अंतरराष्ट्रीय | कुश बहादुर थापा | ABC NATIONAL NEWS | काठमांडू | 12 मई 2026
नेपाल की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। देश में मुफ्त बांटी जा रही सरकारी दवाओं को लेकर अब सिर्फ मरीज ही नहीं, बल्कि डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी और खुद स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी भी भरोसा नहीं जता रहे हैं। हालात इतने गंभीर बताए जा रहे हैं कि कई डॉक्टर मरीजों को सरकारी अस्पताल की मुफ्त दवा लेने के बजाय बाहर मेडिकल स्टोर से दवा खरीदने की सलाह दे रहे हैं।नेपाल में सरकार वर्षों से मधुमेह, ब्लड प्रेशर, अस्थमा, मानसिक रोग और अन्य बीमारियों के लिए मुफ्त दवाएं उपलब्ध कराती है। लेकिन अब इन दवाओं की गुणवत्ता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। कई मरीजों का दावा है कि मुफ्त दवाओं का असर नहीं होता, जबकि “ब्रांडेड” दवाएं जल्दी काम करती हैं।
सिंधुपालचौक जिले के रहने वाले सूर्यमान तामांग, जो हाई ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल से पीड़ित हैं, कहते हैं कि उन्होंने अब तक सरकारी मुफ्त दवाएं शुरू ही नहीं कीं क्योंकि उन्हें उन पर भरोसा नहीं है। उनका कहना है कि जब वे डॉक्टरों से मुफ्त दवा के बारे में पूछते हैं तो डॉक्टर खुद उन्हें बाहर की फार्मेसी से दवा खरीदने को कहते हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कई डॉक्टर और स्वास्थ्य अधिकारी खुद स्वीकार कर रहे हैं कि वे भी मुफ्त सरकारी दवाओं का इस्तेमाल नहीं करते। कर्णाली एकेडमी ऑफ हेल्थ साइंसेज के डीन डॉ. प्रेनित कुमार पोखरेल ने माना कि वे अपनी दवाएं काठमांडू की निजी फार्मेसी से खरीदते हैं।
स्वास्थ्य मंत्रालय और उससे जुड़े विभागों के कई अधिकारियों ने भी नाम न छापने की शर्त पर कहा कि वे अपने परिवार को सरकारी मुफ्त दवाएं नहीं देते क्योंकि उन्हें उनकी गुणवत्ता पर संदेह है।
रिपोर्ट में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जहां सरकारी अस्पतालों में दी गई दवाएं मरीजों पर असर नहीं कर रही थीं। एक स्वास्थ्य अधिकारी ने बताया कि मानसिक रोग के एक मरीज को कई दिनों तक मुफ्त दवा दी गई लेकिन हालत में सुधार नहीं हुआ। बाद में वही दवा निजी फार्मेसी से खरीदकर दी गई तो मरीज ठीक होने लगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या की सबसे बड़ी वजह “लोएस्ट बिड सिस्टम” यानी सबसे सस्ती बोली पर दवा खरीदने की नीति है। सरकारी एजेंसियां सबसे कम कीमत पर दवाएं खरीदती हैं, जिससे गुणवत्ता से समझौता होने का खतरा बढ़ जाता है।
नेपाल के पूर्व स्वास्थ्य विशेषज्ञ महेंद्र प्रसाद श्रेष्ठ का कहना है कि कई बार दवाएं उनकी बाजार कीमत के एक-तिहाई रेट पर खरीदी जाती हैं। ऐसे में कंपनियां लागत बचाने के लिए गुणवत्ता कम कर देती हैं।
स्थिति और गंभीर इसलिए भी मानी जा रही है क्योंकि नेपाल की दवा जांच व्यवस्था बेहद कमजोर बताई जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में नेपाल के बाजार में मौजूद 24 हजार से ज्यादा दवाओं में से सिर्फ 648 दवाओं की गुणवत्ता जांच की गई। इनमें कई दवाएं घटिया गुणवत्ता की पाई गईं।
सबसे हैरानी की बात यह है कि मुफ्त बांटी जाने वाली आवश्यक दवाओं की गुणवत्ता जांच ही नहीं की गई। स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि उनके पास न पर्याप्त बजट है, न तकनीक और न ही स्टाफ।
नेपाल की दवा प्रयोगशाला में सिर्फ आठ तकनीशियन हैं, जबकि पूरे देश में लगभग 25 हजार फार्मेसी की निगरानी के लिए केवल 20 ड्रग इंस्पेक्टर मौजूद हैं। अधिकारियों का कहना है कि कई बार घटिया दवाएं बाजार से वापस बुलाने का आदेश तब जारी होता है जब अधिकांश दवाएं बिक चुकी होती हैं।
डॉक्टरों ने यह भी कहा कि नेपाल की “फ्री एसेंशियल ड्रग लिस्ट” 2016 के बाद अपडेट नहीं हुई है। कई दवाएं अब पुरानी और अप्रभावी मानी जाती हैं, लेकिन अस्पताल आज भी उन्हें खरीद रहे हैं। आधुनिक और ज्यादा असरदार दवाएं सूची में शामिल ही नहीं हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सरकार ने जल्द दवा खरीद प्रणाली, गुणवत्ता जांच और निगरानी व्यवस्था में सुधार नहीं किया, तो मुफ्त स्वास्थ्य सेवाओं पर जनता का भरोसा पूरी तरह टूट सकता है। नेपाल में यह मुद्दा अब सिर्फ स्वास्थ्य का नहीं बल्कि जनता के विश्वास और सरकारी जवाबदेही का बड़ा संकट बनता जा रहा है।




