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भोजशाला-कमाल मौला परिसर मंदिर घोषित, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

राष्ट्रीय/ कानून/ धर्म | ABC NATIONAL NEWS | इंदौर | 15 मई 2026

मुस्लिम पक्ष की याचिकाएं खारिज, वैकल्पिक जमीन देने की बात भी कही

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने धार स्थित बहुचर्चित भोजशाला-कमाल मौला परिसर विवाद पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए भोजशाला परिसर को देवी वाग्देवी यानी मां सरस्वती का मंदिर घोषित कर दिया है। इंदौर खंडपीठ की डिवीजन बेंच ने अपने विस्तृत 242 पन्नों के आदेश में हिंदू पक्ष को परिसर में पूजा-अर्चना की अनुमति देते हुए मुस्लिम समुदाय के दावों को खारिज कर दिया। अदालत ने यह भी कहा कि मुस्लिम समुदाय चाहे तो मध्य प्रदेश सरकार से धार जिले में मस्जिद निर्माण के लिए अलग जमीन की मांग कर सकता है। फैसला जस्टिस विनय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने सुनाया। कोर्ट ने हाल ही में मुस्लिम और जैन समुदाय की ओर से दायर याचिकाओं को भी निरस्त कर दिया। लंबे समय से यह विवाद देश के सबसे संवेदनशील धार्मिक और ऐतिहासिक मामलों में गिना जाता रहा है, जहां हिंदू पक्ष भोजशाला को मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर बताता रहा, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद मानता आया है।

अदालत के फैसले के बाद धार और आसपास के इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। प्रशासन ने संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया है ताकि किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से बचा जा सके। फैसले के बाद हिंदू संगठनों में खुशी का माहौल देखा गया, जबकि मुस्लिम संगठनों ने कहा है कि वे आदेश का अध्ययन करने के बाद आगे की कानूनी रणनीति तय करेंगे।

भोजशाला विवाद कई दशकों से राजनीतिक और धार्मिक बहस का केंद्र बना हुआ था। हिंदू संगठनों का दावा रहा है कि यह स्थल प्राचीन काल में शिक्षा और संस्कृति का प्रमुख केंद्र था, जहां मां सरस्वती की पूजा होती थी। वहीं मुस्लिम समुदाय इसे ऐतिहासिक मस्जिद बताता रहा है। वर्षों से यहां पूजा और नमाज को लेकर प्रशासनिक व्यवस्था के तहत अलग-अलग दिनों में धार्मिक गतिविधियों की अनुमति दी जाती रही थी।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में ऐतिहासिक दस्तावेजों, पुरातात्विक साक्ष्यों और विभिन्न पक्षों की दलीलों का विस्तृत उल्लेख किया है। अदालत ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों और अभिलेखों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि भोजशाला मूल रूप से देवी वाग्देवी का मंदिर था। कोर्ट ने यह भी माना कि इस स्थल का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यंत गहरा है।

राजनीतिक स्तर पर भी इस फैसले के दूरगामी असर देखने को मिल सकते हैं। भारतीय जनता पार्टी और हिंदू संगठनों ने इसे “सांस्कृतिक न्याय” और “ऐतिहासिक सत्य की जीत” बताया है। वहीं विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक संगठनों ने अपील की है कि फैसले को लेकर सामाजिक सौहार्द बनाए रखा जाए और किसी भी तरह की भड़काऊ राजनीति से बचा जाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि अयोध्या फैसले के बाद यह देश के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक विवादों में से एक माना जा सकता है। अदालत द्वारा मुस्लिम पक्ष को वैकल्पिक जमीन लेने की सलाह दिए जाने को भी कई लोग संतुलन बनाने की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं। हालांकि यह मामला अभी पूरी तरह समाप्त नहीं माना जा रहा, क्योंकि संभावना है कि फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।

फिलहाल मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के इस निर्णय ने देशभर में नई बहस छेड़ दी है। एक ओर इसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान की बहाली के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी उठ रहे हैं कि ऐसे संवेदनशील मामलों में सामाजिक और धार्मिक संतुलन कैसे बनाए रखा जाए। आने वाले दिनों में इस फैसले की कानूनी और राजनीतिक गूंज राष्ट्रीय स्तर पर सुनाई देना तय माना जा रहा है।

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