अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | इस्लामाबाद/बीजिंग | 16 जुलाई 2026
पाकिस्तान के अशांत प्रांत बलूचिस्तान को लेकर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। सोशल मीडिया पर वायरल एक कथित पत्र में “रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान” के नाम से पाकिस्तान से आजादी की घोषणा और क्षेत्र के बड़े हिस्से पर नियंत्रण का दावा किया गया है। हालांकि, इन दावों की अभी तक किसी स्वतंत्र स्रोत से पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस घटनाक्रम ने पाकिस्तान के साथ-साथ चीन की भी चिंता बढ़ा दी है।
दरअसल, बलूचिस्तान चीन की महत्वाकांक्षी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है। चीन ने इस क्षेत्र में बंदरगाह, सड़क, रेलवे, ऊर्जा और खनन परियोजनाओं में 65 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया है। ऐसे में यदि बलूचिस्तान में अस्थिरता बढ़ती है तो चीन की कई रणनीतिक परियोजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
बलूचिस्तान पाकिस्तान का क्षेत्रफल के हिसाब से सबसे बड़ा प्रांत है, जो देश के लगभग 44 प्रतिशत भूभाग में फैला हुआ है। प्राकृतिक गैस, तांबा, सोना, कोयला और अन्य बहुमूल्य खनिजों से समृद्ध यह इलाका अरब सागर के किनारे स्थित होने के कारण सामरिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। लंबे समय से यहां सक्रिय बलूच राष्ट्रवादी संगठन आरोप लगाते रहे हैं कि पाकिस्तान की केंद्र सरकार प्राकृतिक संसाधनों का दोहन तो करती है, लेकिन स्थानीय लोगों के विकास और अधिकारों की अनदेखी करती है। यही असंतोष वर्षों से अलगाववादी आंदोलन का प्रमुख कारण बना हुआ है।
चीन के लिए बलूचिस्तान का सबसे बड़ा आकर्षण ग्वादर बंदरगाह है। अरब सागर पर स्थित यह गहरे पानी का बंदरगाह चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) और CPEC का सबसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट माना जाता है। चीन की योजना ग्वादर को मध्य-पूर्व, अफ्रीका और यूरोप के लिए एक बड़े व्यापारिक और लॉजिस्टिक केंद्र के रूप में विकसित करने की है। इसके अलावा चीन ने ईस्टबे एक्सप्रेसवे, नई सड़कें, ऊर्जा परियोजनाएं और नए ग्वादर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के निर्माण में भी भारी निवेश किया है।
बंदरगाह के अलावा चीन की नजर बलूचिस्तान के विशाल खनिज भंडार पर भी है। चागई जिले का सैंदक कॉपर-गोल्ड प्रोजेक्ट लंबे समय से चीनी कंपनी मेटलर्जिकल कॉरपोरेशन ऑफ चाइना (MCC) संचालित कर रही है। इसके अलावा कई अन्य खनन परियोजनाओं में भी चीनी कंपनियां निवेश बढ़ाने की तैयारी में हैं, क्योंकि स्वच्छ ऊर्जा और आधुनिक उद्योगों के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण खनिजों की वैश्विक मांग लगातार बढ़ रही है।
हालांकि, चीन की इन परियोजनाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती सुरक्षा बनी हुई है। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) समेत कई अलगाववादी संगठन चीनी परियोजनाओं का लगातार विरोध करते रहे हैं। उनका आरोप है कि चीन, पाकिस्तान सरकार के साथ मिलकर क्षेत्र के संसाधनों का दोहन कर रहा है, जबकि स्थानीय लोगों को इसका लाभ नहीं मिल रहा। इसी वजह से बीते वर्षों में चीनी नागरिकों, इंजीनियरों और CPEC परियोजनाओं पर कई हमले हो चुके हैं। इन खतरों को देखते हुए पाकिस्तान ने हजारों विशेष सुरक्षा कर्मियों को चीनी परियोजनाओं की सुरक्षा में तैनात किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में बलूचिस्तान में अलगाववादी आंदोलन और मजबूत होता है या किसी तरह का प्रशासनिक बदलाव होता है, तो चीन की परियोजनाओं को लेकर नए सिरे से समझौते, खनन अनुबंधों की समीक्षा और प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण की मांग उठ सकती है। हालांकि, फिलहाल बलूचिस्तान की स्वतंत्रता की घोषणा संबंधी दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और पाकिस्तान सरकार ने भी इस संबंध में कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।
इतना स्पष्ट है कि बलूचिस्तान केवल पाकिस्तान का आंतरिक मुद्दा नहीं रह गया है। यह दक्षिण एशिया की भू-राजनीति, चीन की वैश्विक रणनीति और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विषय बन चुका है, जिस पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।




