राजनीति | अमरनाथ प्रसाद | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 14 जून 2026
एक दौर था जब शिवसेना प्रमुख Bal Thackeray का एक संदेश पूरी पार्टी के लिए आदेश माना जाता था। “मातोश्री” से बुलावा आते ही नेता, सांसद और कार्यकर्ता अपने सारे काम छोड़कर पहुंच जाते थे। बाला साहेब की राजनीतिक और संगठनात्मक पकड़ इतनी मजबूत थी कि उनकी मौजूदगी ही पार्टी को एक सूत्र में बांधे रखती थी।
लेकिन अब तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के प्रमुख Uddhav Thackeray द्वारा बुलाई गई आपातकालीन बैठक में पार्टी के सभी सांसदों की मौजूदगी नहीं दिखी। बताया जा रहा है कि लोकसभा और राज्यसभा मिलाकर कुल 10 सांसदों में से केवल 6 ही बैठक में पहुंचे। बाकी सांसदों ने विभिन्न कारणों का हवाला देकर दूरी बना ली या ऑनलाइन जुड़े।
जानकारी के अनुसार सांसद भाऊसाहेब वकचौरे का मोबाइल फोन लंबे समय तक संपर्क से बाहर बताया गया। सांसद ओमराजे निंबालकर ने अपने बेटे की तबीयत खराब होने का हवाला दिया। संजय जाधव ने निजी व्यस्तताओं की बात कही, जबकि नागेश पाटिल अपने संसदीय क्षेत्र में व्यस्त होने के कारण केवल ऑनलाइन बैठक में शामिल हुए। राजनीतिक गलियारों में इन अनुपस्थितियों को सामान्य घटनाक्रम के बजाय पार्टी के भीतर बढ़ती असहजता और असंतोष के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
महाराष्ट्र की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रम ने शिवसेना को गहरे संकट में डाल दिया है। पहले पार्टी का विभाजन हुआ, फिर बड़ी संख्या में विधायक और सांसद अलग खेमे में चले गए। इसके बाद चुनावी परिदृश्य भी पूरी तरह बदल गया। ऐसे माहौल में किसी भी आपात बैठक में सांसदों की अधूरी मौजूदगी स्वाभाविक रूप से कई सवाल खड़े करती है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या उद्धव ठाकरे अब भी अपनी पार्टी पर वैसी पकड़ बनाए हुए हैं जैसी कभी बाला साहेब ठाकरे की हुआ करती थी? या फिर लगातार चुनावी और संगठनात्मक झटकों ने पार्टी की आंतरिक एकजुटता को कमजोर कर दिया है? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी दल में संकट के समय नेतृत्व की सबसे बड़ी ताकत उसके सहयोगियों और जनप्रतिनिधियों की एकजुटता होती है। यदि वरिष्ठ नेता और सांसद नेतृत्व के आह्वान पर पूरी तरह सक्रिय नहीं दिखते, तो यह संगठन के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
हालांकि शिवसेना (UBT) के समर्थकों का तर्क है कि कुछ सांसदों की अनुपस्थिति को सीधे बगावत या असंतोष से जोड़ना जल्दबाजी होगी। उनका कहना है कि व्यक्तिगत और क्षेत्रीय कारणों से नेताओं का बैठक में न पहुंच पाना असामान्य नहीं है। लेकिन राजनीतिक विरोधियों के लिए यह घटनाक्रम उद्धव ठाकरे के नेतृत्व पर सवाल उठाने का नया अवसर बन गया है।
फिलहाल महाराष्ट्र की राजनीति में सबसे बड़ी जिज्ञासा यही है कि क्या उद्धव ठाकरे अपनी पार्टी को एकजुट रख पाएंगे और भविष्य की राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर पाएंगे, या फिर शिवसेना (UBT) को आने वाले दिनों में और बड़े संगठनात्मक संकटों का सामना करना पड़ेगा। इसका जवाब आने वाले महीनों की राजनीतिक गतिविधियां और नेताओं की निष्ठाएं तय करेंगी।




