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SIR पर उठे गंभीर सवाल: वोटर लिस्ट से नाम कटा, पासपोर्ट नहीं हुआ रिन्यू, बेटी की शादी में भी नहीं जा सके पूर्व संपादक आर. राजगोपाल

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 28 जून 2026

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर देश में नई बहस छिड़ गई है। द टेलीग्राफ के पूर्व संपादक आर. राजगोपाल का मामला अब इस विवाद का सबसे चर्चित उदाहरण बनकर सामने आया है। राजगोपाल का दावा है कि SIR के दौरान उनका नाम कोलकाता के बालीगंज विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची से हटा दिया गया। इसके बाद उनके पासपोर्ट के नवीनीकरण की प्रक्रिया भी कथित रूप से अटक गई। परिणाम यह हुआ कि दस वर्ष का वैध अमेरिकी वीज़ा होने के बावजूद वे अमेरिका नहीं जा सके और 17 अप्रैल को कैलिफ़ोर्निया में हुई अपनी बेटी की शादी में भी शामिल नहीं हो पाए।

राजगोपाल के अनुसार, मार्च 2026 में SIR के दौरान अधिकारियों को न तो उनका और न ही उनके दिवंगत पिता का नाम वर्ष 2002 की मतदाता सूची में मिला। इसी आधार पर उनका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया। उन्होंने कहा कि उनके पिता गांधीवादी विचारक, सेवानिवृत्त प्रोफेसर और केरल गांधी स्मारक निधि के पूर्व राज्य सचिव थे। उनका सवाल है कि इतने वर्षों तक मतदाता रहे परिवार का रिकॉर्ड अचानक कैसे गायब हो गया।

राजगोपाल का दावा है कि उन्होंने मतदाता सूची में नाम बहाल कराने के लिए मैट्रिकुलेशन प्रमाणपत्र सहित कई दस्तावेज जमा किए, लेकिन उन्हें कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया। उनका मामला फिलहाल संबंधित न्यायिक प्रक्रिया के तहत लंबित बताया जा रहा है। इसी वजह से वे हालिया चुनाव में मतदान भी नहीं कर सके।

विवाद तब और गहरा गया जब उनके पासपोर्ट के नवीनीकरण में भी बाधा आने का दावा सामने आया। राजगोपाल के अनुसार, उन्होंने 19 मार्च 2026 को पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए बायोमेट्रिक प्रक्रिया पूरी कर ली थी। बाद में उन्हें बताया गया कि पुलिस सत्यापन में प्रतिकूल (Adverse) रिपोर्ट भेजी गई है। उनका दावा है कि इसका कारण मतदाता सूची से उनका नाम हटना बताया गया। हालांकि, इस संबंध में संबंधित सरकारी एजेंसियों की विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।

यदि यह दावा सही साबित होता है, तो यह केवल एक व्यक्ति की प्रशासनिक परेशानी नहीं बल्कि चुनावी प्रक्रिया, नागरिक अधिकारों और सरकारी व्यवस्थाओं के बीच संबंधों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या मतदाता सूची में नाम न होना पासपोर्ट नवीनीकरण रोकने का वैध आधार हो सकता है? वर्तमान कानूनी व्यवस्था के अनुसार पासपोर्ट अधिनियम, 1967 और पासपोर्ट नियम, 1980 में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जो पासपोर्ट के नवीनीकरण के लिए मतदाता सूची में नाम होना अनिवार्य बनाता हो। सामान्यतः पुलिस सत्यापन का उद्देश्य आवेदक के निवास, पहचान और आपराधिक पृष्ठभूमि की पुष्टि करना होता है।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि SIR केवल मतदाता सूची को अद्यतन करने की प्रक्रिया है। आयोग ने अदालत को भरोसा दिलाया था कि यह प्रक्रिया “लिबरल, सॉफ्ट-टच” होगी, इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करना नहीं है और न ही यह किसी प्रकार का छिपा हुआ NRC है। आयोग ने यह भी कहा था कि मतदाता सूची से नाम हटने का अन्य नागरिक अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

लेकिन अब सामने आए इस मामले ने विपक्ष और कई संवैधानिक विशेषज्ञों की पुरानी आशंकाओं को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। कांग्रेस सहित कई विपक्षी दल पहले से कहते रहे हैं कि यदि मतदाता सूची से नाम हटने के बाद अन्य सरकारी सेवाओं और अधिकारों पर भी असर पड़ने लगे, तो SIR केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहेगा। सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी, वृंदा ग्रोवर और प्रशांत भूषण ने भी ऐसी आशंकाएँ व्यक्त की थीं कि पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं होने पर नागरिकों को गंभीर प्रशासनिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

राजगोपाल ने अपनी आपबीती साझा करते हुए यह भी कहा है कि अब उनका अधिकांश समय दशकों पुराने दस्तावेज़ जुटाने में बीत रहा है। वे अपनी मां के पुराने कॉलेज, अपने स्कूल और अपने पिता के सामाजिक जीवन से जुड़े रिकॉर्ड इकट्ठा कर रहे हैं, ताकि अपने परिवार की पहचान और रिकॉर्ड को साबित कर सकें। उनका कहना है कि यदि एक राष्ट्रीय अखबार का पूर्व संपादक अपनी पहचान साबित करने के लिए इस तरह संघर्ष कर रहा है, तो समाज के गरीब, ग्रामीण और हाशिए पर रहने वाले लोगों की स्थिति कितनी कठिन होगी, इसकी कल्पना की जा सकती है।

इसी बीच विदेश मंत्रालय यह स्पष्ट कर चुका है कि पासपोर्ट भारतीय नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं, बल्कि एक यात्रा दस्तावेज़ (Travel Document) है। वहीं सरकार पहले भी संसद में कह चुकी है कि आधार, पैन, मतदाता पहचान पत्र, जन्म प्रमाणपत्र या पासपोर्ट—इनमें से कोई भी अकेले भारतीय नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं माना जाता। नागरिकता का निर्धारण संबंधित कानूनों के अनुसार होता है।

ऐसे में यह मामला केवल एक पूर्व संपादक की व्यक्तिगत परेशानी नहीं रह गया है। इसने यह बहस तेज कर दी है कि मतदाता सूची, नागरिकता और पासपोर्ट जैसी अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाओं के बीच वास्तविक संबंध क्या है। यदि SIR वास्तव में केवल मतदाता सूची को अद्यतन करने की प्रक्रिया है, तो यह सुनिश्चित होना चाहिए कि उसका प्रभाव अन्य प्रशासनिक सेवाओं और नागरिक अधिकारों पर न पड़े। वहीं यदि किसी स्तर पर ऐसी स्थिति उत्पन्न हो रही है, तो सरकार, चुनाव आयोग, गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय की ओर से स्पष्ट, पारदर्शी और आधिकारिक स्पष्टीकरण सार्वजनिक विश्वास बनाए रखने के लिए आवश्यक होगा।

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