अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | इस्लामाबाद | 16 जुलाई 2026
पाकिस्तान इस समय दो अलग-अलग मोर्चों पर गहराते संकट का सामना कर रहा है। एक ओर बलूचिस्तान में अलगाववादी गतिविधियां और स्वतंत्रता के दावे सुर्खियों में हैं, तो दूसरी ओर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में महंगाई, बिजली संकट और प्रशासनिक नीतियों के खिलाफ व्यापक जन आंदोलन जारी है। इन घटनाक्रमों ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ फील्ड मार्शल सैयद आसिम मुनीर के नेतृत्व और सैन्य प्रतिष्ठान की क्षमता पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
आसिम मुनीर ने नवंबर 2022 में सेना प्रमुख का पद संभाला था। मई 2025 में उन्हें फील्ड मार्शल बनाया गया और बाद में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का अतिरिक्त दायित्व भी सौंपा गया। इससे पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था में उनकी भूमिका और प्रभाव पहले से अधिक मजबूत हुआ। लेकिन अब सीमावर्ती क्षेत्रों में बढ़ती अस्थिरता उनके नेतृत्व के सामने बड़ी चुनौती बनती दिखाई दे रही है।
हाल ही में सोशल मीडिया पर “रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान” के नाम से एक कथित बयान वायरल हुआ, जिसमें स्वतंत्रता की घोषणा, समानांतर प्रशासन के गठन और प्रदेश के बड़े हिस्से पर नियंत्रण का दावा किया गया। हालांकि इन दावों की किसी स्वतंत्र स्रोत से पुष्टि नहीं हुई है और पाकिस्तानी सुरक्षा बल अब भी प्रमुख शहरों, सैन्य ठिकानों और सरकारी प्रतिष्ठानों पर नियंत्रण बनाए हुए हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि भले ही इन दावों की पुष्टि नहीं हुई हो, लेकिन यह घटनाक्रम बलूचिस्तान में अलगाववादी नैरेटिव और सूचना युद्ध के तेज होने का संकेत देता है। यही वह क्षेत्र है जहां चीन की महत्वाकांक्षी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) परियोजना और रणनीतिक महत्व वाला ग्वादर बंदरगाह स्थित है। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) समेत कई उग्रवादी संगठन पहले भी पाकिस्तानी सुरक्षा बलों, चीनी नागरिकों और CPEC परियोजनाओं को निशाना बनाते रहे हैं। ऐसे में क्षेत्र में लगातार बनी अस्थिरता पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और चीन के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी दोनों के लिए चिंता का विषय बन सकती है।
उधर, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में तस्वीर अलग है। यहां हथियारबंद संघर्ष नहीं, बल्कि जनता का व्यापक विरोध देखने को मिल रहा है। स्थानीय लोग महंगाई, बिजली संकट, टैक्स, संसाधनों में हिस्सेदारी और विकास की कमी को लेकर लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। समय के साथ यह आंदोलन केवल आर्थिक मुद्दों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इस्लामाबाद की नीतियों और प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ भी खुला जन असंतोष बन चुका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बलूचिस्तान और पीओके की चुनौतियां अलग-अलग प्रकृति की हैं। बलूचिस्तान में सुरक्षा और अलगाववाद सबसे बड़ी चिंता है, जबकि पीओके में राजनीतिक और आर्थिक असंतोष को संभालना सरकार के लिए बड़ी परीक्षा बन गया है। यदि इन दोनों मोर्चों पर केवल बल प्रयोग की रणनीति अपनाई जाती है, तो हालात और जटिल हो सकते हैं।
हालांकि, उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि आसिम मुनीर की पकड़ कमजोर हो गई है। पाकिस्तान की सेना अब भी देश की सबसे प्रभावशाली संस्था मानी जाती है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि बलूचिस्तान में जारी सुरक्षा संकट और पीओके में उभरता जनाक्रोश सैन्य नेतृत्व पर दबाव बढ़ा रहे हैं। आने वाले दिनों में इन दोनों मोर्चों पर पाकिस्तान सरकार और सेना की रणनीति ही तय करेगी कि देश की आंतरिक स्थिरता बरकरार रहती है या यह संकट और गहराता है।
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