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सायोनी घोष को भी चाहिए बीजेपी की ‘वॉशिंग मशीन’? पुराने ED केस ने खोली पोल

राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 जून 2026

पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों एक सवाल तेजी से पूछा जा रहा है—क्या जिन नेताओं पर कभी भ्रष्टाचार और भर्ती घोटालों की जांच का साया था, वे अब राजनीतिक परिस्थितियां बदलते ही अपने लिए नया ठिकाना तलाश रहे हैं? टीएमसी की युवा नेता और कभी ममता बनर्जी की सबसे भरोसेमंद चेहरों में गिनी जाने वाली सायोनी घोष का नाम भी अब इसी बहस के केंद्र में आ गया है। वजह है उनका पुराना ED केस, शिक्षक भर्ती घोटाले से जुड़ा विवाद और बंगाल की बदलती राजनीतिक हवा। यही कारण है कि विपक्षी खेमे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या सायोनी घोष को भी अब कथित तौर पर बीजेपी की उस “वॉशिंग मशीन” की जरूरत महसूस होने लगी है, जिसका जिक्र विपक्ष वर्षों से करता आया है।

सायोनी घोष का नाम कोई नया नहीं है। जून 2023 में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पश्चिम बंगाल के चर्चित शिक्षक भर्ती घोटाले की जांच के सिलसिले में उन्हें समन जारी किया था। उस समय वह तृणमूल छात्र परिषद (TMCP) की प्रदेश अध्यक्ष थीं और पार्टी के युवा चेहरे के रूप में तेजी से उभर रही थीं। ED ने उन्हें कोलकाता कार्यालय बुलाकर करीब 11 घंटे तक पूछताछ की थी। जांच एजेंसी भर्ती प्रक्रिया में कथित वित्तीय अनियमितताओं, प्रभावशाली व्यक्तियों की भूमिका और उससे जुड़े संपर्कों की जांच कर रही थी।

यह वही शिक्षक भर्ती घोटाला है जिसने पूरे बंगाल की राजनीति को झकझोर कर रख दिया था। मामले में तत्कालीन शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी की गिरफ्तारी हुई, उनकी करीबी अर्पिता मुखर्जी के फ्लैटों से करोड़ों रुपये नकद और भारी मात्रा में संपत्ति बरामद हुई। कई अधिकारी, शिक्षा विभाग से जुड़े कर्मचारी और प्रभावशाली लोग जांच एजेंसियों के रडार पर आए। विपक्ष ने इसे बंगाल के इतिहास का सबसे बड़ा भर्ती घोटाला बताया, जबकि टीएमसी ने जांच को राजनीतिक बदले की कार्रवाई करार दिया।

अब जबकि टीएमसी के भीतर बड़े पैमाने पर राजनीतिक उठापटक चल रही है, कई सांसद और नेता बगावत के रास्ते पर दिखाई दे रहे हैं और पार्टी के भीतर असंतोष की खबरें लगातार सामने आ रही हैं, ऐसे समय में सायोनी घोष का पुराना ED मामला फिर चर्चा में आ गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जब किसी नेता का नाम कभी किसी बड़े घोटाले की जांच में सामने आया हो और बाद में राजनीतिक समीकरण बदलने लगें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

पिछले कुछ वर्षों में “बीजेपी की वॉशिंग मशीन” भारतीय राजनीति का एक लोकप्रिय राजनीतिक मुहावरा बन चुका है। विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार, घोटालों या वित्तीय अनियमितताओं के आरोप होते हैं, वे जैसे ही बीजेपी के करीब पहुंचते हैं, उनके खिलाफ चल रही जांच की धार कमजोर पड़ जाती है। हालांकि बीजेपी और जांच एजेंसियां हमेशा इन आरोपों को सिरे से खारिज करती रही हैं और कहती हैं कि सभी कार्रवाई कानून और सबूतों के आधार पर होती है।

सायोनी घोष के मामले में फिलहाल कोई नई जांच या नया समन सामने नहीं आया है। लेकिन 2023 का ED समन, 11 घंटे की पूछताछ और शिक्षक भर्ती घोटाले से जुड़ा उनका पुराना विवाद एक बार फिर राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है। विपक्षी दलों का दावा है कि बंगाल की राजनीति में चल रहे बड़े फेरबदल के पीछे केवल विचारधारा नहीं बल्कि जांच एजेंसियों का दबाव भी एक महत्वपूर्ण कारण हो सकता है।

आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि सायोनी घोष बंगाल की राजनीति में किस भूमिका में दिखाई देती हैं। लेकिन फिलहाल इतना तय है कि टीएमसी की टूट, भर्ती घोटाले की पुरानी फाइलें और नेताओं के बदलते राजनीतिक रिश्ते बंगाल की राजनीति को और अधिक गर्माने वाले हैं। यही वजह है कि “बीजेपी की वॉशिंग मशीन” वाला सवाल एक बार फिर सियासी गलियारों में गूंज रहा है और सायोनी घोष का नाम उस बहस के केंद्र में आ खड़ा हुआ है।

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