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पेट्रोल पर राजनीति या जनता से छल? हरदीप पुरी के बयान पर उठे बड़े सवाल

ओपिनियन | सुनील कुमार सिंह | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 18 मई 2026

केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी एक बार फिर पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर चर्चा में हैं। इस बार उन्होंने तेल कंपनियों के नुकसान का हवाला देते हुए एक्साइज ड्यूटी घटाने की बात कही है। लेकिन विपक्ष और आर्थिक विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 40 डॉलर प्रति बैरल से नीचे चली गई थीं, तब आखिर आम जनता को राहत क्यों नहीं दी गई? उस दौर में पेट्रोलियम कंपनियों के मुनाफे लगातार बढ़ते रहे, जबकि केंद्र सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में रिकॉर्ड बढ़ोतरी कर जनता पर भारी बोझ डाला।

आलोचकों का कहना है कि सरकार आज तेल कंपनियों के घाटे की बात कर रही है, लेकिन उसने खुद पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 16 बार बढ़ाई थी। इसी के जरिए केंद्र सरकार ने केवल सेस के माध्यम से लगभग 39 लाख करोड़ रुपये अतिरिक्त वसूले। सवाल यह उठ रहा है कि जब वैश्विक बाजार में तेल सस्ता था, तब सरकार ने टैक्स कम करने के बजाय जनता से भारी कमाई क्यों की? विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट का फायदा उपभोक्ताओं को देने के बजाय राजस्व बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें केवल अंतरराष्ट्रीय क्रूड ऑयल पर निर्भर नहीं करतीं, बल्कि केंद्र और राज्यों के टैक्स का भी बड़ा योगदान होता है। कई बार ऐसा देखा गया कि कच्चा तेल सस्ता होने के बावजूद देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अपेक्षित कमी नहीं आई। यही वजह है कि अब जब मंत्री तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति की बात करते हैं, तो विपक्ष इसे “चुनिंदा याददाश्त” बता रहा है।

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आर्थिक जानकार यह भी याद दिला रहे हैं कि कोविड काल और उसके बाद के वर्षों में केंद्र सरकार ने ईंधन से मिलने वाले टैक्स को सबसे बड़े राजस्व स्रोत के रूप में इस्तेमाल किया। उस दौरान आम जनता महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक संकट से जूझ रही थी, लेकिन पेट्रोल-डीजल की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहीं। परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर भी असर पड़ा।

अब जबकि पश्चिम एशिया में तनाव और वैश्विक बाजार में अनिश्चितता के कारण तेल कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है, सरकार के सामने दोहरी चुनौती है — एक तरफ तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति और दूसरी तरफ जनता की जेब पर बढ़ता बोझ। लेकिन राजनीतिक सवाल वही है कि क्या सरकार ने अच्छे समय में जनता को राहत दी थी? विपक्ष का कहना है कि जब मुनाफा हो रहा था तब सरकार ने टैक्स कम नहीं किए, और अब घाटे की बात कहकर फिर जनता को तैयार किया जा रहा है।

हरदीप पुरी के बयान ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि आखिर भारत में ईंधन मूल्य निर्धारण वास्तव में बाजार आधारित है या राजनीतिक और राजस्व आधारित। जनता के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें गिरती हैं तो राहत क्यों नहीं मिलती, लेकिन बढ़ोतरी का असर तुरंत उनकी जेब पर क्यों पड़ता है।

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