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छात्रों को ‘राष्ट्रविरोधी’ बता रहे प्रधान, रस्सी जल गई लेकिन अकड़ नहीं गई

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 25 जुलाई 2026

आखिरकार वही हुआ जिसकी मांग को सरकार कई दिनों तक सुनने को तैयार नहीं थी। NEET-UG पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था में सामने आई गंभीर अनियमितताओं के खिलाफ सड़कों पर उतरे छात्रों का दबाव इतना बढ़ा कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंपना पड़ा। लेकिन इस्तीफा देते हुए प्रधान ने जिस भाषा का इस्तेमाल किया, उसने जवाबदेही स्वीकार करने के बजाय एक नया और ज्यादा गंभीर सवाल खड़ा कर दिया। उन्होंने अपने पत्र में कहा कि जंतर-मंतर और देशभर में बनी परिस्थितियों का फायदा “राष्ट्रविरोधी ताकतें” न उठा सकें, देश की एकता बनी रहे और छात्रों का भविष्य कानूनी उलझनों में न फंसे, इसलिए उन्होंने इस्तीफा दिया है। सवाल सीधा है—ये “राष्ट्रविरोधी ताकतें” आखिर कौन हैं? अगर सरकार के पास किसी विदेशी साजिश, प्रतिबंधित संगठन या देशविरोधी नेटवर्क की भागीदारी के प्रमाण हैं तो उन्हें देश के सामने रखा जाना चाहिए। लेकिन यदि ऐसे कोई प्रमाण नहीं हैं, तो छात्रों के आंदोलन के संदर्भ में “राष्ट्रविरोधी” शब्द उछालना उस युवा पीढ़ी के संघर्ष पर संदेह की परछाईं डालने जैसा है जिसने केवल इतना पूछा था कि हमारा पेपर कैसे लीक हुआ, हमारी मेहनत से खिलवाड़ किसने किया और इसकी राजनीतिक जिम्मेदारी कौन लेगा? शायद इसीलिए इस पूरे घटनाक्रम पर पुरानी कहावत इतनी सटीक बैठती है—रस्सी जल गई, लेकिन अकड़ नहीं गई। कुर्सी चली गई, मगर जाते-जाते भी अपनी व्यवस्था की विफलता को पूरी तरह स्वीकार करने के बजाय सवाल पूछने वालों की तरफ उंगली उठा दी गई।

यहां सबसे बड़ा विरोधाभास स्वयं सरकार की कार्रवाइयों में छिपा है। यदि छात्रों का आक्रोश केवल भ्रम या किसी राजनीतिक षड्यंत्र का नतीजा था, तो NEET-UG परीक्षा रद्द क्यों करनी पड़ी? पुनर्परीक्षा क्यों करानी पड़ी? जांच CBI को क्यों सौंपनी पड़ी? NTA के भीतर बड़े पैमाने पर कार्रवाई की जरूरत क्यों पड़ी? परीक्षा प्रणाली में बदलाव और पेपर लीक के खिलाफ कानून को अधिक कठोर बनाने की जरूरत क्यों महसूस हुई? सरकार के ये तमाम कदम खुद स्वीकार करते हैं कि छात्रों की शिकायत हवा में नहीं थी। व्यवस्था में गंभीर समस्या थी और उस समस्या ने लाखों युवाओं के भविष्य को प्रभावित किया। ऐसे में जिन छात्रों ने उस समस्या को लेकर आवाज उठाई, उनके आंदोलन के बीच “राष्ट्रविरोधी ताकतों” की अस्पष्ट चर्चा करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। एक शिक्षा मंत्री से कम से कम इतनी संवेदनशीलता की अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि वह छात्रों की नाराजगी और किसी संभावित राष्ट्रविरोधी गतिविधि के बीच स्पष्ट रेखा खींचे। लेकिन इस्तीफे के पत्र में यह रेखा जितनी स्पष्ट होनी चाहिए थी, उतनी दिखाई नहीं देती। प्रधान ने जिम्मेदारी लेने की बात जरूर कही, लेकिन पत्र का बड़ा हिस्सा यह बताने में चला गया कि सरकार ने क्या-क्या किया, किन लोगों ने छात्रों को भ्रमित करने की कोशिश की और आखिरकार परिस्थितियों का फायदा राष्ट्रविरोधी ताकतें न उठा लें, इसलिए वह पद छोड़ रहे हैं। सवाल है—जब परीक्षा आपकी व्यवस्था में हुई, सेंध आपकी परीक्षा प्रणाली में लगी और राजनीतिक जवाबदेही आपके मंत्रालय की थी, तो इस्तीफे की कहानी का केंद्र छात्र आंदोलन या कोई अनाम “राष्ट्रविरोधी ताकत” कैसे हो सकती है?

देश को एक और बात बहुत साफ समझनी होगी—सरकार और राष्ट्र एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं। सरकारें आती-जाती हैं, लेकिन राष्ट्र और लोकतंत्र उनसे कहीं बड़े होते हैं। किसी मंत्री का विरोध करना देश का विरोध नहीं होता। प्रधानमंत्री से सवाल पूछना भारत का अपमान नहीं होता। संसद में सरकार को घेरना लोकतंत्र पर हमला नहीं होता और जंतर-मंतर पर बैठकर शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगना राष्ट्रविरोध तो बिल्कुल नहीं हो सकता। लोकतंत्र की खूबसूरती ही यह है कि यहां नागरिक को सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार है और सत्ता को उन सवालों का जवाब देना पड़ता है। अगर सरकार सही है तो वह तथ्यों के साथ अपनी बात रखे; अगर आंदोलनकारियों में किसी ने कानून तोड़ा है तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई हो; अगर हिंसा हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच हो। लेकिन लोकतांत्रिक असहमति और राष्ट्रविरोध के बीच की सीमा को धुंधला करना खतरनाक परंपरा बन सकती है। खासकर तब, जब सामने वे छात्र हों जिनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय प्रतियोगी परीक्षाओं, प्रवेश परीक्षाओं और भविष्य की चिंता में गुजर रहा है। इनमें से किसी के माता-पिता ने अपनी बचत लगाई होगी, किसी ने छोटे शहर से दिल्ली या कोटा जाकर तैयारी की होगी, किसी परिवार ने बेटे-बेटी की कोचिंग के लिए कर्ज लिया होगा। अगर ऐसे युवा परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हैं, तो सरकार का पहला दायित्व उन्हें सुनना है, उनके इरादों पर सवाल उठाना नहीं।

इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत यही रही कि यह धीरे-धीरे किसी एक चेहरे, किसी एक नेता या किसी एक संगठन की सीमा से बाहर निकल गया। सोनम वांगचुक का अनशन खत्म हुआ, लेकिन आंदोलन खत्म नहीं हुआ। सरकार के साथ बातचीत हुई, कुछ मांगों पर सहमति बनी, लेकिन धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कायम रही। अभिजीत दीपके और CJP ने साफ कर दिया कि राजनीतिक जवाबदेही के प्रश्न पर वे पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। यह घटनाक्रम सरकार के लिए भी एक महत्वपूर्ण सबक है। आज के युवा आंदोलन पुराने ढांचे में नहीं चलते, जहां किसी एक बड़े नेता को साध लेने या किसी एक संगठन से समझौता कर लेने के बाद पूरा आंदोलन घर लौट जाए। सोशल मीडिया ने नेतृत्व और जनसंचार दोनों का चरित्र बदल दिया है। अब एक वीडियो कुछ घंटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है, किसी पुलिस कार्रवाई की तस्वीर कुछ मिनटों में राष्ट्रीय मुद्दा बन सकती है और किसी छात्र की बात बिना किसी बड़े टीवी चैनल के सीधे देश के सामने पहुंच सकती है। इस आंदोलन की पीढ़ी को समझने में शायद सत्ता से सबसे बड़ी चूक यही हुई। यह वह पीढ़ी है जिसे केवल पारंपरिक राजनीतिक नारों से नियंत्रित करना आसान नहीं है। उसका पहला सवाल सीधा है—पेपर लीक हुआ या नहीं? हुआ तो जिम्मेदार कौन? और अगर व्यवस्था विफल हुई तो राजनीतिक जवाबदेही किसकी?

राहुल गांधी और विपक्ष की सक्रियता ने भी इस आंदोलन को एक अलग राजनीतिक ऊंचाई दी। यह कहना गलत होगा कि पूरा आंदोलन किसी एक विपक्षी नेता के कारण खड़ा हुआ; छात्र पहले से संघर्ष कर रहे थे और उनका अपना आक्रोश था। लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि जब नेता प्रतिपक्ष और विपक्षी सांसदों ने इसे संसद और राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुंचाया, तब सरकार पर दबाव कई गुना बढ़ गया। जिस मुद्दे को प्रशासनिक समस्या मानकर सीमित किया जा सकता था, वह राजनीतिक जवाबदेही का राष्ट्रीय प्रश्न बन गया। यही लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका भी है। यदि सरकार से सवाल पूछने वाले विपक्ष को अवसरवादी कहकर खारिज कर दिया जाए और आंदोलन करने वाले छात्रों के संदर्भ में राष्ट्रविरोधी ताकतों की बात होने लगे, तो फिर लोकतांत्रिक जवाबदेही का रास्ता बचेगा कहां? विपक्ष सरकार से सवाल नहीं पूछेगा तो कौन पूछेगा? छात्र अपने भविष्य को लेकर सड़क पर नहीं उतरेंगे तो किससे न्याय मांगेंगे? और मीडिया इन सवालों को नहीं उठाएगा तो सत्ता तक उनकी आवाज कैसे पहुंचेगी? इसलिए आंदोलन के राजनीतिक हो जाने का तर्क अपने आप में आंदोलन को अवैध नहीं बना देता। देश के लगभग हर बड़े जनआंदोलन का अंततः राजनीतिक प्रभाव होता है, क्योंकि सरकार से नीति बदलवाना या मंत्री की जवाबदेही तय कराना स्वयं राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को इसलिए केवल एक मंत्री की विदाई के रूप में देखना भी भूल होगी। यह उस लंबे टकराव का परिणाम है जिसमें शुरुआत परीक्षा की निष्पक्षता के सवाल से हुई और अंत राजनीतिक जवाबदेही तक पहुंचा। कुछ सप्ताह पहले तक जिस इस्तीफे की कल्पना भी मुश्किल लग रही थी, वही आखिरकार सरकार को स्वीकार करना पड़ा। यह किसी एक व्यक्ति की विजय नहीं है। सबसे पहले यह उन छात्रों की जीत है जिन्होंने अपनी मांग नहीं छोड़ी। उन परिवारों की जीत है जिन्होंने अपने बच्चों के साथ खड़े होकर कहा कि परीक्षा व्यवस्था में ईमानदारी कोई एहसान नहीं बल्कि उनका अधिकार है। यह उस लोकतांत्रिक दबाव की ताकत का उदाहरण भी है जिसमें सड़क, संसद, सोशल मीडिया और जनमत एक बिंदु पर आकर सरकार को फैसला लेने के लिए मजबूर कर सकते हैं। इसीलिए प्रधान के इस्तीफे के बाद सबसे ज्यादा विनम्रता सरकार की भाषा में दिखाई देनी चाहिए थी। बेहतर होता कि जाते हुए शिक्षा मंत्री छात्रों से कहते—आपके सवाल जायज थे, व्यवस्था में कमी रही और उसकी राजनीतिक जिम्मेदारी लेते हुए मैं पद छोड़ रहा हूं। ऐसा वाक्य सरकार को छोटा नहीं करता; बल्कि लोकतंत्र को बड़ा करता।

अब असली परीक्षा धर्मेंद्र प्रधान की नहीं बल्कि उस व्यवस्था की है जो उनके बाद भी कायम रहेगी। मंत्री बदलने से परीक्षा माफिया समाप्त नहीं होगा। इस्तीफा पेपर लीक की जड़ तक नहीं पहुंचाएगा। छात्रों का विश्वास किसी नए चेहरे की नियुक्ति मात्र से वापस नहीं आएगा। सरकार को बताना होगा कि पेपर लीक की पूरी श्रृंखला क्या थी, कौन-कौन इसमें शामिल था, किस स्तर पर सुरक्षा व्यवस्था विफल हुई, भविष्य में प्रश्नपत्रों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी और परीक्षा कराने वाली संस्थाओं की जवाबदेही किस प्रकार तय की जाएगी। यदि व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ तो कुछ महीनों बाद किसी दूसरी परीक्षा, दूसरे पेपर और दूसरे शहर में वही संकट फिर सामने आ सकता है। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा राजनीतिक जवाबदेही का एक पड़ाव हो सकता है, लेकिन इसे अंतिम समाधान समझना छात्रों के संघर्ष को बहुत छोटा कर देना होगा। इस आंदोलन का वास्तविक परिणाम उस दिन माना जाएगा जब किसी छात्र को परीक्षा केंद्र में बैठते समय यह भरोसा होगा कि उसके सामने रखा प्रश्नपत्र उसकी मेहनत का निष्पक्ष परीक्षण है और किसी माफिया की तिजोरी में उसकी कीमत पहले से तय नहीं हो चुकी।

और अंत में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे में इस्तेमाल शब्दों पर लौटना जरूरी है। “राष्ट्रविरोधी ताकतें” बहुत भारी शब्द हैं। इन्हें राजनीतिक सुविधा के लिए हल्के में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। यदि वास्तव में ऐसी ताकतें सक्रिय थीं तो देश को नाम, तथ्य, जांच और सबूत चाहिए। लेकिन यदि यह केवल आंदोलन के बीच पैदा हुए राजनीतिक दबाव का वर्णन करने वाली भाषा है, तो यह उस युवा पीढ़ी के साथ अन्याय होगा जिसने सरकार से केवल जवाब मांगा था। देश का युवा राष्ट्रविरोधी नहीं हो जाता क्योंकि वह सत्ता से असहमत है। वह देशद्रोही नहीं हो जाता क्योंकि वह मंत्री का इस्तीफा मांगता है। वह राष्ट्र का दुश्मन नहीं हो जाता क्योंकि वह पुलिस के सामने नारा लगाता है। बल्कि लोकतंत्र में सत्ता को जवाबदेह रखने वाला जागरूक युवा राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत हो सकता है। धर्मेंद्र प्रधान की कुर्सी चली गई, छात्रों की सबसे बड़ी मांग पूरी हो गई, लेकिन इस्तीफे की भाषा ने बता दिया कि सत्ता के भीतर आंदोलन को देखने का नजरिया अभी पूरी तरह नहीं बदला है। इसीलिए आज यह कहना गलत नहीं होगा—रस्सी जल गई, लेकिन अकड़ नहीं गई। हार कुर्सी की हुई है, मगर जाते-जाते भी सवाल पूछने वालों की तरफ उंगली उठाने की आदत नहीं गई।

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