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क्या भारतीय न्यायपालिका अब UAPA और लंबी कैद की राजनीति पर अपनी ही चुप्पी तोड़ रही है?

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 18 मई 2026

उमर खालिद, शरजील इमाम और संविधान की उस लड़ाई का सच, जहां “प्रोसेस” ही सजा बनती जा रही है

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी संसद नहीं, बल्कि उसका संविधान माना जाता है। और संविधान की सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा-रेखा होती है न्यायपालिका। लेकिन जब वही न्यायपालिका वर्षों तक किसी नागरिक को बिना मुकदमे जेल में रहने देती है, और फिर बाद में उसी व्यवस्था पर सवाल उठाने लगती है, तब सवाल केवल एक केस का नहीं रह जाता — सवाल पूरे लोकतांत्रिक ढांचे का बन जाता है।

उमर खालिद और शरजील इमाम का मामला अब केवल दिल्ली दंगों या UAPA तक सीमित नहीं रह गया है। यह मामला आज भारत में नागरिक स्वतंत्रता, असहमति, न्यायिक देरी और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर बने कठोर कानूनों की संवैधानिक सीमा का प्रतीक बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों ने पहली बार इस बहस को उस स्तर पर पहुंचा दिया है जहां स्वयं न्यायपालिका के भीतर से यह संकेत आने लगा है कि शायद कहीं कुछ गंभीर रूप से गलत हुआ है।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने जब यह कहा कि “बेल नियम है और जेल अपवाद”, तो यह केवल एक सामान्य कानूनी सिद्धांत की पुनरावृत्ति नहीं थी। यह उस दौर पर टिप्पणी थी जिसमें UAPA जैसे कानूनों के तहत गिरफ्तारी ही लगभग सजा में बदलती जा रही है। अदालत ने साफ कहा कि KA Najeeb फैसला बाध्यकारी है और छोटी बेंचें उसे कमजोर नहीं कर सकतीं। यही वह बिंदु है जिसने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न देने वाले फैसले पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया।

असल सवाल यही है — यदि एक व्यक्ति पांच या छह साल तक जेल में रहे और उसका ट्रायल ही शुरू न हो सके, तो क्या यह संविधान के अनुच्छेद 21 का खुला उल्लंघन नहीं है? भारतीय संविधान हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ऐसा लगता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर यह अधिकार धीरे-धीरे सशर्त होता जा रहा है।

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने केवल तकनीकी टिप्पणी नहीं की, बल्कि न्यायिक अनुशासन की बात करते हुए कहा कि तीन जजों की बेंच का फैसला सर्वोच्च है और उससे छोटी बेंच उसे “कमजोर, दरकिनार या नजरअंदाज” नहीं कर सकती। इसका सीधा मतलब यह है कि सुप्रीम कोर्ट अब अप्रत्यक्ष रूप से यह स्वीकार कर रहा है कि UAPA मामलों में जमानत को लेकर न्यायिक दृष्टिकोण में असंतुलन और अत्यधिक कठोरता रही है।

उमर खालिद सितंबर 2020 से जेल में हैं। शरजील इमाम उससे भी अधिक समय से। लेकिन आज तक मुकदमे की प्रक्रिया पूरी तरह शुरू नहीं हो सकी। यही वह स्थिति है जिसे दुनिया भर के संवैधानिक विशेषज्ञ “process is the punishment” कहते हैं — यानी अदालत से सजा मिलने से पहले ही पूरी न्यायिक प्रक्रिया किसी व्यक्ति के लिए सजा बन जाती है। लोकतंत्र में इससे बड़ा विरोधाभास क्या हो सकता है कि एक व्यक्ति वर्षों तक जेल में रहे और अदालत यह भी तय न कर सके कि वह दोषी है या नहीं?

यहां यह समझना भी जरूरी है कि बहस केवल दो व्यक्तियों के समर्थन या विरोध की नहीं है। लोकतंत्र की असली परीक्षा उन्हीं मामलों में होती है जहां आरोप गंभीर हों, राजनीतिक माहौल ध्रुवीकृत हो और जनता की भावनाएं बंटी हुई हों। यदि ऐसे समय में भी अदालतें व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा नहीं कर पातीं, तो फिर संविधान की आत्मा केवल किताबों तक सीमित रह जाती है।

सरकार और जांच एजेंसियां लगातार यह तर्क देती रही हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है और UAPA जैसे कानून आतंकवाद तथा राष्ट्रविरोधी गतिविधियों से निपटने के लिए आवश्यक हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि राज्य को सुरक्षा सुनिश्चित करने का अधिकार और जिम्मेदारी दोनों हैं। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल सिद्धांत यही है कि सबसे कठोर कानून भी संविधान से ऊपर नहीं हो सकते। यदि किसी कानून का उपयोग इस तरह होने लगे कि जमानत लगभग असंभव बन जाए और मुकदमे वर्षों तक लटके रहें, तो वह कानून न्याय से ज्यादा भय का उपकरण बन जाता है।

भारत में पिछले कुछ वर्षों के दौरान UAPA के इस्तेमाल को लेकर लगातार बहस होती रही है। मानवाधिकार संगठन, विपक्षी दल और कई कानूनी विशेषज्ञ आरोप लगाते रहे हैं कि इस कानून का उपयोग कई बार असहमति की आवाजों, छात्र नेताओं, पत्रकारों और एक्टिविस्टों के खिलाफ किया गया। दूसरी ओर सरकार इसे “राष्ट्रहित” और “आंतरिक सुरक्षा” का अनिवार्य हिस्सा बताती है। लेकिन अब जब सुप्रीम कोर्ट की ही एक बेंच अपने पुराने दृष्टिकोण पर गंभीर टिप्पणी कर रही है, तो यह बहस और गहरी हो गई है।

यह मामला न्यायपालिका की विश्वसनीयता से भी जुड़ता है। पिछले कुछ वर्षों में अदालतों पर यह आरोप लगता रहा कि संवेदनशील राजनीतिक मामलों में जमानत को लेकर उनका दृष्टिकोण अत्यधिक सतर्क और कभी-कभी असमान दिखाई देता है। कई मामलों में पत्रकारों, एक्टिविस्टों और विपक्ष से जुड़े लोगों को लंबे समय तक राहत नहीं मिली, जबकि दूसरी तरफ कुछ मामलों में तेजी से सुनवाई भी होती रही। यही असमानता लोकतंत्र में न्याय के प्रति भरोसे को कमजोर करती है।

भारत का लोकतंत्र केवल चुनावों से मजबूत नहीं होगा। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब अदालतें सत्ता, जांच एजेंसियों और भीड़ की भावनाओं से ऊपर उठकर संविधान की रक्षा करती हैं। अदालतें यदि यह संदेश दें कि “जेल अपवाद है”, तो यह केवल कानूनी सिद्धांत नहीं बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी चेतावनी होती है। क्योंकि एक ऐसा लोकतंत्र जहां आरोप ही सजा बन जाए, वहां स्वतंत्रता धीरे-धीरे विशेषाधिकार में बदलने लगती है।

आज सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी वास्तव में भारतीय न्याय व्यवस्था में बदलाव की शुरुआत है? क्या अदालतें अब यह स्वीकार करने लगी हैं कि UAPA के तहत लंबी कैद और ट्रायल में देरी संवैधानिक संकट बन चुकी है? या फिर यह टिप्पणी भी भारतीय न्यायिक इतिहास के उन पन्नों में दर्ज होकर रह जाएगी जहां सच देर से बोला गया, लेकिन जिनकी कीमत कुछ लोगों ने अपने जीवन के कई साल जेल में बिताकर चुकाई?

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