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सवाल सिर्फ 20% एथेनॉल का नहीं, सवाल जनता की जेब और गाड़ियों का है

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 21 जुलाई 2026

सरकार ने फिलहाल साफ कर दिया है कि पेट्रोल में एथेनॉल की मिलावट 20 प्रतिशत से आगे बढ़ाने का कोई फैसला नहीं लिया गया है। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि इसे 25 या 30 प्रतिशत किया जाएगा या नहीं। असली सवाल यह है कि 20 प्रतिशत मिलावट भी आखिर क्यों?

देशभर में लाखों वाहन मालिक लगातार शिकायत कर रहे हैं कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के बाद उनकी गाड़ियों की माइलेज घट गई है। कई लोगों का कहना है कि पहले जिस दूरी के लिए जितना पेट्रोल लगता था, अब उसी दूरी के लिए कहीं अधिक ईंधन खर्च हो रहा है। वाहन मैकेनिक भी समय-समय पर ईंधन प्रणाली, रबर पार्ट्स और इंजन से जुड़ी समस्याओं की ओर इशारा करते रहे हैं। हर शिकायत हर वाहन पर लागू हो, यह कहना सही नहीं होगा, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में सामने आ रही शिकायतों को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि आम आदमी को पहले की तुलना में कम दूरी मिल रही है, तो आखिर उसका नुकसान कौन भरेगा? पेट्रोल की कीमत तो कम नहीं हुई, लेकिन यदि माइलेज घटती है तो हर किलोमीटर की लागत बढ़ जाती है। इसका सीधा असर मध्यम वर्ग, नौकरीपेशा लोगों, टैक्सी चालकों, डिलीवरी पार्टनरों और किसानों तक पर पड़ता है।

सरकार का तर्क है कि एथेनॉल मिश्रण से कच्चे तेल के आयात में कमी आती है, किसानों को लाभ मिलता है और प्रदूषण घटाने में मदद मिलती है। ये सभी उद्देश्य महत्वपूर्ण हैं और इन पर गंभीरता से काम होना चाहिए। लेकिन किसी भी नीति की सफलता का पैमाना केवल सरकारी आंकड़े नहीं होते, बल्कि यह भी होता है कि उसका असर आम नागरिक पर क्या पड़ रहा है।

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यदि लाखों उपभोक्ता महसूस कर रहे हैं कि उनकी गाड़ी पहले जैसी नहीं चल रही, माइलेज कम हो गई है या रखरखाव का खर्च बढ़ गया है, तो सरकार का दायित्व बनता है कि वह इन शिकायतों की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच कराए। यदि जांच में पता चलता है कि कुछ वाहन मॉडलों पर एथेनॉल मिश्रण का असर पड़ता है, तो उसके समाधान भी सामने आने चाहिए।

देश को ऊर्जा सुरक्षा चाहिए, किसानों की आय भी बढ़नी चाहिए और पर्यावरण की रक्षा भी जरूरी है। लेकिन इन लक्ष्यों की कीमत आम नागरिक की जेब से नहीं वसूली जानी चाहिए।

नीतियां जनता के लिए बनती हैं, जनता पर थोपने के लिए नहीं। यदि किसी नीति के कारण लोगों को वास्तविक आर्थिक नुकसान हो रहा है, तो सरकार का पहला दायित्व है कि वह उनकी बात सुने, तथ्यों की जांच करे और आवश्यक सुधार करे।

इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल यही है—जब लाखों वाहन मालिक कम माइलेज, बढ़ते खर्च और गाड़ियों में आ रही समस्याओं की शिकायत कर रहे हैं, तो सरकार उनकी आवाज़ पर खुलकर जवाब क्यों नहीं दे रही? जनता को नारों से नहीं, भरोसेमंद आंकड़ों, पारदर्शी जांच और व्यावहारिक समाधान की ज़रूरत है।

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