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पासपोर्ट भी नहीं, आधार भी नहीं, वोटर आईडी भी नहीं, राशन कार्ड भी नहीं, पैन कार्ड भी नहीं… फिर आखिर ‘भारतीय नागरिक’ कौन?

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | 26 जून 2026

भारत में नागरिकता को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं, बल्कि यात्रा और पहचान का दस्तावेज़ है। इससे पहले चुनाव आयोग विभिन्न प्रक्रियाओं में आधार कार्ड, वोटर आईडी और राशन कार्ड जैसे दस्तावेज़ों की सीमाओं पर भी अपना पक्ष रख चुका है। कानूनी दृष्टि से यह बात सही है कि भारतीय कानून में नागरिकता का निर्धारण केवल किसी एक दस्तावेज़ से नहीं होता, बल्कि परिस्थितियों और लागू कानूनों के आधार पर किया जाता है। लेकिन राजनीति में सवाल अब कानून से आगे बढ़कर भरोसे का बन गया है।

यही कारण है कि विपक्ष और कई राजनीतिक टिप्पणीकार सरकार से पूछ रहे हैं कि यदि पासपोर्ट भी नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है, आधार भी नहीं है, वोटर आईडी भी नहीं है, राशन कार्ड और पैन कार्ड भी नहीं है.. तो आखिर एक आम भारतीय किस दस्तावेज़ के भरोसे खुद को नागरिक माने? यह सवाल केवल तकनीकी नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की मानसिक चिंता का विषय बन चुका है।

राजनीतिक टिप्पणीकार प्रशांत टंडन ने इसी बहस के बीच व्यंग्य करते हुए सवाल उठाया कि अगर पासपोर्ट भी नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है, तो उस व्यक्ति की नागरिकता किस आधार पर तय होगी जिसने तीन बार भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली? उनका यह सवाल कानूनी नहीं, बल्कि सरकारी तर्कों पर राजनीतिक कटाक्ष है। उनके अनुसार, यदि नागरिकता की पुष्टि के लिए लगातार अलग-अलग दस्तावेज़ों को अपर्याप्त बताया जाएगा, तो आम नागरिक के मन में असमंजस पैदा होना स्वाभाविक है।

यही बहस तब और तेज हो जाती है जब नागरिकता से जुड़े मुद्दे चुनावी राजनीति के केंद्र में आ जाते हैं। CAA, NRC, मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) और पहचान से जुड़े अन्य विवादों ने पहले ही देश में व्यापक राजनीतिक विमर्श को जन्म दिया है। विपक्ष का आरोप है कि नागरिकता का मुद्दा प्रशासनिक प्रक्रिया से अधिक राजनीतिक ध्रुवीकरण का माध्यम बनता जा रहा है। सरकार इन आरोपों को खारिज करते हुए कहती रही है कि उसका उद्देश्य केवल कानून के अनुसार नागरिकों की पहचान सुनिश्चित करना और व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाना है।

इस पूरे विवाद के बीच एक और प्रश्न उठता है। यदि भविष्य में किसी नागरिक से बार-बार अपनी नागरिकता सिद्ध करने के लिए अलग-अलग दस्तावेज़ मांगे जाएं और हर दस्तावेज़ को किसी न किसी स्तर पर अपर्याप्त बताया जाए, तो आम नागरिक किस पर भरोसा करे? विशेष रूप से वे लोग, जिनके पास जन्म प्रमाणपत्र, पुश्तैनी रिकॉर्ड या दशकों पुराने दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं हैं, उनके मन में स्वाभाविक रूप से असुरक्षा की भावना पैदा हो सकती है।

प्रशांत टंडन ने एक और व्यंग्यात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि नागरिकता पर चल रही बहस के बीच पासपोर्ट की फीस बढ़ा दी गई। यह उनकी राजनीतिक टिप्पणी है, जिसका उद्देश्य सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाना है। हालांकि पासपोर्ट शुल्क में बदलाव एक अलग प्रशासनिक निर्णय है और उसका नागरिकता संबंधी कानूनी स्थिति से सीधा संबंध नहीं माना जाता।

लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना असहमति नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। उतना ही आवश्यक यह भी है कि सरकार नागरिकता जैसे संवेदनशील विषय पर स्पष्ट, सरल और भरोसा पैदा करने वाला संवाद स्थापित करे। कानून की भाषा अदालतों के लिए हो सकती है, लेकिन जनता को आश्वस्त करने की भाषा सरकार की जिम्मेदारी होती है।

आखिरकार, नागरिकता केवल कानूनी दर्जा नहीं, बल्कि नागरिक और राष्ट्र के बीच विश्वास का रिश्ता भी है। यदि यह रिश्ता भ्रम, आशंकाओं और लगातार बदलती बहसों में उलझ जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान लोकतांत्रिक भरोसे का होता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि नागरिकता जैसे मूलभूत प्रश्न पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर ऐसी स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए, जिसमें किसी भी भारतीय को यह चिंता न रहे कि कल उससे फिर यह पूछा जाएगा—”साबित कीजिए कि आप भारतीय नागरिक हैं।”

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