ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 25 जून 2026
राम मंदिर केवल एक मंदिर नहीं, करोड़ों हिंदुओं की आस्था, विश्वास और भावनाओं का केंद्र है। यही कारण है कि जब राम मंदिर के चढ़ावे और वित्तीय प्रबंधन को लेकर सवाल उठते हैं, तो मामला केवल प्रशासनिक अनियमितता का नहीं रह जाता, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास से जुड़ जाता है।
हाल ही में सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, राम मंदिर ट्रस्ट के गठन के कुछ ही महीनों बाद एक ऑडिट फर्म ने प्रबंधन व्यवस्था में गंभीर कमियों की ओर संकेत किया था। रिपोर्ट में कथित तौर पर कहा गया था कि दान और वित्तीय लेन-देन का कोई व्यवस्थित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, जवाबदेही की स्पष्ट व्यवस्था नहीं है और संचालन के लिए मानक प्रक्रिया (SOP) तैयार करने की आवश्यकता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि ऐसी चेतावनी वर्षों पहले मिल चुकी थी, तो उसे गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया?
यदि ऑडिट रिपोर्ट ने 2020 में ही रिकॉर्ड प्रबंधन, जवाबदेही और वित्तीय निगरानी को लेकर चिंता जताई थी, तो अगले छह वर्षों में क्या कदम उठाए गए? क्या किसी स्वतंत्र एजेंसी से समीक्षा कराई गई? क्या श्रद्धालुओं को कभी बताया गया कि ट्रस्ट की व्यवस्थाओं में किन सुधारों की जरूरत है? और यदि नहीं, तो क्यों नहीं?
आज जब कथित चढ़ावा गड़बड़ी और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों को लेकर बहस चल रही है, तब यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि चेतावनी के बावजूद सुधार की प्रक्रिया इतनी धीमी क्यों रही।
यह भी याद रखना चाहिए कि अभी तक सामने आए आरोपों और रिपोर्टों की अंतिम सत्यता का निर्धारण सक्षम जांच और कानूनी प्रक्रिया से ही होगा। किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी ठहराने का अधिकार केवल जांच एजेंसियों और न्यायालयों को है। लेकिन सवाल पूछना लोकतंत्र का अधिकार और कर्तव्य दोनों है।
जो राजनीतिक शक्तियां वर्षों से राम मंदिर आंदोलन को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताती रही हैं, उनसे यह अपेक्षा भी स्वाभाविक है कि वे आस्था से जुड़े संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही के सर्वोच्च मानक स्थापित करें। राम के नाम पर राजनीति करने वालों को राम के नाम पर आने वाले चढ़ावे के प्रबंधन पर भी उतनी ही गंभीरता दिखानी चाहिए।
मुद्दा किसी दल, संगठन या व्यक्ति का नहीं है। मुद्दा करोड़ों श्रद्धालुओं के उस विश्वास का है जो उन्होंने रामलला के चरणों में अर्पित किया। श्रद्धालु यह जानना चाहते हैं कि उनका दान सुरक्षित है, उसका सही उपयोग हो रहा है और उसकी निगरानी के लिए मजबूत व्यवस्था मौजूद है।
आस्था प्रश्नों से नहीं डरती। पारदर्शिता से विश्वास मजबूत होता है और जवाबदेही से संस्थाएं सम्मान पाती हैं। इसलिए यदि छह साल पहले चेतावनी मिली थी, तो आज देश को यह जानने का अधिकार है कि उस चेतावनी पर क्या कार्रवाई हुई और अगर नहीं हुई, तो जिम्मेदारी किसकी है।




