राजनीति/शिक्षा | ABC NATIONAL NEWS | 26 जून 2026
देश की राजनीति में शब्द केवल बयान नहीं होते, वे लोकतंत्र की दिशा भी तय करते हैं। विशेषकर तब, जब बात करोड़ों छात्रों, उनके भविष्य और शिक्षा व्यवस्था की हो। ऐसे समय में यदि आंदोलन कर रहे छात्रों के लिए “आतंकवादी” या “दहशतगर्द” जैसे शब्दों के इस्तेमाल का आरोप लगे, तो यह केवल राजनीतिक विवाद नहीं रह जाता, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जवाबदेही पर भी गंभीर बहस खड़ी कर देता है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसी मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की कड़ी आलोचना की है। राहुल गांधी का आरोप है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने अपने अधिकारों, निष्पक्ष परीक्षाओं और सुरक्षित भविष्य की मांग कर रहे छात्रों को “आतंकवादी” या “दहशतगर्द” जैसी भाषा में संबोधित किया। उन्होंने कहा कि यह लोकतंत्र में असहमति की आवाज़ को बदनाम करने की राजनीति है।
राहुल गांधी ने कहा कि ज़रा सोचिए, जिन युवाओं ने वर्षों मेहनत कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की, जिनका भविष्य पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने और भर्ती प्रक्रियाओं में देरी के कारण प्रभावित हुआ, आज वही छात्र यदि जवाब मांगते हैं तो उन्हें कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार अपनी नाकामियों से ध्यान हटाने के लिए पीड़ित छात्रों और उनकी आवाज़ उठाने वालों को ही निशाना बना रही है।
अपने बयान में राहुल गांधी ने हाल के वर्षों में सामने आए पेपर लीक मामलों, प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर फैले अविश्वास और परीक्षा संबंधी तनाव के बीच छात्रों द्वारा आत्महत्या की घटनाओं का भी उल्लेख किया। उनका कहना है कि करोड़ों युवाओं का भविष्य दांव पर लगा है, लेकिन समाधान देने के बजाय सरकार सवाल पूछने वालों पर ही सवाल खड़े कर रही है। उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री से सार्वजनिक माफी मांगने और नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए इस्तीफा देने की मांग की।
राहुल गांधी ने यह भी आरोप लगाया कि असहमति रखने वालों को कठोर विशेषणों से संबोधित करना अब सरकार की राजनीतिक शैली बनती जा रही है। उनके अनुसार, किसान आंदोलन के दौरान किसानों को “आंदोलनजीवी” और “परजीवी” कहा गया, सरकार की आलोचना करने वालों को “एंटी-नेशनल” बताया गया और अब छात्रों के आंदोलन को भी “दहशतगर्दी” से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। उनका कहना है कि जो भी सरकार से सवाल पूछता है, उसे किसी न किसी नकारात्मक पहचान से जोड़ दिया जाता है।
राहुल गांधी ने अपने पहले दिए गए कोटा के बयान को भी दोहराया और कहा कि देश की शिक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे “वसूली तंत्र” में बदल गई है। उन्होंने कहा कि जब तक हर बच्चे को सस्ती, गुणवत्तापूर्ण और निष्पक्ष शिक्षा उपलब्ध नहीं होगी तथा भर्ती और परीक्षा प्रणाली पूरी तरह पारदर्शी नहीं बनेगी, तब तक वे इस मुद्दे को उठाते रहेंगे। यह उनका राजनीतिक और वैचारिक दृष्टिकोण है।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार लगातार यह कहती रही है कि परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और तकनीकी रूप से मजबूत बनाने के लिए व्यापक सुधार किए गए हैं। सरकार का दावा है कि पेपर लीक और भर्ती घोटालों पर अंकुश लगाने के लिए सख्त कानून लागू किए गए हैं तथा दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जा रही है। इसलिए इस पूरे विवाद में सरकार और विपक्ष—दोनों के अपने-अपने दावे और तर्क मौजूद हैं।
लेकिन इन राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोपों से अलग सबसे बड़ा प्रश्न वही है, जो करोड़ों युवाओं के मन में है—क्या उन्हें समय पर निष्पक्ष परीक्षा मिलेगी? क्या उनकी मेहनत सुरक्षित रहेगी? क्या उनकी आवाज़ को लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में सम्मान मिलेगा? और क्या शिक्षा व्यवस्था राजनीतिक टकराव का विषय बनने के बजाय सुधार का माध्यम बनेगी?
लोकतंत्र की असली ताकत आलोचना को सुनने और उसका जवाब देने में होती है, न कि सवाल पूछने वालों की मंशा पर संदेह करने में। छात्र किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं। यदि वे अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं, तो उनकी आवाज़ को राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद का हिस्सा माना जाना चाहिए।
आख़िरकार, सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन एक पीढ़ी का खोया हुआ भविष्य वापस नहीं आता। शिक्षा व्यवस्था पर उठ रहे सवालों का जवाब आरोपों, कटाक्षों और राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि पारदर्शी नीतियों, निष्पक्ष परीक्षाओं, जवाबदेही और युवाओं के प्रति संवेदनशील संवाद से ही दिया जा सकता है। यही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी कसौटी है।




