राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 जून 2026
वेनेजुएला में महज 30 सेकंड के भीतर आए 7.1 और 7.5 तीव्रता के दो शक्तिशाली भूकंपों ने भारी तबाही मचा दी। ताजा रिपोर्टों के अनुसार इस प्राकृतिक आपदा में 164 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 971 से अधिक लोग घायल बताए जा रहे हैं। कई इमारतें जमींदोज हो गईं, सड़कें क्षतिग्रस्त हो गईं और हजारों लोग बेघर हो गए। इस त्रासदी ने एक बार फिर पूरी दुनिया को याद दिलाया है कि प्रकृति के सामने आधुनिक तकनीक भी कई बार बेबस नजर आती है।
लेकिन इस त्रासदी के बीच सबसे बड़ा सवाल भारत को लेकर उठता है। क्या भारत भी ऐसे किसी बड़े भूकंप के लिए तैयार है? विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का लगभग 59 प्रतिशत भू-भाग भूकंपीय जोखिम वाले क्षेत्रों में आता है। यही कारण है कि देश के कई हिस्सों में 7 या उससे अधिक तीव्रता का भूकंप आने की आशंका को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने देश को भूकंपीय खतरे के आधार पर चार जोन में विभाजित किया है। जोन-V सबसे अधिक जोखिम वाला क्षेत्र है, जिसमें उत्तर-पूर्व के राज्य, जम्मू-कश्मीर के हिस्से, हिमालयी क्षेत्र, कच्छ तथा अंडमान-निकोबार द्वीप समूह शामिल हैं। जोन-IV में दिल्ली, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, बिहार और हरियाणा के कई इलाके आते हैं। जोन-III में महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल के बड़े हिस्से हैं, जबकि जोन-II अपेक्षाकृत कम जोखिम वाला क्षेत्र माना जाता है।
भारत पहले भी विनाशकारी भूकंपों का दर्द झेल चुका है। 1905 के कांगड़ा भूकंप की तीव्रता 8.0 थी, जिसमें लगभग 19,800 लोगों की जान गई। वहीं 2001 के भुज भूकंप की तीव्रता 7.9 रही और इस आपदा में करीब 12,932 लोगों की मौत हुई थी। इन दोनों घटनाओं ने दिखाया कि बड़े भूकंप केवल इमारतें नहीं गिराते, बल्कि पूरे सामाजिक और आर्थिक ढांचे को झकझोर देते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने भूकंप से निपटने की तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में कई कदम उठाए हैं। वर्ष 2014 तक देश में केवल 80 भूकंप निगरानी केंद्र (Seismic Observatories) थे, जिनकी संख्या बढ़कर 2025 तक 168 हो चुकी है। उत्तराखंड में Earthquake Early Warning System पहले से संचालित है और पूरे देश में इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने की तैयारी चल रही है। इस प्रणाली से मिलने वाली जानकारी ‘भूदेव (BhuDEV)’ ऐप के माध्यम से लोगों तक पहुंचाई जाती है।
आपदा प्रबंधन को मजबूत करने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने मार्च 2026 में ‘आपदा का सामना’ नाम से जन-जागरूकता अभियान शुरू किया। इसके अलावा राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (NCS) लगातार भूकंपीय गतिविधियों की निगरानी करता है, जबकि राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) देशभर में राहत एवं बचाव अभियानों के लिए प्रशिक्षित 16 बटालियनों के साथ तैनात है। राज्य स्तर पर SDMA और प्रशिक्षण एवं अनुसंधान के लिए NIDM भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सरकारी एजेंसियों की तैयारी पर्याप्त नहीं है। भूकंप के समय सबसे महत्वपूर्ण भूमिका आम नागरिकों की जागरूकता निभाती है। भूकंपरोधी भवन निर्माण, आपदा अभ्यास (Mock Drill), आपातकालीन किट, सुरक्षित निकासी मार्ग और समय पर सही जानकारी हजारों जानें बचा सकती है। इसी उद्देश्य से सरकार ने भवन निर्माण के लिए विशेष दिशानिर्देश और बहुमंजिला इमारतों के लिए सुरक्षा मानक भी जारी किए हैं।
वेनेजुएला की त्रासदी केवल एक अंतरराष्ट्रीय खबर नहीं, बल्कि भारत जैसे भूकंप-संवेदनशील देश के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है। यह याद दिलाती है कि भूकंप कब आएगा, इसका पूर्वानुमान आज भी संभव नहीं है, लेकिन उससे होने वाले नुकसान को तैयारी, वैज्ञानिक योजना और जन-जागरूकता के जरिए काफी हद तक कम किया जा सकता है।
प्राकृतिक आपदाएं सीमाएं नहीं देखतीं। इसलिए सवाल यह नहीं कि अगला बड़ा भूकंप कब आएगा, बल्कि यह है कि जब वह आएगा, तब क्या भारत वास्तव में उसके लिए तैयार होगा?




