स्वास्थ्य/ लाइफस्टाइल/ युवा | पलक ठुकराल | ABC NATIONAL NEWS | 12 जून 2026
49 वर्षीय भारतीय निशानेबाजी के दिग्गज, अर्जुन पुरस्कार विजेता और ओलंपिक पदक विजेता मनु भाकर के कोच जसपाल राणा के अचानक निधन ने पूरे देश को झकझोर दिया है। खेल जगत में सक्रिय, अनुशासित जीवनशैली अपनाने वाले और शारीरिक रूप से फिट माने जाने वाले व्यक्ति की अचानक मौत ने एक बार फिर उस डरावने सवाल को सामने ला दिया है, जो आज लाखों भारतीयों के मन में है—क्या हार्ट अटैक अब केवल बुजुर्गों की बीमारी नहीं रह गया? क्या स्वस्थ दिखने वाले, जिम जाने वाले और नियमित काम करने वाले लोग भी अचानक मौत के खतरे में हैं? विशेषज्ञों का कहना है कि दुर्भाग्य से इसका जवाब “हां” है। पिछले कुछ वर्षों में भारत में 25 से 50 वर्ष की आयु के लोगों में हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट के मामलों में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिन्हें पहले कभी गंभीर हृदय रोगी नहीं माना गया था।
भारत बन रहा है दुनिया की हार्ट डिजीज कैपिटल
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और वर्ल्ड हार्ट फेडरेशन के आंकड़े बताते हैं कि भारत में हृदय रोग अब मृत्यु का सबसे बड़ा कारण बन चुका है। 2021 में देश में लगभग 28.7 लाख लोगों की मौत हृदय संबंधी बीमारियों से हुई। विशेषज्ञों के अनुसार भारत में होने वाली कुल मौतों में लगभग एक चौथाई मौतें सीधे तौर पर हृदय रोगों से जुड़ी हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि भारत को अब “कैपिटल ऑफ हार्ट डिजीज” कहा जाने लगा है। पहले जहां हार्ट अटैक को 60-70 वर्ष की उम्र की बीमारी माना जाता था, वहीं अब 30 और 40 वर्ष के लोगों में भी ब्लॉकेज, स्टेंट और बाईपास सर्जरी के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के हालिया आंकड़े बताते हैं कि पिछले सात वर्षों में भारत में हृदय रोग के मामलों में लगभग तीन गुना वृद्धि हुई है और अब 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग भी जोखिम के दायरे में आ चुका है।
फिट दिखना और स्वस्थ होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं
दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई के प्रमुख कार्डियोलॉजिस्ट बार-बार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि फिट दिखना और हृदय का स्वस्थ होना दो अलग-अलग बातें हैं। आज कई लोग नियमित रूप से जिम जाते हैं, वजन नियंत्रित रखते हैं और सामान्य जीवन जीते हैं, लेकिन उनकी धमनियों में चुपचाप कोलेस्ट्रॉल जमा होता रहता है। AIIMS और अन्य चिकित्सा संस्थानों के अध्ययनों में पाया गया है कि अचानक होने वाली मौतों में बड़ी संख्या उन लोगों की है जिनमें पहले कोई बड़ा लक्षण दिखाई नहीं दिया था। यही वजह है कि डॉक्टर हार्ट को “साइलेंट किलर” कहते हैं। कई बार पहला लक्षण ही पहला और आखिरी हार्ट अटैक साबित होता है।
कोविड के बाद क्यों बढ़ी चिंता?
कोविड महामारी के बाद हार्ट अटैक और कार्डियक इमरजेंसी के मामलों में बढ़ोतरी ने चिकित्सकों और वैज्ञानिकों दोनों का ध्यान आकर्षित किया है। हरियाणा सरकार के विधानसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार 2020 से 2026 के बीच 18 से 45 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 18 हजार लोगों की मौत हार्ट अटैक या हार्ट फेलियर से हुई। गुजरात की 108 एम्बुलेंस सेवा के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2025 में लगभग 98 हजार कार्डियक इमरजेंसी दर्ज की गईं, यानी हर छह मिनट में एक नया हृदय रोगी सामने आया। हालांकि AIIMS और ICMR के अध्ययनों में कोविड वैक्सीन और अचानक मौतों के बीच कोई प्रत्यक्ष वैज्ञानिक संबंध नहीं पाया गया है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि कोविड संक्रमण, सूजन, तनाव, निष्क्रिय जीवनशैली और पहले से मौजूद बीमारियों के संयुक्त प्रभाव ने जोखिम अवश्य बढ़ाया है।
तनाव, प्रदूषण और मिलावटी भोजन: नई पीढ़ी के तीन बड़े दुश्मन
कार्डियोलॉजिस्ट मानते हैं कि आज का भारतीय समाज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां मानसिक तनाव, खराब खान-पान और प्रदूषण मिलकर हृदय के लिए घातक वातावरण तैयार कर रहे हैं। देर रात तक जागना, कम नींद लेना, लगातार मोबाइल और लैपटॉप पर काम करना, उच्च प्रतिस्पर्धा, आर्थिक दबाव और सामाजिक तनाव शरीर में ऐसे हार्मोन पैदा करते हैं जो रक्तचाप और हृदय पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं। दूसरी तरफ फास्ट फूड, प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ, अत्यधिक नमक, चीनी और ट्रांस फैट का सेवन धमनियों में ब्लॉकेज को बढ़ाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि खाद्य पदार्थों में मिलावट, कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग और रासायनिक पदार्थों से तैयार भोजन भी लंबे समय में हृदय स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है। इसके साथ ही दिल्ली समेत देश के बड़े शहरों में बढ़ता वायु प्रदूषण अब केवल फेफड़ों की नहीं बल्कि हृदय की बीमारी का भी बड़ा कारण माना जा रहा है।
अस्पतालों की हकीकत: हर मरीज ऑपरेशन टेबल तक नहीं पहुंच पाता
दिल्ली के प्रतिष्ठित हृदय संस्थानों में काम कर चुके कई डॉक्टर स्वीकार करते हैं कि गंभीर ब्लॉकेज वाले मरीजों की स्थिति कई बार इतनी जटिल होती है कि वे ऑपरेशन से पहले ही हार्ट अटैक का शिकार हो जाते हैं। एक महिला द्वारा साझा किया गया अनुभव भी इसी भयावह वास्तविकता को उजागर करता है। उनके अनुसार जब उनके पति ओपन हार्ट सर्जरी के लिए भर्ती थे और एंजियोग्राफी चल रही थी, उसी दौरान उन्हें हार्ट अटैक आया। अस्पताल में अगले दिन नौ मरीजों की ओपन हार्ट सर्जरी निर्धारित थी, जिनमें से सात मरीज जीवित नहीं बच सके। बाद में एक अन्य मरीज का भी निधन हो गया। यह अनुभव भले व्यक्तिगत हो, लेकिन यह बताता है कि हृदय रोग की गंभीरता कितनी भयावह हो सकती है और क्यों समय रहते जांच और इलाज जीवन बचाने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
हार्ट चेकअप अब विकल्प नहीं, आवश्यकता बन चुका है
विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि 35 वर्ष की आयु के बाद नियमित हार्ट स्क्रीनिंग को सामान्य स्वास्थ्य जांच का हिस्सा बना लेना चाहिए। जिन लोगों के परिवार में हृदय रोग का इतिहास है, जिन्हें डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, मोटापा या धूम्रपान की आदत है, उनके लिए जोखिम और भी अधिक है। ईसीजी, ईकोकार्डियोग्राफी, टीएमटी, लिपिड प्रोफाइल, सीटी एंजियोग्राफी और समय-समय पर चिकित्सकीय परामर्श ऐसे उपकरण हैं जो किसी बड़ी दुर्घटना को पहले ही पकड़ सकते हैं। कई मामलों में मरीज को कोई दर्द नहीं होता, लेकिन जांच में 70 से 90 प्रतिशत तक ब्लॉकेज निकल आता है।
सीने का दर्द नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी
डॉक्टरों के अनुसार सीने में दर्द, सीढ़ियां चढ़ते समय सांस फूलना, असामान्य थकान, अत्यधिक पसीना, चक्कर आना, गर्दन या जबड़े में दर्द, बेचैनी और अचानक कमजोरी जैसे लक्षणों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। विशेषकर यदि ये लक्षण बार-बार दिखाई दें तो तुरंत कार्डियोलॉजिस्ट से संपर्क करना चाहिए। दुर्भाग्य से भारत में बड़ी संख्या में लोग इन संकेतों को गैस, एसिडिटी या सामान्य थकान समझकर टाल देते हैं और यही लापरवाही कई बार जानलेवा साबित होती है।
जसपाल राणा की मौत एक चेतावनी है, सिर्फ खबर नहीं
जसपाल राणा का निधन केवल खेल जगत की क्षति नहीं है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक चेतावनी है। यह घटना हमें याद दिलाती है कि हार्ट अटैक उम्र, पेशा या बाहरी फिटनेस देखकर हमला नहीं करता। आज का सबसे बड़ा स्वास्थ्य संदेश यही है कि स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के साथ-साथ नियमित हार्ट चेकअप को भी उतनी ही गंभीरता से लिया जाए। क्योंकि कई बार जिंदगी और मौत के बीच केवल एक समय पर कराई गई जांच का ही फर्क होता है।




