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इतिहास में खुद के नाम की सनक पर बर्बाद होता देश?

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 15 जून 2026

किसी भी राष्ट्र की पहचान केवल वर्तमान सत्ता से नहीं बनती, बल्कि उन संस्थाओं, भवनों और परंपराओं से बनती है जिन्हें कई पीढ़ियों ने मिलकर खड़ा किया होता है। जब कोई सरकार विकास और आधुनिकीकरण के नाम पर ऐतिहासिक एवं प्रशासनिक महत्व रखने वाले भवनों को तोड़ने का फैसला करती है, तो सवाल केवल निर्माण का नहीं रहता, बल्कि यह भी उठता है कि कहीं इतिहास को मिटाकर नई राजनीतिक विरासत गढ़ने की कोशिश तो नहीं हो रही।दिल्ली के शास्त्री भवन, कृषि भवन और उद्योग भवन दशकों से भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण केंद्र रहे हैं। इन भवनों से देश की नीतियां बनीं, करोड़ों लोगों को प्रभावित करने वाले फैसले हुए और स्वतंत्र भारत की प्रशासनिक यात्रा का एक बड़ा हिस्सा इन दीवारों ने देखा। आज इन्हें ध्वस्त कर नए निर्माण की योजना पर बहस छिड़ी हुई है। सबसे अधिक चर्चा शास्त्री भवन को लेकर है, जिसे तोड़ने के लिए लगभग 3200 करोड़ रुपये खर्च किए जाने की बात सामने आई है।

यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। यदि किसी भवन की संरचना पूरी तरह असुरक्षित या अनुपयोगी नहीं है, तो क्या उसे तोड़ना ही एकमात्र विकल्प है? विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि इतनी बड़ी राशि के मुकाबले उसके लगभग 10 प्रतिशत खर्च, यानी कुछ सौ करोड़ रुपये में अत्याधुनिक सुविधाओं के साथ शानदार रिनोवेशन और आधुनिकीकरण किया जा सकता था। यदि ऐसा संभव है, तो फिर ध्वस्तीकरण और पुनर्निर्माण की आवश्यकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

दुनिया के अधिकांश विकसित देशों ने अपनी विरासत को संरक्षित रखते हुए आधुनिकता को अपनाया है। लंदन, पेरिस, वॉशिंगटन और रोम जैसे शहरों में सौ-सौ वर्ष पुरानी इमारतें आज भी आधुनिक प्रशासनिक उपयोग में हैं। वहां इतिहास को मिटाया नहीं जाता, बल्कि उसे संजोते हुए भविष्य का निर्माण किया जाता है। इसके विपरीत यदि हर नई सत्ता पुराने प्रतीकों और संरचनाओं को हटाकर अपनी पहचान स्थापित करने लगे, तो यह प्रवृत्ति राष्ट्र निर्माण से अधिक राजनीतिक स्मारक निर्माण जैसी दिखाई देने लगती है।

लोकतंत्र में हर सरकार चाहती है कि उसके कार्यों को याद रखा जाए। लेकिन जब प्राथमिकता देश की संस्थागत विरासत से अधिक अपने नाम और अपनी छवि को स्थापित करने की हो जाए, तब विकास और व्यक्तिपूजा के बीच की दूरी कम होने लगती है। इतिहास गवाह है कि कई देशों में शासकों ने अपने नाम के स्मारक बनाने पर अरबों खर्च किए, लेकिन जनता की मूल समस्याएं पीछे छूट गईं।

भारत जैसे विकासशील देश में, जहां शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि और बुनियादी सुविधाओं पर अभी भी भारी निवेश की आवश्यकता है, वहां हजारों करोड़ रुपये केवल भवनों को तोड़ने और दोबारा बनाने पर खर्च करने के निर्णय पर सवाल उठना स्वाभाविक है। जनता यह नहीं देखती कि किसी भवन पर किस नेता का नाम लिखा है; जनता यह देखती है कि उसके जीवन में क्या बदलाव आया।

शास्त्री भवन, कृषि भवन और उद्योग भवन पर चल रही बहस केवल इमारतों की बहस नहीं है। यह उस सोच की बहस है जिसमें यह तय होना है कि राष्ट्र की विरासत को संरक्षित करते हुए आगे बढ़ना है या हर दौर में इतिहास को मिटाकर नया इतिहास लिखने की कोशिश करनी है। राष्ट्र निर्माण का अर्थ अतीत को खत्म करना नहीं, बल्कि अतीत और भविष्य के बीच मजबूत पुल बनाना है।

आखिरकार लोकतंत्र में सबसे बड़ा स्मारक कोई भवन नहीं, बल्कि मजबूत संस्थाएं, बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था और समृद्ध नागरिक होते हैं। यदि हजारों करोड़ रुपये ईंट-पत्थर की राजनीति पर खर्च हों और जनता की प्राथमिकताएं पीछे छूट जाएं, तो यह चिंता केवल विपक्ष की नहीं, पूरे देश की होनी चाहिए। सवाल यह नहीं है कि कौन सा भवन बनेगा या टूटेगा; सवाल यह है कि क्या हम इतिहास को संजोकर आगे बढ़ रहे हैं या इतिहास को मिटाकर अपना नाम लिखने की होड़ में लग गए हैं।

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