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सुप्रीम कोर्ट में हंगामा, याचिकाकर्ता ने CJI को दी गालियां; कहा- ‘जुडिशियल सर्वेंट’

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 11 जुलाई 2026

सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को एक असामान्य और अभूतपूर्व घटना देखने को मिली, जब एक याचिकाकर्ता ने सुनवाई के दौरान न केवल अदालत की कार्यवाही बाधित की, बल्कि मुख्य न्यायाधीश (CJI) के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया, अदालत में कागज उछाल दिए और न्यायाधीशों को बार-बार “जुडिशियल सर्वेंट” कहकर संबोधित किया। मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई का था, जिस पर न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन और आलोक अराधे की पीठ सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता प्रभाल प्रताप ने खुद को “सॉवरेन” बताते हुए अदालत को निर्देश देने की कोशिश की कि लखनऊ के एक एसीपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया जाए।

कागज फेंके, CJI पर अभद्र टिप्पणी; फिर भी अदालत ने नहीं की कार्रवाई

सुनवाई के दौरान जब न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने पूछा, “क्या आप हमें आदेश दे रहे हैं?”, तब याचिकाकर्ता ने और अधिक आक्रामक रवैया अपनाते हुए अदालत में कागज उछाल दिए और कथित तौर पर मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की। अदालत के कर्मचारियों ने उन्हें कोर्टरूम से बाहर ले जाया। इसके बावजूद पीठ ने उनके खिलाफ अवमानना या किसी अन्य दंडात्मक कार्रवाई की शुरुआत नहीं की। अपने आदेश में अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता की स्थिति को देखते हुए उसके खिलाफ कोई कार्रवाई न करने का निर्णय जानबूझकर लिया गया है। इसके बाद पीठ ने मामले के गुण-दोष पर विचार किया और इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज कर दी।

‘जुडिशियल सर्वेंट’ शब्द पर चर्चा, वकीलों ने सराहा अदालत का संयम

घटना का वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर “जुडिशियल सर्वेंट” शब्द और अदालत की प्रतिक्रिया दोनों चर्चा का विषय बन गए। कई कानूनी विशेषज्ञों ने न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन के संयम और धैर्य की सराहना की। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता डॉ. अलख आलोक श्रीवास्तव ने कहा कि न्यायपालिका में लंबित मामलों को लेकर लोगों की नाराजगी समझी जा सकती है, लेकिन देश की सर्वोच्च अदालत के भीतर इस तरह का व्यवहार किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायिक देरी के लिए केवल अदालतों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि केंद्र और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे अधिक न्यायाधीश नियुक्त करें, न्यायिक ढांचा मजबूत करें और समयबद्ध न्याय सुनिश्चित करें।

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