ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 जून 2026
भारतीय राजनीति में चुनाव केवल दलों के बीच नहीं, बल्कि सामाजिक गठबंधनों के बीच भी लड़े जाते हैं। पिछले एक दशक में बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अलग-अलग जातीय और सामाजिक समूहों को साथ जोड़कर एक व्यापक राजनीतिक आधार तैयार किया। इसी सामाजिक विस्तार को बीजेपी की सबसे बड़ी चुनावी ताकत माना जाता रहा है। लेकिन हाल के दिनों में सामने आए कुछ विवादों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या इस सामाजिक गठबंधन के भीतर पहली बार दरारें दिखाई देने लगी हैं, या यह केवल सोशल मीडिया तक सीमित राजनीतिक शोर है।
अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जुड़े वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव और उनके परिवार से जुड़े भूमि खरीद विवाद तथा बिहार के चर्चित भरत तिवारी एनकाउंटर जैसे मामलों ने बीजेपी समर्थक वर्ग के भीतर भी अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया है। सोशल मीडिया पर कई समर्थक सरकार के पक्ष में मजबूती से खड़े दिखाई दिए, वहीं कई पुराने समर्थकों ने इन मामलों में जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग भी की।
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का दावा है कि मोहन यादव विवाद में सामाजिक आधार के भीतर मतभेद खुलकर सामने आए। वहीं भरत तिवारी एनकाउंटर को लेकर भी बीजेपी समर्थकों के बीच एक जैसी राय नहीं दिखी। राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े आरोपों के बाद भी पहली बार बड़ी संख्या में ऐसे समर्थक दिखाई दिए जिन्होंने मंदिर आंदोलन का समर्थन जारी रखते हुए भी ट्रस्ट और व्यवस्था से जवाब मांगा।
हालांकि इन प्रतिक्रियाओं को पूरे सामाजिक वर्गों की राय मान लेना उचित नहीं होगा। किसी भी राजनीतिक दल के समर्थक एकरूप नहीं होते और सोशल मीडिया की बहसें हमेशा जमीनी वास्तविकता का पूरा प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। जातीय, क्षेत्रीय और स्थानीय परिस्थितियां भी राजनीतिक प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करती हैं।
फिर भी राजनीति का एक स्थापित सिद्धांत है कि किसी भी दल के लिए सबसे गंभीर चुनौती तब पैदा होती है जब सवाल विपक्ष नहीं, बल्कि उसके अपने समर्थकों की ओर से उठने लगें। यदि समर्थक भी जवाबदेही, पारदर्शिता और नैतिक आचरण की मांग करने लगें, तो यह लोकतांत्रिक राजनीति का स्वाभाविक और महत्वपूर्ण चरण माना जाता है।
बीजेपी का सामाजिक गठबंधन पिछले कई चुनावों में उसकी सबसे बड़ी ताकत रहा है। इसलिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि हाल के विवाद केवल कुछ दिनों की राजनीतिक बहस बनकर रह जाते हैं या आने वाले समय में सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों पर स्थायी प्रभाव छोड़ते हैं।
फिलहाल इतना कहना जल्दबाज़ी होगी कि बीजेपी का सामाजिक गठबंधन टूट रहा है। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि कुछ मुद्दों पर समर्थक वर्ग के भीतर पहले की तुलना में अधिक खुली बहस और असहमति दिखाई दे रही है। क्या यह अस्थायी असंतोष है या किसी बड़े राजनीतिक परिवर्तन की शुरुआत—इसका उत्तर आने वाले चुनाव और जनता का जनादेश ही देंगे।




