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मध्य पूर्व में बढ़ा युद्ध का खतरा: इज़रायल के हमले, ट्रंप की चेतावनी और परमाणु संयंत्र पर ड्रोन अटैक से दुनिया में बढ़ी चिंता

अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | तेल अवीव/तेहरान/अबू धाबी | 18 मई 2026

पश्चिम एशिया में तनाव अब खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। Israel और Iran के बीच जारी टकराव के बीच हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान को खुली चेतावनी देते हुए कहा कि “घड़ी तेजी से चल रही है”, वहीं दूसरी ओर संयुक्त अरब अमीरात के बराकाह न्यूक्लियर पावर प्लांट के पास ड्रोन हमले के बाद आग लगने की घटना ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। इस बीच इज़रायल ने दक्षिणी लेबनान में बड़े पैमाने पर हवाई हमले जारी रखे हैं, जबकि हिज्बुल्लाह ने संघर्षविराम वार्ता को “बेकार” करार दिया है। लगातार बढ़ते हमलों और धमकियों ने पूरे क्षेत्र को एक बड़े युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है।

अबू धाबी प्रशासन के अनुसार बराकाह परमाणु संयंत्र के बाहरी हिस्से में स्थित एक इलेक्ट्रिकल जनरेटर पर ड्रोन हमला हुआ, जिसके बाद आग लग गई। अधिकारियों ने कहा कि रेडिएशन स्तर सामान्य हैं और किसी के घायल होने की खबर नहीं है, लेकिन घटना को बेहद गंभीर माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी IAEA ने भी इस हमले पर “गहरी चिंता” जताई है। IAEA प्रमुख राफेल ग्रॉसी ने साफ कहा कि किसी भी परमाणु प्रतिष्ठान के आसपास सैन्य गतिविधियां पूरी दुनिया के लिए खतरा बन सकती हैं। यूएई ने इस ड्रोन हमले को “खतरनाक उकसावा” बताते हुए कहा कि उसकी संप्रभुता और सुरक्षा को किसी भी हालत में चुनौती बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

इसी बीच इज़रायल ने लेबनान में अपने सैन्य अभियान को और तेज कर दिया है। इज़रायली सेना ने दावा किया कि उसने हिज्बुल्लाह के ठिकानों को निशाना बनाया है, लेकिन लेबनान की सरकारी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कई गांवों और रिहायशी इलाकों पर भी बमबारी हुई। संघर्षविराम को 45 दिन बढ़ाए जाने के बावजूद दक्षिणी और पूर्वी लेबनान में लगातार हवाई हमले हो रहे हैं। लेबनान के कई इलाकों से लोगों को पलायन करना पड़ा है और हजारों परिवार भय के माहौल में जी रहे हैं। आलोचकों का आरोप है कि इज़रायल बार-बार संघर्षविराम समझौतों को कमजोर कर रहा है और सैन्य कार्रवाई के जरिए पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ा रहा है।

दूसरी तरफ हिज्बुल्लाह ने भी जवाबी कार्रवाई तेज कर दी है। इज़रायली सैन्य अधिकारियों के अनुसार पिछले कुछ दिनों में हिज्बुल्लाह ने लगभग 200 प्रोजेक्टाइल और ड्रोन हमले किए हैं। खास बात यह है कि कम लागत वाले फाइबर-ऑप्टिक FPV ड्रोन अब इज़रायली सेना के लिए नई चुनौती बनते जा रहे हैं। लगातार बढ़ते हमलों ने यह संकेत दे दिया है कि स्थिति अब सिर्फ सीमित संघर्ष तक नहीं रही, बल्कि व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकती है।

वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान ने हालात को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। ट्रंप ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि “ईरान के लिए समय तेजी से खत्म हो रहा है, उन्हें जल्दी फैसला करना होगा, वरना कुछ भी नहीं बचेगा।” अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप 19 मई को अपने शीर्ष सुरक्षा सलाहकारों के साथ Situation Room बैठक करने वाले हैं, जिसमें ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य विकल्पों पर चर्चा हो सकती है। इस खबर के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों और कूटनीतिक हलकों में बेचैनी बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका सीधे इस संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभाता है, तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, तेल बाजार और वैश्विक सुरक्षा पर पड़ सकता है।

ईरानी मीडिया ने दावा किया है कि अमेरिका ने शांति वार्ता के लिए जो प्रस्ताव दिए हैं, उनमें “कोई ठोस रियायत” शामिल नहीं है। रिपोर्ट्स के अनुसार वॉशिंगटन ने ईरान से केवल एक परमाणु केंद्र चालू रखने और अपने उच्च संवर्धित यूरेनियम भंडार को अमेरिका को सौंपने जैसी शर्तें रखी हैं। साथ ही ईरान की जमी हुई संपत्तियों को रिलीज करने या युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई करने पर भी अमेरिका तैयार नहीं दिख रहा। इसी वजह से तेहरान में अमेरिका के प्रति अविश्वास और बढ़ता नजर आ रहा है।

इस पूरे संकट के बीच भारत ने भी अपनी चिंता खुलकर जाहिर की है। संयुक्त राष्ट्र में भारत ने होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाए जाने पर गंभीर चिंता जताई और कहा कि समुद्री व्यापार और नागरिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत जरूरी है। भारत के लिए यह मुद्दा बेहद अहम है क्योंकि उसकी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है। पश्चिम एशिया में लंबे समय तक तनाव बना रहने से भारत समेत कई देशों में तेल और गैस की कीमतों पर सीधा असर पड़ सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इज़रायल, ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ती टकराहट अब केवल सीमित सैन्य संघर्ष नहीं रह गई है। इसमें परमाणु सुरक्षा, वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और महाशक्तियों की रणनीतिक राजनीति भी शामिल हो चुकी है। सबसे बड़ी चिंता इस बात को लेकर है कि अगर हालात और बिगड़े तो पूरा मध्य पूर्व एक बड़े युद्ध की आग में झुलस सकता है, जिसका असर दुनिया के हर हिस्से पर दिखाई देगा।

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