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जौहर यूनिवर्सिटी पर बुलडोजर का आदेश योगी की नफरती और घटिया राजनीति: महबूबा मुफ्ती

राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/रामपुर | 26 जुलाई 2026

उत्तर प्रदेश के रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय की 40 में से 38 इमारतों को गिराने के आदेश ने अब बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और PDP अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर तीखा हमला बोलते हुए इस कार्रवाई को “नफरत और बदले” की भावना का प्रदर्शन बताया है। उन्होंने योगी आदित्यनाथ को हाल के जंतर-मंतर छात्र आंदोलन से सबक लेने की नसीहत देते हुए लोगों से जौहर विश्वविद्यालय के प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ खड़े होने की अपील की।

महबूबा मुफ्ती ने कहा कि किसी शिक्षण संस्थान को इस तरह नष्ट करने की कोशिश उनके मुताबिक नफरत और प्रतिशोध के अलावा कुछ नहीं दिखाती। उन्होंने जंतर-मंतर के हालिया घटनाक्रम का हवाला देते हुए कहा कि देश का युवा नफरत और विभाजन की राजनीति को खारिज कर रहा है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब जौहर विश्वविद्यालय के छात्र ध्वस्तीकरण आदेश के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं और अपने भविष्य को लेकर चिंता जता रहे हैं।

विवाद की जड़ रामपुर विकास प्राधिकरण का 15 जुलाई का आदेश है। RDA ने विश्वविद्यालय परिसर की 40 में से 38 इमारतों को गिराने का आदेश दिया है। प्रशासन का कहना है कि इन इमारतों का निर्माण आवश्यक नक्शा स्वीकृति के बिना किया गया। रामपुर के जिलाधिकारी के मुताबिक क्षेत्रीय जूनियर इंजीनियर की रिपोर्ट के बाद कार्रवाई शुरू हुई। दूसरी तरफ विश्वविद्यालय प्रशासन की दलील है कि जब इन इमारतों का निर्माण हुआ, तब संबंधित क्षेत्र RDA के अधिकार क्षेत्र में ही नहीं आता था। प्राधिकरण ने विश्वविद्यालय की इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

मामला इसलिए और संवेदनशील हो गया है क्योंकि जौहर विश्वविद्यालय समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान की महत्वाकांक्षी परियोजना रहा है। विश्वविद्यालय की स्थापना 2006 में उत्तर प्रदेश विधानमंडल के एक अधिनियम के जरिए हुई थी। पिछले वर्षों में संस्थान भूमि अतिक्रमण और पट्टे की शर्तों के कथित उल्लंघन सहित कई कानूनी विवादों में घिरा रहा है। इसलिए योगी सरकार और उसके विरोधियों के बीच यह लड़ाई अब केवल निर्माण की वैधता तक सीमित नहीं रही, बल्कि शिक्षा, अल्पसंख्यक अधिकार, आजम खान और कथित राजनीतिक प्रतिशोध के सवालों से भी जुड़ गई है।

सबसे बड़ा सवाल उन छात्रों का है जिनकी पढ़ाई और भविष्य इस टकराव के बीच फंस गए हैं। विश्वविद्यालय के छात्रों ने 38 इमारतों के ध्वस्तीकरण आदेश के खिलाफ अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया है। छात्रों का कहना है कि उनका भविष्य दांव पर लगा है। रिपोर्टों के मुताबिक यहां आर्थिक रूप से कमजोर तथा SC/ST पृष्ठभूमि के कुछ विद्यार्थियों को फीस में रियायत भी दी जाती है और विश्वविद्यालय में फार्मेसी सहित कई पेशेवर पाठ्यक्रम संचालित होते हैं।

इसी बिंदु को विपक्ष राजनीतिक मुद्दा बना रहा है। सवाल उठाया जा रहा है कि यदि निर्माण संबंधी नियमों का उल्लंघन हुआ है तो कानून के तहत कार्रवाई जरूर होनी चाहिए, लेकिन ऐसी कार्रवाई करते समय हजारों विद्यार्थियों की शिक्षा और भविष्य की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी? कानून अपना काम करे, मगर राजनीतिक लड़ाई का सबसे बड़ा नुकसान उन छात्रों को नहीं होना चाहिए जिनका आजम खान और योगी आदित्यनाथ के बीच राजनीतिक संघर्ष से कोई लेना-देना नहीं है।

महबूबा मुफ्ती ने इसी विवाद को जंतर-मंतर के छात्र आंदोलन से जोड़कर योगी सरकार को राजनीतिक चेतावनी देने की कोशिश की है। हाल के छात्र आंदोलनों के बाद उनका संदेश साफ है—युवाओं से जुड़े सवालों को केवल प्रशासनिक शक्ति से दबाने की कोशिश राजनीतिक रूप से उलटी भी पड़ सकती है। हालांकि यह महबूबा मुफ्ती का राजनीतिक आरोप है कि कार्रवाई “नफरत और बदले” से प्रेरित है; प्रशासन का आधिकारिक पक्ष इसे कथित अनधिकृत निर्माण के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई बताता है।

जौहर विश्वविद्यालय का मामला इसलिए अब केवल “बुलडोजर चलेगा या नहीं” का प्रश्न नहीं रह गया है। असली सवाल यह है कि कानूनी विवाद का समाधान ऐसा कैसे हो कि कानून भी लागू हो और छात्रों का भविष्य भी बर्बाद न हो। आने वाले दिनों में यह टकराव उत्तर प्रदेश की राजनीति में और तेज हो सकता है, क्योंकि विश्वविद्यालय के बाहर शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब विपक्षी दलों और राष्ट्रीय नेताओं का ध्यान खींच रहा है।

महबूबा मुफ्ती ने जंतर-मंतर का नाम लेकर योगी सरकार के सामने सीधी राजनीतिक चुनौती रख दी है—युवाओं के सवाल को हल्के में मत लीजिए; दिल्ली में छात्र आंदोलन ने सत्ता को अपना असर दिखाया है और रामपुर में भी सबसे बड़ा सवाल अब किसी नेता की राजनीति नहीं, छात्रों के भविष्य का है।

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