पर्यावरण | ABC NATIONAL NEWS | लंदन/वॉशिंगटन | 12 जून 2026
दुनिया अभी रिकॉर्ड गर्मी, सूखा, बाढ़ और चरम मौसम की घटनाओं से जूझ ही रही है कि वैज्ञानिकों ने एक नई और गंभीर चेतावनी जारी कर दी है। प्रशांत महासागर में बहुप्रतीक्षित अल नीनो (El Niño) आधिकारिक रूप से शुरू हो चुका है और मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि यह आने वाले महीनों में दुनिया के कई हिस्सों में भारी तबाही, भीषण गर्मी, सूखा, बाढ़ और खाद्य संकट का कारण बन सकता है। विशेषज्ञों की चिंता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि यह अल नीनो ऐसे समय आया है जब पृथ्वी पहले से ही मानवजनित जलवायु परिवर्तन के कारण रिकॉर्ड स्तर की गर्मी झेल रही है।
अमेरिका की राष्ट्रीय समुद्री एवं वायुमंडलीय एजेंसी (NOAA) ने घोषणा की है कि उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी ऊपर पहुंच गया है और अब अल नीनो की परिस्थितियां पूरी तरह विकसित हो चुकी हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार समुद्र के तापमान में लगातार बढ़ोतरी और हवाओं के पैटर्न में बदलाव इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि दुनिया एक शक्तिशाली अल नीनो चक्र के दौर में प्रवेश कर चुकी है।
विशेषज्ञों को सबसे ज्यादा चिंता इस बात की है कि यह केवल सामान्य अल नीनो नहीं हो सकता, बल्कि यह पिछले कई दशकों के सबसे शक्तिशाली अल नीनो में से एक बन सकता है। NOAA के नवीनतम आकलन के अनुसार इस वर्ष के अंत तक “बहुत शक्तिशाली अल नीनो” बनने की संभावना 63 प्रतिशत है। यदि ऐसा होता है तो यह 1982-83, 1997-98 और 2015-16 जैसे ऐतिहासिक अल नीनो की श्रेणी में शामिल हो जाएगा।
वैज्ञानिकों का कहना है कि अल नीनो अपने आप में पृथ्वी के तापमान को लगभग 0.2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा सकता है। सामान्य परिस्थितियों में यह वृद्धि सीमित लग सकती है, लेकिन जब इसे पहले से जारी वैश्विक तापमान वृद्धि के साथ जोड़ा जाता है, तब इसके परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं। ब्रिटेन के मौसम विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रोफेसर एडम स्केफ के अनुसार वर्ष 2027 दुनिया के इतिहास का सबसे गर्म वर्ष बन सकता है।
उनका कहना है कि यह अल नीनो ऐसे समय आया है जब पृथ्वी पहले ही रिकॉर्ड गर्म हो चुकी है। इसलिए कई क्षेत्रों में तापमान ऐसे स्तर तक पहुंच सकता है जो पहले कभी दर्ज नहीं किया गया। यही कारण है कि वैज्ञानिक अब केवल मौसम परिवर्तन नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक और आर्थिक प्रभावों को लेकर भी चिंतित हैं।
अल नीनो का प्रभाव दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग रूप में दिखाई देता है। दक्षिण अमेरिका के पेरू और इक्वाडोर में भारी बारिश और विनाशकारी बाढ़ की आशंका बढ़ जाती है। पूर्वी अफ्रीका के कई देशों में भी अत्यधिक वर्षा और बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है। वहीं दूसरी ओर ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, उत्तरी दक्षिण अमेरिका और एशिया के कुछ हिस्सों में सूखा और जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ सकती हैं।
कृषि क्षेत्र पर इसका प्रभाव सबसे अधिक पड़ने की संभावना है। लंबे सूखे, अनियमित बारिश और अत्यधिक गर्मी के कारण फसलों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इससे खाद्यान्न की उपलब्धता कम हो सकती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि विकासशील देशों के करोड़ों लोग इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकाएंगे।
अफ्रीका में जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा के मुद्दों पर काम करने वाले विशेषज्ञ मोहम्मद अडोव ने चेतावनी दी है कि अल नीनो केवल मौसम की घटना नहीं बल्कि करोड़ों लोगों के लिए संकट का संकेत है। उनके अनुसार इसका अर्थ है कमजोर मानसून, सूखती फसलें, बढ़ती खाद्य कीमतें और गरीबी से जूझ रहे परिवारों पर अतिरिक्त बोझ।
भारत के लिए भी यह घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अल नीनो का भारतीय मानसून पर सीधा प्रभाव पड़ता है और कई बार इसके कारण सामान्य से कम वर्षा दर्ज की जाती है। यदि मानसून कमजोर रहता है तो कृषि उत्पादन, जल संसाधनों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि केवल अल नीनो के आधार पर मानसून का सटीक अनुमान लगाना संभव नहीं है, क्योंकि अन्य कई वैश्विक और क्षेत्रीय कारक भी प्रभाव डालते हैं।
इस बीच जापान मौसम एजेंसी ने भी पुष्टि की है कि अल नीनो की परिस्थितियां विकसित हो चुकी हैं और इसके शरद ऋतु तक बने रहने की संभावना लगभग निश्चित है। वहीं ऑस्ट्रेलिया का मौसम विभाग अभी आधिकारिक घोषणा से थोड़ा पीछे है, लेकिन उसने भी माना है कि प्रशांत महासागर तेजी से अल नीनो की ओर बढ़ रहा है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी तक इस बात का कोई निर्णायक प्रमाण नहीं मिला है कि जलवायु परिवर्तन अल नीनो की संख्या बढ़ा रहा है, लेकिन यह निश्चित रूप से उसके प्रभाव को और अधिक खतरनाक बना रहा है। यानी अब वही अल नीनो, जो पहले केवल मौसम में बदलाव लाता था, जलवायु परिवर्तन के कारण कहीं अधिक विनाशकारी साबित हो सकता है।
दुनिया भर की सरकारें, मौसम एजेंसियां और आपदा प्रबंधन संस्थाएं अब संभावित प्रभावों के लिए तैयारियां शुरू कर रही हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में ऐसे प्राकृतिक चक्र और भी गंभीर परिणाम लेकर आ सकते हैं।
अल नीनो की आधिकारिक दस्तक के साथ दुनिया एक बार फिर उस चुनौती का सामना करने जा रही है, जहां प्रकृति और जलवायु परिवर्तन मिलकर मौसम को अनिश्चित और खतरनाक बना रहे हैं। अब पूरी दुनिया की निगाहें 2026 के दूसरे हिस्से और 2027 पर टिकी हैं, क्योंकि वैज्ञानिकों के अनुसार आने वाला समय रिकॉर्ड गर्मी और चरम मौसम की घटनाओं का नया अध्याय लिख सकता है।




