अंतरराष्ट्रीय | कुश बहादुर थापा | ABC NATIONAL NEWS | काठमांडू | 14 मई 2026
दुनिया की सबसे ऊंची चोटी Mount Everest अब सिर्फ पर्वतारोहण का केंद्र नहीं रही, बल्कि अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती तकनीकी प्रतिस्पर्धा का नया रणक्षेत्र बनती जा रही है। नेपाल में चल रहे एवरेस्ट अभियान के बीच अमेरिकी और चीनी ड्रोन तकनीक को लेकर ऐसा विवाद खड़ा हो गया है जिसने काठमांडू सरकार को बेहद मुश्किल कूटनीतिक स्थिति में ला खड़ा किया है। चीन पहले से ही Everest Base Camp पर अपनी ड्रोन तकनीक के जरिए मजबूत पकड़ बना चुका है, जबकि अब अमेरिका भी इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी दर्ज कराना चाहता है।
रिपोर्ट के अनुसार, 1 मई को अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के दक्षिण एवं मध्य एशिया मामलों के विशेष दूत Sergio Gor अमेरिकी अधिकारियों की टीम के साथ हेलीकॉप्टर से Everest Base Camp पहुंचे थे। उनका उद्देश्य अमेरिकी कंपनी द्वारा विकसित Alta X Gen 2 ड्रोन का परीक्षण करना था। यह ड्रोन ऑक्सीजन सिलेंडर, रस्सियां, सीढ़ियां और अन्य पर्वतारोहण सामग्री को बेस कैंप से Camp-1 तक पहुंचाने के लिए इस्तेमाल किया जाना था। हालांकि नेपाल के गृह मंत्रालय ने सुरक्षा और “ड्रोन उड़ान प्रक्रिया” का हवाला देते हुए अमेरिकी टीम को उड़ान अनुमति देने से इनकार कर दिया। इसके बाद अमेरिकी ड्रोन उड़ान नहीं भर सका और टीम को काठमांडू लौटना पड़ा।
दरअसल, चीन की DJI FlyCart 30 और अब नई FlyCart 100 ड्रोन तकनीक पिछले साल से Everest अभियान में सक्रिय रूप से इस्तेमाल हो रही है। चीनी कंपनी DJI ने नेपाल की AirLift Technology को ड्रोन उपलब्ध कराए हैं, जिनकी मदद से भारी सामान कुछ ही मिनटों में Camp-1 तक पहुंचाया जा रहा है। पहले यही काम Sherpa पर्वतारोहियों को कई घंटों की जानलेवा चढ़ाई करके करना पड़ता था। नेपाली ड्रोन ऑपरेटरों के मुताबिक नई DJI FlyCart 100 ड्रोन 45 किलो तक वजन लेकर तीन मिनट से भी कम समय में Camp-1 पहुंच सकती है और वापसी में कचरा भी नीचे ला सकती है। इससे Sherpa समुदाय की जान जोखिम में डालने की जरूरत काफी कम हुई है।
हालांकि अमेरिकी ड्रोन को अनुमति न मिलने के बाद विवाद इतना बढ़ गया कि नेपाल सरकार ने कुछ समय के लिए चीनी ड्रोन संचालन पर भी रोक लगा दी। इससे Everest route fixing और रस्सियां पहुंचाने का काम प्रभावित हुआ। इस सीजन में अब तक पांच Sherpa पर्वतारोहियों की मौत हो चुकी है, जिससे ड्रोन तकनीक की जरूरत और अधिक महत्वपूर्ण मानी जा रही है। नेपाल में इस वर्ष Everest चढ़ाई के लिए रिकॉर्ड 492 परमिट जारी किए गए हैं, जिनमें सबसे अधिक 109 चीनी और 76 अमेरिकी पर्वतारोही शामिल हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि Everest अब अमेरिका और चीन के बीच “टेक्नोलॉजी वॉर” का प्रतीक बनता जा रहा है। सुरक्षा विश्लेषकों को आशंका है कि ड्रोन तकनीक के नाम पर संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में निगरानी और सामरिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिल सकता है। नेपाल के पूर्व सैन्य अधिकारी Binoj Basnyat ने कहा कि बड़ी शक्तियां आर्थिक मदद और तकनीकी सहयोग के बहाने नेपाल में अपने रणनीतिक हित मजबूत करना चाहती हैं। वहीं विदेश नीति विशेषज्ञ Vijaya Kant Karna का मानना है कि यदि इस तकनीक का दुरुपयोग हुआ तो पूरा ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र भू-राजनीतिक तनाव का केंद्र बन सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने नेपाल को एक बेहद नाजुक स्थिति में पहुंचा दिया है। एक ओर उसका पड़ोसी चीन पहले से Everest क्षेत्र में तकनीकी बढ़त बनाए हुए है, तो दूसरी ओर अमेरिका भी अपनी नई तकनीक के जरिए प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार आने वाले समय में हिमालय सिर्फ प्राकृतिक सीमाओं का नहीं बल्कि वैश्विक तकनीकी और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का भी सबसे संवेदनशील क्षेत्र बन सकता है।




