अंतरराष्ट्रीय | एजेंसी/ ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन 13 मई 2026
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बीजिंग में होने वाली अहम मुलाकात ने पूरी दुनिया की राजनीतिक धड़कनें तेज कर दी हैं। सवाल अब सिर्फ व्यापार समझौते या ईरान युद्ध का नहीं रह गया है, बल्कि दुनिया में एक नए “G2 वर्ल्ड ऑर्डर” की आशंका गहराने लगी है — यानी ऐसा वैश्विक ढांचा जहां अमेरिका और चीन मिलकर दुनिया की दिशा तय करें। दोनों महाशक्तियों के बीच यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब अमेरिका-ईरान तनाव, होर्मुज जलडमरूमध्य संकट, तेल आपूर्ति पर दबाव और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता ने कई देशों की नींद उड़ा रखी है। ट्रंप जहां घरेलू असंतोष और ईरान युद्ध से पैदा हुए दबाव के बीच एक बड़ी कूटनीतिक जीत चाहते हैं, वहीं चीन अपनी अर्थव्यवस्था पर पड़े असर को कम करने के लिए अमेरिका से रणनीतिक राहत चाहता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुलाकात केवल व्यापार या सुरक्षा वार्ता नहीं, बल्कि “नई वैश्विक शक्ति संरचना” की शुरुआत का संकेत हो सकती है। “G2” यानी “Group of Two” का विचार पहली बार 2005 में सामने आया था, जिसमें दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं — अमेरिका और चीन — को वैश्विक स्थिरता और आर्थिक फैसलों का संयुक्त नेतृत्वकर्ता मानने की बात कही गई थी।
लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। पहले जहां यह अवधारणा सहयोग और वैश्विक संतुलन की बात करती थी, वहीं अब कई देशों को डर है कि कहीं दुनिया दो महाशक्तियों की सौदेबाजी का मैदान न बन जाए।
रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप इस बैठक में चीन पर कई बड़े मुद्दों को लेकर दबाव बना सकते हैं। इनमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलने के लिए अंतरराष्ट्रीय अभियान में चीन की भागीदारी, दुर्लभ खनिजों (Rare Earth Minerals) की सप्लाई, व्यापार संतुलन और ताइवान से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। वहीं शी जिनपिंग अमेरिका से चीन के रणनीतिक हितों को मान्यता दिलाने की कोशिश करेंगे।
सबसे बड़ी चिंता यूरोप, भारत, जापान और कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं को है। उन्हें डर है कि अगर अमेरिका और चीन के बीच “G2 समझौता” बनता है तो वैश्विक फैसले उनके सिर के ऊपर से लिए जाएंगे। खासकर यूरोप को आशंका है कि अमेरिका और चीन आपसी व्यापारिक और तकनीकी समझौतों के जरिए उसे कमजोर कर सकते हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप लगातार NATO पर दबाव बना रहे हैं और अमेरिका के पारंपरिक सहयोगियों से दूरी बना रहे हैं। ऐसे में चीन के साथ उनकी बढ़ती बातचीत ने यूरोप की बेचैनी और बढ़ा दी है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि यूरोप को अमेरिका और चीन दोनों पर अपनी निर्भरता कम करनी होगी।
भारत भी इस बदलते समीकरण पर करीब से नजर बनाए हुए है। BRICS देशों के भीतर भारत खुद को एक बड़ी वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है। लेकिन अगर अमेरिका और चीन दुनिया की आर्थिक और रणनीतिक नीतियां मिलकर तय करने लगते हैं, तो भारत जैसे देशों की भूमिका सीमित हो सकती है।
हालांकि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि “G2” बनना इतना आसान नहीं होगा। अमेरिका और चीन दोनों खुद को दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति के रूप में देखना चाहते हैं। ट्रंप “America First” की नीति पर चलते हैं, जबकि शी जिनपिंग चीन को नई वैश्विक महाशक्ति बनाने के मिशन पर हैं। ऐसे में दोनों के बीच स्थायी साझेदारी की संभावना कमजोर मानी जा रही है।
लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका कभी भी चीन को सैन्य, तकनीकी और आर्थिक बराबरी की ताकत के रूप में आसानी से स्वीकार नहीं करेगा। वहीं चीन भी संयुक्त राष्ट्र आधारित बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की बात करता रहा है, जहां केवल दो देशों का प्रभुत्व न हो।
इसके बावजूद ट्रंप और शी जिनपिंग की यह मुलाकात बेहद अहम मानी जा रही है। अक्टूबर 2025 में दक्षिण कोरिया के बुसान में हुई पिछली मुलाकात के दौरान ट्रंप ने इसे “12 में से 10 अंक वाली बैठक” बताया था और पहली बार सार्वजनिक रूप से “G2” शब्द का इस्तेमाल किया था। उसी के बाद से वैश्विक राजनीति में यह बहस और तेज हो गई।
ईरान युद्ध और होर्मुज संकट ने इस मुलाकात की अहमियत और बढ़ा दी है। चीन का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्वी तेल पर निर्भर है और होर्मुज में तनाव ने उसकी सप्लाई चेन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। दूसरी तरफ अमेरिका चाहता है कि चीन खुले तौर पर ईरान पर दबाव डाले।
अब पूरी दुनिया की नजर बीजिंग में होने वाली इस बैठक पर टिकी है। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि ट्रंप और शी जिनपिंग क्या समझौते करेंगे, बल्कि यह भी है कि क्या दुनिया धीरे-धीरे एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है जहां बाकी देशों की भूमिका कम होती जाएगी और वैश्विक राजनीति दो सुपरपावर के बीच सिमटकर रह जाएगी।




