ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 जुलाई 2026
जंतर-मंतर पर जो हुआ, उसे केवल एक छात्र आंदोलन, NEET पेपर लीक के खिलाफ नाराजगी या धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की कहानी मानना शायद इस पूरे घटनाक्रम को बहुत छोटा करके देखना होगा। असल कहानी उस पीढ़ी की है जिसे अब तक राजनीति अक्सर युवा मतदाता, सोशल मीडिया जेनरेशन या Gen Z जैसे सुविधाजनक नामों से संबोधित करती रही, लेकिन जिसने इस बार अपने मुद्दे खुद तय किए और सत्ता से जवाब भी मांगा। पेपर लीक से शुरू हुई नाराजगी धीरे-धीरे निष्पक्ष परीक्षा, संस्थाओं की विश्वसनीयता, पुलिस कार्रवाई, सरकार की जवाबदेही और अंततः राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी के सवाल तक पहुंच गई। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इस आंदोलन का सबसे दिखाई देने वाला परिणाम जरूर है, लेकिन जंतर-मंतर से निकला सबसे बड़ा संदेश इस्तीफे से कहीं बड़ा है—नई पीढ़ी यह बताना चाहती है कि उसके लिए राजनीति का मतलब केवल चुनाव, नेता और पार्टियां नहीं हैं; राजनीति का मतलब उसका भविष्य भी है।
भारत में किसी विद्यार्थी के लिए प्रतियोगी परीक्षा महज तीन घंटे का प्रश्नपत्र नहीं होती। उसके पीछे कई वर्षों की पढ़ाई, परिवार की बचत, कोचिंग की फीस, माता-पिता की उम्मीदें और एक बेहतर जिंदगी का सपना जुड़ा होता है। ऐसे में जब पेपर लीक होता है या परीक्षा व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं, तो नुकसान केवल एक परीक्षा का नहीं होता, व्यवस्था पर भरोसे का भी होता है। यही वह बिंदु है जिसे सत्ता प्रतिष्ठान अक्सर तकनीकी या प्रशासनिक समस्या समझने की भूल करता है। नई परीक्षा करा देना, जांच बैठा देना या कुछ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई कर देना आवश्यक कदम हो सकते हैं, लेकिन वे उस विद्यार्थी के भीतर पैदा हुए सवाल का पूरा उत्तर नहीं हैं जिसने वर्षों तक यह मानकर मेहनत की कि कम से कम परीक्षा कक्ष में उसके साथ न्याय होगा। जंतर-मंतर की आवाज इसी टूटते भरोसे से निकली थी और शायद इसी कारण वह इतनी दूर तक पहुंची।
इस आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण बात इसकी राजनीतिक भाषा रही। Gen Z ने सरकार से किसी अमूर्त वैचारिक बहस पर जवाब नहीं मांगा। उसने पूछा—परीक्षा निष्पक्ष क्यों नहीं है? पेपर बार-बार कैसे लीक हो जाते हैं? जिम्मेदार कौन है? कार्रवाई कब होगी? शिक्षा व्यवस्था में सुधार कैसे होगा? ये सवाल देखने में साधारण लग सकते हैं, लेकिन राजनीति के लिए बेहद कठिन हैं, क्योंकि इनका जवाब नारों से नहीं दिया जा सकता। इन्हें आंकड़ों, नीतियों, कार्रवाई और जवाबदेही से संबोधित करना पड़ता है। यही वजह है कि जंतर-मंतर का आंदोलन एक परीक्षा विवाद से निकलकर शासन और जवाबदेही की बहस बन गया। यदि आने वाले वर्षों में युवा शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, परीक्षा व्यवस्था और सरकारी संस्थाओं की विश्वसनीयता को इसी तरह राजनीतिक मुद्दा बनाते हैं, तो देश के सभी राजनीतिक दलों को अपनी प्राथमिकताएं बदलनी पड़ेंगी।
इस पूरी कहानी में सोनम वांगचुक की मौजूदगी का अपना प्रतीकात्मक महत्व रहा। लोकप्रिय संस्कृति में 3 Idiots के ‘फुनसुख वांगडू’ को लंबे समय से वांगचुक से प्रेरित माना जाता रहा है। उस फिल्म में एक पीढ़ी ने शिक्षा व्यवस्था के दबाव, अंकों की दौड़ और सफलता की स्थापित परिभाषाओं पर सवाल उठते देखे थे। वर्षों बाद जंतर-मंतर पर वास्तविक दुनिया में शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों के बीच वांगचुक की मौजूदगी ने एक दिलचस्प चक्र पूरा किया। कभी “All is well” कहने वाली पीढ़ी के सामने आज सवाल उल्टा खड़ा है—अगर परीक्षा की निष्पक्षता पर भरोसा नहीं रहे, मेहनत और अवसर के बीच पेपर माफिया खड़ा हो जाए और न्याय पाने के लिए सड़क पर उतरना पड़े, तो आखिर ‘ऑल इज वेल’ कैसे कहा जाए?
लेकिन जंतर-मंतर की कहानी का दूसरा बड़ा अध्याय सोशल मीडिया ने लिखा। यह संभवतः भारत के उन आंदोलनों में गिना जाएगा जहां युवा केवल प्रदर्शनकारी नहीं था, बल्कि अपने आंदोलन का संवाददाता भी था। उसके हाथ में पोस्टर के साथ मोबाइल फोन भी था। घटनाओं के वीडियो, भाषण, पुलिस की कार्रवाई, प्रदर्शन स्थल की तस्वीरें और नेताओं की प्रतिक्रियाएं कुछ ही मिनटों में देशभर में पहुंच रही थीं। इसका एक बड़ा असर यह हुआ कि मुख्यधारा मीडिया अब किसी आंदोलन की कहानी का अकेला दरबान नहीं रह गया। किसी टीवी स्टूडियो में आंदोलन को जिस नजरिए से पेश किया जा रहा था, उसके समानांतर जंतर-मंतर पर खड़ा छात्र अपनी आंखों से देखी तस्वीर सीधे लाखों लोगों तक पहुंचा सकता था। इस बदलाव ने मीडिया की विश्वसनीयता को भी बहस के केंद्र में ला दिया है। आने वाले समय में पत्रकारिता के लिए यह चुनौती और कठिन होगी—जब घटनास्थल पर मौजूद हर व्यक्ति के हाथ में कैमरा है, तब दर्शक केवल यह नहीं देखेगा कि मीडिया क्या दिखा रहा है, बल्कि यह भी पूछेगा कि वह क्या नहीं दिखा रहा है।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। किसी केंद्रीय मंत्री का व्यापक छात्र आंदोलन के बीच पद छोड़ना राजनीतिक रूप से सामान्य घटना नहीं है। आंदोलनकारी इसे अपनी जीत मान रहे हैं और ऐसा मानने के उनके पास कारण भी हैं। लेकिन यहां एक सावधानी भी जरूरी है। लोकतंत्र में किसी मंत्री का इस्तीफा व्यवस्था की हार नहीं बल्कि जवाबदेही की प्रक्रिया का हिस्सा होना चाहिए। असली कसौटी यह होगी कि इस्तीफे के बाद क्या बदलता है। यदि परीक्षा कराने वाली संस्थाओं की कार्यप्रणाली वही रहती है, पेपर लीक के नेटवर्क बने रहते हैं, छात्रों को महीनों अदालतों और सड़कों पर संघर्ष करना पड़ता है और हर संकट के बाद केवल चेहरा बदल दिया जाता है, तो इस्तीफा प्रतीक बनकर रह जाएगा। लेकिन यदि इस दबाव के बाद परीक्षा प्रणाली अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और जवाबदेह बनती है, तभी इसे आंदोलन की वास्तविक सफलता कहा जा सकेगा।
इस आंदोलन को केवल भाजपा के लिए चेतावनी मानना भी अधूरा विश्लेषण होगा। संदेश विपक्ष के लिए भी उतना ही स्पष्ट है। Gen Z यदि सत्ता से सवाल पूछना सीख रही है तो यह मान लेने का कोई कारण नहीं कि वह विपक्ष से सवाल नहीं पूछेगी। आज वह सरकार से पूछ रही है कि पेपर लीक क्यों हुआ; कल वह विपक्ष से पूछ सकती है कि आपके पास शिक्षा सुधार की नीति क्या है, रोजगार पैदा करने का रास्ता क्या है और परीक्षा संस्थाओं को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखने की योजना क्या है। नई पीढ़ी को केवल सरकार-विरोधी मान लेना उतनी ही बड़ी राजनीतिक भूल होगी जितनी उसे राजनीतिक रूप से उदासीन मानना। संभव है कि यह पीढ़ी किसी स्थायी राजनीतिक खेमे की बजाय मुद्दों के आधार पर अपना समर्थन और विरोध तय करे।
यही जंतर-मंतर की सबसे दिलचस्प राजनीतिक विरासत हो सकती है। भारत की राजनीति लंबे समय से पहचान, जातीय समीकरण, धार्मिक ध्रुवीकरण, नेतृत्व के व्यक्तित्व और चुनावी गठबंधनों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। ये तत्व खत्म नहीं होने वाले, लेकिन इनके बीच यदि शिक्षा, रोजगार, परीक्षा की निष्पक्षता और संस्थागत जवाबदेही युवा राजनीति के स्थायी मुद्दे बनते हैं तो राजनीतिक विमर्श की दिशा बदल सकती है। करोड़ों युवा मतदाताओं के लिए सबसे बड़ा प्रश्न अंततः यही है कि उनकी डिग्री का मूल्य क्या है, नौकरी कहां है, परीक्षा निष्पक्ष है या नहीं और मेहनत के बाद अवसर मिलेगा या व्यवस्था के किसी छेद से उनका अधिकार कोई दूसरा ले जाएगा। जिस राजनीतिक दल के पास इन सवालों का विश्वसनीय उत्तर नहीं होगा, उसके लिए केवल भावनात्मक राजनीति के सहारे इस पीढ़ी को लंबे समय तक बांधे रखना आसान नहीं होगा।
इसलिए धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इस कहानी का पूर्णविराम नहीं है। यह शायद एक अल्पविराम है। जंतर-मंतर ने दिखाया है कि मोबाइल फोन हाथ में लिए, मीम और रील की भाषा समझने वाली पीढ़ी जरूरत पड़ने पर सड़क, संविधान, आंदोलन और जवाबदेही की भाषा भी समझती है। वह सत्ता से टकराने को ही लोकतंत्र नहीं मानती; वह सत्ता से जवाब हासिल करने को लोकतंत्र मानती है। पेपर लीक ने आंदोलन शुरू किया था, लेकिन आंदोलन ने उससे कहीं बड़ा सवाल छोड़ दिया है—क्या भारत की राजनीति उस पीढ़ी की नई प्राथमिकताओं को सुनने के लिए तैयार है, जिसके हाथ में आने वाले वर्षों में देश के चुनावों और देश के भविष्य, दोनों की दिशा तय करने की ताकत होगी?




