ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 जून 2026
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं है कि सांसद दल बदल रहे हैं। असली विडंबना यह है कि जनता के वोट से जीतकर संसद पहुंचने वाले नेता उसी जनता के जनादेश को बीच रास्ते में छोड़कर सत्ता के दरबार में पहुंच रहे हैं और लोकतंत्र की रक्षा के लिए बनाई गई संस्थाएं या तो चुप हैं या फिर बेहद धीमी। ऐसे नेताओं को “बागी” या “रिबेल” कहना उनके राजनीतिक कृत्य को सम्मान देना है। बागी वह होता है जो किसी सिद्धांत, विचार या जनहित के लिए सत्ता से टकराता है। लेकिन जो नेता जनता से एक पार्टी के नाम पर वोट लेकर दूसरी पार्टी के साथ खड़ा हो जाए, वह बागी नहीं बल्कि भगोड़ा है।
आज तृणमूल कांग्रेस के कुछ सांसदों को लेकर जो घटनाक्रम सामने आया है, वह केवल एक दल का संकट नहीं है। यह उस लोकतांत्रिक व्यवस्था की परीक्षा है जिसमें मतदाता पांच साल के लिए अपना विश्वास किसी व्यक्ति और पार्टी को सौंपता है। जब वही सांसद सत्ता, दबाव, लालच या राजनीतिक अवसरवाद के कारण पाला बदल लेते हैं तो वे केवल पार्टी नहीं छोड़ते, बल्कि अपने मतदाताओं के भरोसे के साथ भी विश्वासघात करते हैं।
यही कारण है कि तृणमूल कांग्रेस को केवल कानूनी लड़ाई तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे इन भगोड़े सांसदों के खिलाफ एक व्यापक राजनीतिक और जन आंदोलन खड़ा करना चाहिए। देश में भले “राइट टू रिकॉल” का संवैधानिक प्रावधान न हो, लेकिन जनता को यह अधिकार तो है कि वह अपने जनप्रतिनिधियों से जवाब मांगे। जिन सांसदों ने जनता के वोट का अपमान किया है, उनसे सार्वजनिक रूप से इस्तीफा मांगना चाहिए। यदि उनमें नैतिकता बची है तो उन्हें पहले लोकसभा की सदस्यता छोड़नी चाहिए और फिर जिस पार्टी में जाना चाहते हैं, उसके टिकट पर दोबारा चुनाव लड़ना चाहिए।
लोकतंत्र में जनता केवल वोट देने वाली मशीन नहीं होती। जनता ही लोकतंत्र की अंतिम मालिक होती है। इसलिए यदि कोई सांसद जनादेश का सौदा करता है तो जनता को भी उसके खिलाफ लोकतांत्रिक दबाव बनाना चाहिए। जहां भी ऐसे नेता जाएं, उनसे सवाल पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने जनता से लिया गया जनादेश किस अधिकार से बदला।
लेकिन इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला पर खड़ा होता है। संविधान और दल-बदल कानून की भावना साफ है—जनादेश की रक्षा। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बार-बार यह धारणा बनी है कि दल-बदल से जुड़े मामलों में निर्णय लेने की प्रक्रिया इतनी धीमी हो जाती है कि उसका राजनीतिक महत्व ही समाप्त हो जाता है। पहले सरकारें बन जाती हैं, बहुमत बदल जाता है, मंत्री पद बांट दिए जाते हैं और उसके बाद कानूनी प्रक्रिया चलती है।
आलोचकों का आरोप है कि लोकसभा अध्यक्ष के कई फैसले या फैसलों में हुई देरी का राजनीतिक लाभ लगातार बीजेपी को मिलता रहा है। विपक्षी दल लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि अध्यक्ष का कार्यालय निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बजाय कई बार सत्तापक्ष के हितों के अनुरूप दिखाई देता है। यही कारण है कि विपक्ष के एक बड़े वर्ग की नजर में ओम बिरला का कार्यकाल आज़ादी के बाद सबसे विवादित अध्यक्षीय कार्यकालों में गिना जाने लगा है।
लोकसभा अध्यक्ष का पद किसी राजनीतिक दल का विस्तार नहीं होता। यह लोकतंत्र की निष्पक्षता का प्रतीक माना जाता है। लेकिन यदि जनता के मन में यह धारणा बैठ जाए कि दल-बदल के मामलों में फैसले राजनीतिक सुविधा के हिसाब से लिए जा रहे हैं, तो नुकसान केवल विपक्ष का नहीं बल्कि पूरी संसदीय व्यवस्था की विश्वसनीयता का होता है।
सवाल केवल संसद तक सीमित नहीं है। न्यायपालिका की भूमिका पर भी बहस जरूरी है। जब-जब जनादेश, दल-बदल और निर्वाचित सरकारों को प्रभावित करने वाले मामले अदालतों तक पहुंचे, तब जनता को उम्मीद थी कि न्यायपालिका लोकतंत्र की अंतिम सुरक्षा दीवार बनेगी। लेकिन कई मामलों में सुनवाई इतनी लंबी चली कि राजनीतिक परिणाम पहले ही स्थायी हो चुके थे। लोकतंत्र में केवल न्याय होना पर्याप्त नहीं है, न्याय समय पर होना भी उतना ही जरूरी है।
यदि जनता के वोट से चुने गए प्रतिनिधि बीच रास्ते में अपना राजनीतिक चरित्र बदल सकते हैं, यदि स्पीकर समय पर निर्णय नहीं लेते, यदि न्यायिक प्रक्रिया राजनीतिक घटनाओं से पीछे चलती रहे और यदि मीडिया ऐसे नेताओं को “बागी” कहकर महिमामंडित करता रहे, तो लोकतंत्र का संतुलन धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगता है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह घटनाक्रम किसी एक राज्य या एक पार्टी तक सीमित नहीं दिखता। विपक्षी दलों के भीतर लगातार टूट, नेताओं का पाला बदलना और संसद में संख्या बढ़ाने की कोशिशें यह संकेत देती हैं कि आने वाले वर्षों में अन्य दल भी इसी तरह के राजनीतिक अभियानों का सामना कर सकते हैं। विपक्षी दलों के बीच यह आशंका लगातार व्यक्त की जा रही है कि संसद में दो-तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिशें केवल सरकार चलाने के लिए नहीं बल्कि भविष्य के बड़े राजनीतिक और संवैधानिक बदलावों की तैयारी का हिस्सा हो सकती हैं।
इसीलिए INDIA गठबंधन की सभी पार्टियों को इस मुद्दे पर एक साझा राजनीतिक रुख अपनाना चाहिए। यह केवल टीएमसी का सवाल नहीं है। यह उस सिद्धांत का सवाल है कि जनता का वोट आखिर जनता का रहेगा या राजनीतिक सौदेबाजी का उपकरण बन जाएगा।
इतिहास बताता है कि लोकतंत्र तब नहीं टूटता जब कोई सरकार बहुत मजबूत हो जाती है। लोकतंत्र तब कमजोर होता है जब विपक्ष को व्यवस्थित रूप से कमजोर किया जाता है, संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगते हैं और जनता यह मान लेती है कि उसके वोट की कोई कीमत नहीं है।
इसलिए समय आ गया है कि “बागी” शब्द का इस्तेमाल बंद किया जाए। जो नेता जनता के वोट पर जीतकर जनता के जनादेश को बीच रास्ते में छोड़ देते हैं, वे बागी नहीं हैं। वे भगोड़े हैं। और यदि लोकतंत्र को बचाना है तो केवल भगोड़ों से ही नहीं, बल्कि उन संस्थाओं से भी जवाब मांगना होगा जिनकी जिम्मेदारी लोकतंत्र की रक्षा करना है। क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी रक्षा संसद की इमारत नहीं करती, बल्कि जनता का जागरूक और सतर्क विवेक करता है।




