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चीन की नई चाल से भारत के 120 बिलियन डॉलर इलेक्ट्रॉनिक्स सपने पर खतरा?

बिजनेस | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 मई 2026

कोरोना महामारी के बाद भारत ने खुद को दुनिया के अगले बड़े मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में पेश करना शुरू किया। मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और ऑटो सेक्टर में तेजी से निवेश बढ़ा। Apple जैसी वैश्विक कंपनियों के सप्लायर्स ने भारत में उत्पादन बढ़ाया और सरकार ने “मेक इन इंडिया” के तहत बड़े-बड़े औद्योगिक पार्क बनाने का ऐलान किया। इसका असर भी दिखा — भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट 2015 के 8.6 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2025 में 47 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया। अब सरकार 2026 के अंत तक इसे 120 बिलियन डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रख रही है।

लेकिन इसी बीच चीन ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने भारत के इस बड़े सपने पर चिंता बढ़ा दी है। चीन ने नए एक्सपोर्ट कंट्रोल नियम लागू किए हैं, जिनके तहत कई अहम मशीनों, रेयर अर्थ मिनरल्स और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी के निर्यात पर सख्ती बढ़ा दी गई है। यही वे चीजें हैं जिनके सहारे भारत के नए कारखाने और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग चल रहे हैं।

उद्योग जगत का कहना है कि अगर चीन ने जरूरी मशीनरी और कंपोनेंट्स की सप्लाई सीमित कर दी, तो भारत के कई बड़े प्रोजेक्ट प्रभावित हो सकते हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों के अधिकारियों के मुताबिक, वे पहले ही अपने चीनी सप्लायर्स से बातचीत कर रहे हैं ताकि यह समझा जा सके कि नई पाबंदियों का असर कितना बड़ा होगा। कई कंपनियों ने केंद्र सरकार को भी इस संभावित संकट के बारे में आगाह किया है।

सबसे ज्यादा चिंता ऑटो और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में दिखाई दे रही है। आज की आधुनिक कारों में हजारों इलेक्ट्रॉनिक चिप्स और सेंसर इस्तेमाल होते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सप्लाई चेन प्रभावित हुई, तो कार लॉन्च में देरी, कीमतों में बढ़ोतरी और फीचर्स में कटौती जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। भारत अभी भी इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स और मशीनरी के मामले में चीन पर काफी हद तक निर्भर है।

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केंद्र सरकार अब इस चुनौती से निपटने की तैयारी में जुट गई है। केंद्रीय मंत्री Piyush Goyal ने कहा है कि सरकार अलग-अलग सेक्टर के लिए नई निवेश योजनाएं तैयार कर रही है ताकि “कुछ खास देशों” पर निर्भरता कम की जा सके। इसके अलावा “भारत औद्योगिक विकास योजना” के तहत अगले तीन वर्षों में 50 नए इंडस्ट्रियल पार्क शुरू करने की योजना बनाई गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ व्यापारिक लड़ाई नहीं बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन पर नियंत्रण की जंग है। चीन दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि उसकी तकनीक और संसाधनों के बिना बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग आसान नहीं होगी। वहीं भारत के सामने चुनौती यह है कि वह सिर्फ असेंबली हब बनकर न रह जाए, बल्कि खुद मजबूत कंपोनेंट और टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम तैयार करे।

आर्थिक जानकारों के अनुसार, यह संकट भारत के लिए खतरे के साथ-साथ बड़ा मौका भी बन सकता है। अगर भारत स्थानीय सप्लाई चेन, रिसर्च और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करता है, तो आने वाले वर्षों में वह चीन का मजबूत विकल्प बन सकता है। लेकिन फिलहाल सवाल यही है — क्या भारत बिना चीनी सप्लाई चेन के अपने 120 बिलियन डॉलर इलेक्ट्रॉनिक्स सपने को पूरा कर पाएगा?

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