसला किसने किया? सरकार से कौन मिला? क्या समझौता हुआ? कौन-सी मांग मानी गई और कौन-सी छोड़ दी गई? आंदोलन किसके फैसले से समाप्त हुआ? और आंदोलन खत्म होने के बाद गिरफ्तार या मुकदमों का सामना कर रहे युवाओं के साथ कौन खड़ा है? इन सवालों से कोई आंदोलन कमजोर नहीं होता। इन्हीं सवालों से आंदोलन किसी व्यक्ति, पार्टी या संगठन की निजी राजनीतिक संपत्ति बनने से बचता है।
‘सत्ता भी हमारी, विपक्ष भी हमारा’—यदि यह सिर्फ शक है तो पारदर्शिता इसे खत्म कर देगी
लोकतंत्र के लिए इससे ज्यादा असहज स्थिति शायद ही कोई हो कि सत्ता पर प्रभाव रखने वाली कोई वैचारिक ताकत उसके खिलाफ पैदा होने वाले विरोध के मंचों पर भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव रखने लगे। यदि “सत्ता भी हमारी और विपक्ष भी हमारा” केवल राजनीतिक आशंका है तो संबंधित पक्षों के पास इसे खत्म करने का सबसे आसान रास्ता पारदर्शिता है। CJP अपने वित्तपोषण, संगठनात्मक ढांचे, निर्णय प्रक्रिया और सरकार के साथ हुई बातचीत की जानकारी सार्वजनिक करे। सोनम वांगचुक RSS-BJP से कथित संबंधों, धर्मनिरपेक्षता और दूसरे संवैधानिक सवालों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करें। गीतांजलि अंगमो से जोड़े जा रहे बयानों का पूरा मूल वीडियो और संदर्भ सामने आए। दूसरी तरफ आरोप लगाने वालों की भी उतनी ही जिम्मेदारी है कि वे सोशल मीडिया के संदेह को प्रमाणित तथ्य बताने के बजाय दस्तावेज दें। तभी यह बहस राजनीतिक आरोपों और वायरल क्लिप से निकलकर तथ्यों की जमीन पर आ सकेगी।
किसी को देवता मत बनाइए—न सत्ता को, न विपक्ष को, न आंदोलनकारी को
जंतर-मंतर की सबसे बड़ी जीत केवल किसी मंत्री का इस्तीफा नहीं हो सकती। उसकी असली जीत तब होगी जब वहां खड़ा युवा यह समझे कि उसकी ताकत किसी पार्टी, नेता या आंदोलनकारी की निजी संपत्ति नहीं है। प्रधानमंत्री से सवाल करना लोकतंत्र है तो विपक्ष से सवाल करना भी लोकतंत्र है। RSS से सवाल करना अधिकार है तो कांग्रेस, AAP और CJP से सवाल करना भी उतना ही जरूरी है। सोनम वांगचुक लोकप्रिय और प्रतिष्ठित हैं तो उनसे सवाल पूछना उनका अपमान नहीं हो जाता। गीतांजलि अंगमो के विचारों से असहमति है तो उनके पूरे बयान को सुनकर सवाल होना चाहिए, किसी काटी हुई क्लिप के आधार पर फैसला नहीं। किसी को देवता मत बनाइए—न सत्ता को, न विपक्ष को और न आंदोलन के किसी चेहरे को। दस्तावेज मांगिए, पैसे का स्रोत पूछिए, समझौते की शर्तें जानिए, राजनीतिक और वैचारिक रिश्तों की पड़ताल कीजिए और हर दावे को प्रमाण की कसौटी पर रखिए।
क्योंकि यदि “सत्ता भी हमारी और विपक्ष भी हमारा” सचमुच किसी की रणनीति है, तो उसका सबसे बड़ा दुश्मन कोई राजनीतिक दल नहीं होगा। उसका सबसे बड़ा दुश्मन वह जागा हुआ युवा होगा जो किसी का मोहरा बनने से इनकार करता है—जो सत्ता से सवाल करता है, विपक्ष से सवाल करता है और जरूरत पड़ने पर अपने सबसे पसंदीदा आंदोलनकारी से भी सवाल करता है।
और शायद भारतीय लोकतंत्र को आज सबसे ज्यादा इसी नागरिक और इसी युवा की जरूरत है—जो चेहरे देखकर फैसला न करे, नारों से प्रभावित होकर आंखें बंद न करे और हर किसी से एक ही सवाल पूछे: सच क्या है?




