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इथेनॉल की दौड़: भारत ऊर्जा सुरक्षा की ओर बढ़ रहा है… या आम आदमी की जेब, गाड़ी, पानी और खेती को दांव पर लगा रहा है?

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 30 जून 2026

भारत ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने का सपना देख रहा है। सरकार का कहना है कि पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से कच्चे तेल का आयात घटेगा, विदेशी मुद्रा बचेगी, किसानों की आय बढ़ेगी और प्रदूषण कम होगा। कागज़ों पर यह नीति आकर्षक दिखाई देती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ज़मीन पर भी तस्वीर इतनी ही चमकदार है, या इसके पीछे ऐसे खतरे छिपे हैं जिनकी कीमत आने वाले वर्षों में आम आदमी को चुकानी पड़ेगी?

सरकार लगातार इथेनॉल मिश्रण का प्रतिशत बढ़ा रही है। इसे भारत की ऊर्जा क्रांति बताया जा रहा है। लेकिन जिस आम आदमी से इस नीति का समर्थन मांगा जा रहा है, वही पूछ रहा है—अगर इथेनॉल इतना लाभदायक है, तो पेट्रोल अब भी महंगा क्यों है? दूसरी सबसे बड़ी बात ये है कि इथेनॉल मिला तेल जनता के लिए बर्बादी का कारण बन रहा है। आज सबसे बड़ी चिंता देश के करोड़ों वाहन मालिकों की यही है। अलग-अलग राज्यों से लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से वाहनों का माइलेज कम हो रहा है, इंजन की क्षमता प्रभावित हो रही है, गाड़ियां चलते-चलते बंद हो रही हैं और मरम्मत का खर्च बढ़ रहा है। कई ऑटोमोबाइल विशेषज्ञ भी कहते हैं कि पुराने मॉडल इथेनॉल मिश्रण के लिए उपयुक्त नहीं हैं। यदि ऐसा है, तो करोड़ों लोगों ने जिन गाड़ियों पर अपनी जीवनभर की कमाई खर्च की है, उनका अतिरिक्त खर्च कौन उठाएगा? क्या सरकार या तेल कंपनियां इसकी कोई जिम्मेदारी लेंगी?

मामला केवल गाड़ियों तक सीमित नहीं है। इथेनॉल बनाने के लिए बड़े पैमाने पर गन्ना, मक्का और दूसरी कृषि उपज की आवश्यकता होती है। इन फसलों की खेती में भारी मात्रा में पानी लगता है। ऐसे समय में जब देश के कई हिस्से हर साल जल संकट का सामना कर रहे हैं, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ईंधन के लिए खेती, पीने के पानी और खाद्य सुरक्षा पर अतिरिक्त दबाव डालेगी? यदि खेतों में अनाज की जगह ईंधन वाली फसलें बढ़ने लगीं, तो इसका असर खाद्यान्न उत्पादन और महंगाई पर भी पड़ सकता है।

सरकार का तर्क है कि इथेनॉल किसानों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत बनेगा। यह बात कुछ हद तक सही भी हो सकती है। लेकिन क्या इसका लाभ सभी किसानों तक पहुंचेगा, या केवल उन क्षेत्रों तक सीमित रहेगा जहां गन्ना और मक्का जैसी फसलें बड़े पैमाने पर उगाई जाती हैं? देश के छोटे और सीमांत किसानों के सामने आज भी लागत, सिंचाई, न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाजार जैसी समस्याएं पहले की तरह मौजूद हैं। इसलिए केवल इथेनॉल को किसानों की आय दोगुनी करने का समाधान बताना पर्याप्त नहीं होगा।

इस पूरी नीति पर राजनीतिक सवाल भी उठ रहे हैं। विपक्ष ने केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से जुड़े हितों के टकराव का मुद्दा उठाया है। विपक्ष का दावा है कि CIAN Agro, जिसके प्रबंधन से नितिन गडकरी के पुत्र निखिल गडकरी जुड़े रहे हैं, उसके कारोबार और राजस्व में इथेनॉल नीति के दौरान तेज़ वृद्धि हुई। इन आरोपों पर राजनीतिक बहस जारी है। ऐसे मामलों में लोकतांत्रिक व्यवस्था की मांग यही है कि यदि हितों के टकराव के आरोप लगते हैं, तो पारदर्शी जवाब और निष्पक्ष जांच से जनता का भरोसा मजबूत किया जाए।

भारत को ऊर्जा सुरक्षा की आवश्यकता है, इसमें दो राय नहीं हो सकती। तेल आयात पर निर्भरता कम करना भी राष्ट्रीय हित का विषय है। लेकिन किसी भी नीति की सफलता केवल सरकारी घोषणाओं से नहीं मापी जाती। उसकी असली परीक्षा यह होती है कि क्या उससे आम नागरिक का जीवन आसान हुआ? क्या उसका खर्च कम हुआ? क्या उसकी गाड़ी बेहतर चली? क्या किसान वास्तव में समृद्ध हुआ? और क्या पानी तथा खाद्य सुरक्षा पर कोई नया संकट नहीं आया?

यदि जनता को सस्ता ईंधन नहीं मिलता, गाड़ियों की मरम्मत का खर्च बढ़ता है, पानी पर दबाव बढ़ता है और खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होने की आशंका पैदा होती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। किसी भी लोकतंत्र में जनता सवाल पूछती है और सरकार का दायित्व है कि वह तथ्यों और पारदर्शिता के साथ जवाब दे।

ऊर्जा सुरक्षा भारत की ज़रूरत है, लेकिन उसका रास्ता ऐसा होना चाहिए जिसमें पर्यावरण भी सुरक्षित रहे, किसानों का हित भी सधे, पानी भी बचे और आम आदमी की जेब पर अतिरिक्त बोझ भी न पड़े। विकास तभी सफल माना जाएगा जब उसका लाभ सरकार के दावों से आगे बढ़कर जनता के जीवन में भी दिखाई दे। इथेनॉल नीति भी इसी कसौटी पर परखी जाएगी। फिलहाल यह नीति पूरी तरह अनफिट साबित हो रही है।

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